The Mysterious Bell – Chapter 592
और मुझे उस वक़्त पता नहीं था कि सुबह होते-होते ये गली पूरी तरह बदल जाएगी।
सुबह मैं दुकान पर बैठा था, और मैंने चाय नहीं बनाई।
ये बात आज पहली बार हुई थी। मैं रात भर सोया नहीं, और जब इंसान रात भर न सोए, तो सुबह उसके हाथ पहले चाय की तरफ़ जाते हैं। पर मेरे हाथ नहीं गए। क्योंकि गुमटी की तरफ़ से धुआँ नहीं उठ रहा था।
शबनम आपा ने चूल्हा बंद रखा था। कल रात उन्होंने कहा था — सच खुलने तक चाय नहीं बनेगी। और मैंने सोचा था कि ये गुस्से की बात है, सुबह तक ठंडी हो जाएगी।
पर सुबह हुई, और चूल्हा ठंडा था।
गली की सुबह की जो आवाज़ होती है — चिमटी की खनक, केतली का छनकना, किसी का "दो कटोरी, एक मीठी" — वो सब गायब था। सिर्फ़ नल की टपक और दूर किसी कुत्ते का रोना बचा था।
मैं दुकान के बाहर स्टूल पर बैठा था, हाथ में वो सीटी थी। मैंने उसे कपड़े में लपेटकर जेब में रख लिया था, पर अब निकालकर देख रहा था। पीतल। छोटी। पुरानी। कोई नाम नहीं, कोई फूल नहीं, कोई निशान नहीं। बस एक सादा सीटी, जो कल रात मेरे हाथ में पापा की आवाज़ बनकर बोली थी।
"तेरी माँ की है।"
मेरी माँ अस्पताल के नीचे वाले कमरे में थीं। उनकी दवा के दो पत्ते बचे थे। और मैं यहाँ बैठा एक ऐसी सीटी को घूर रहा था, जो मेरी माँ की थी, और जिसके बारे में मैंने आज तक कभी नहीं सुना था।
तभी मैंने देखा — कोई आ रहा है।
सफ़ेद कुर्ता, टोपी, हाथ में एक गाँठ बँधा रूमाल। चाल में वो धीमापन था जो उम्र के साथ आता है, पर आज उसमें कुछ और भी था। पैर जैसे ज़मीन पर रखे ही नहीं जा रहे थे।
हबीब चाचा।
वो सीधे मेरी दुकान तक आए। मेरी दुकान पर वो आज तक एक बार भी नहीं आए थे। उनका आँगन मोड़ से हटकर था, और उनका काम उसी आँगन तक सीमित था।
वो मेरे सामने खड़े हो गए।
और फिर उन्होंने दोनों हाथ जोड़ लिए।
"चाचा —" मैं उठा।
"सुन ले," उन्होंने कहा। आवाज़ में वो कड़वाहट नहीं थी जो कल थी। सिर्फ़ थकान थी। "सुन ले, बेटा। फिर मैं चला जाऊँगा।"
"आप पहले बैठिए।"
"नहीं —"
"चाचा, बैठिए।" मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनका हाथ ठंडा था, सुबह की ठंड में। "ये दुकान है। यहाँ हाथ जोड़कर खड़े नहीं होते। यहाँ लोग पंचर कराने आते हैं, और कभी-कभी अपनी टूटी चीज़ें छोड़ जाते हैं। बैठिए।"
मैंने उन्हें अंदर की स्टूल पर बिठाया। पीछे के कमरे से स्टोव निकाला। केतली चढ़ाई। मैंने खुद चाय बनाई — गुमटी की नहीं, अपनी। और जब मैंने वो काली चाय स्टील के गिलास में डालकर उनके हाथ में दी, तो उन्होंने गिलास को दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे वो जाड़े में दी गई चाय हो।
"इमरान कल रात से घर नहीं आया," उन्होंने कहा।
मेरे हाथ रुक गए।
"मैं कल रात उसे लेकर आया था," मैंने कहा। "अस्पताल से। वो वहाँ था, चाचा। नीचे, बंद कमरे में। हमने उसे निकाला। वो ठीक नहीं था, वो… वो सिर्फ़ डरा हुआ था। मैंने उसे चारपाई पर बिठाया था। और मैं कुछ देर के लिए मुड़ा, और —"
"वो घर नहीं आया," हबीब चाचा ने कहा। और फिर वो चुप हो गए।
मैंने उनके हाथ में गिलास देखा। वो काँप रहा था, और चाय उस काँप के साथ हल्की लहरें बना रही थी।
"मैंने उसे सुना नहीं," उन्होंने कहा। "तीस साल। मैंने उसे एक बार भी पूरा नहीं सुना। जब वो छोटा था, तो मैंने कहा, बड़ा होकर बताएगा। जब वो बड़ा हुआ, तो मैंने कहा, अब क्या बताएगा, आदमी हो गया। जब उसने चिट्ठियाँ लिखीं, तो मैंने उन्हें खोला ही नहीं। सात चिट्ठियाँ, अंकुश। सात। मैंने उन्हें संदूक में रख दिया और सोचा, बेटा आएगा तो मुँह पर कहेगा।"
उन्होंने गिलास नीचे रख दिया, बिना पिया।
"वो आया। रोज़ आया। मैंने उसे देखा, पर उसकी आवाज़ नहीं सुनी। कल रात मैं घर में अकेला बैठा था और मैंने सोचा — मुझे उसकी आवाज़ याद करनी है। बस एक बार। सिर्फ़ इतना याद करना है कि वो कैसे बोलता था।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे।
"अंकुश, मुझे उसकी आवाज़ याद नहीं आ रही।"
दुकान में सन्नाटा था। पीछे के कमरे का बल्ब गुनगुना रहा था। मेरे हाथ में चाय का गिलास था और मुझे लगा कि मैं उसे ज़मीन पर रख दूँ, क्योंकि मेरे हाथ भी अब काँप रहे थे।
"तीस साल में मैंने उसकी आवाज़ सुनी ही नहीं," हबीब चाचा ने कहा। "तो अब याद क्या आएगी? याद तो उसी की आती है जिसे सुना हो।"
मैंने गिलास रखा और उनके सामने बैठ गया। स्टूल पर नहीं, नीचे ज़मीन पर बिछी बोरी पर। उनके घुटनों के पास।
"चाचा," मैंने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"आपके घर की मुंडेर पर सात लिफ़ाफ़े पड़े थे। उनमें से किसी में उसने लिखा था कि वो कहाँ है?"
उन्होंने सिर हिलाया। "आख़िरी में। आख़िरी वाले में उसने लिखा था — बाबा, मैं साइट पर हूँ, पर साइट के नीचे भी एक साइट है। मैं उसके नीचे जाता हूँ। और मैं वहाँ से कुछ लेकर आता हूँ जो आपके आँगन में रखना है।"
मेरी पीठ ठंडी हो गई।
"नीचे," मैंने दोहराया।
"नीचे," उन्होंने कहा। "मैंने उसे पढ़ा और सोचा, बेटा बड़ी बातें करने लगा है। और मैंने वो काग़ज़ वापस पोटली में रख दिया। और उस रात वो घर नहीं आया।"
कुछ देर दोनों चुप रहे। फिर उन्होंने धीरे से कहा, इतने धीमे कि जैसे ये बात खुद से कह रहे हों, मुझसे नहीं —
"मैं बूढ़ा हूँ, अंकुश। मेरी उम्र में आदमी कोशिश नहीं करता, दुआ करता है। पर आज सुबह मैंने दुआ नहीं की। आज सुबह मैंने सोचा, अगर मैं सच में कुछ कर सकता हूँ, तो वो एक ही चीज़ है — मैं उस आदमी के पास जाऊँ जो मेरे बेटे को ढूँढ सकता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"तू वही है ना?"
मैंने उनके हाथों को अपने दोनों हाथों में ले लिया।
"हाँ, चाचा," मैंने कहा। "मैं वही हूँ।"
और फिर मैंने वो कहा जो मैंने आज तक किसी से इतने यक़ीन से नहीं कहा था, शायद इसलिए कि आज तक मुझे इतना डरा हुआ कोई नहीं मिला था, जिसके सामने मैं खुद को सीधा रख सकूँ।
"मैं इमरान को लाऊँगा, चाचा। ज़िंदा। और बोलता हुआ। और उस दिन आप उसकी आवाज़ सुनेंगे, और आपको याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि वो आपके सामने बोलेगा।"
हबीब चाचा की आँखों में पानी आ गया। उन्होंने उसे पोंछा नहीं। उन्होंने बस गिलास उठाया और पहली बार चाय पी।
"कड़वी है," उन्होंने कहा।
"मैंने चीनी कम डाली है।"
"अच्छा किया," उन्होंने कहा। "जब बेटा मिलेगा, तब मीठी पी लूँगा।"
मैं हँसा। और मुझे लगा कि आज पहली बार कुछ ठीक हुआ है।
तभी गली के मुँह से मीरा आई।
उसका कैमरा कंधे पर था, बाल बिखरे हुए, और वो सीधे मेरी दुकान की तरफ़ आई। हबीब चाचा को देखकर वो एक पल रुकी, फिर मेरी तरफ़ देखकर बोली —
"इमरान का नंबर बंद है।"
"बंद?" मैंने कहा।
"नहीं, ये कहने से बात पूरी नहीं होती।" मीरा ने अपना फटा बैग खोला और उसमें से एक काग़ज़ निकाला, जिस पर उसने अपने हाथ से कुछ लिखा था। "जब मैंने नंबर मिलाया, तो उस तरफ़ से आवाज़ आई — ये नंबर अब किसी के नाम पर नहीं है।"
मैंने हबीब चाचा की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनके चेहरे पर वो भाव था जो इंसान के चेहरे पर तब आता है जब पता चले कि दुश्मन सिर्फ़ लड़ाई नहीं कर रहा, वो तैयारी भी कर रहा है।
"एक दिन में नंबर कैसे बंद हो जाता है?" चाचा ने पूछा।
मीरा ने धीरे से कहा, "जब कोई उसे जान-बूझकर बंद करवा दे, तो हो जाता है।"
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