The Mysterious Bell – Chapter 590
और मेज़ के एक कोने में, एक छोटा पीतल का दीया — बुझा हुआ। उसके नीचे जली हुई रुई और थोड़ा काला तेल।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो पहले से उन रजिस्टरों की तरफ़ बढ़ रही थी, जैसे पत्रकार का हाथ बिना सोचे माइक की तरफ़ बढ़ता है।
"रुको," मैंने कहा। "पहले देख लो कि अंदर कोई ज़िंदा है या नहीं।"
"तुम्हें लगता है, कोई ज़िंदा है?" उसने पूछा।
"इमरान ज़िंदा हुआ तो हो सकता है," मैंने कहा।
हमने टॉर्च घुमाई। कमरा चौकोर था — कोई तीस फुट लंबा, बीस फुट चौड़ा। दीवारें पत्थर की, ऊपर छत पर लोहे के शहतीर, उनसे लटकते टूटे बल्ब। कोई भी बल्ब जला नहीं रहा था।
और एक कोना — सबसे दूर बायां — वहाँ कुर्सियाँ नहीं थीं। वहाँ दीवार से सटाकर एक लकड़ी का संदूक रखा था। उसके ऊपर धूल की मोटी परत। संदूक के पास एक उलटी पड़ी कुर्सी। और उस कुर्सी के पास कुछ…
"मीरा," मैंने धीरे से कहा। "वहाँ रोशनी कर।"
उसने टॉर्च घुमाई।
और अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं आया।
इमरान।
वो उस कोने में, संदूक की तरफ़ पीठ किए, फ़र्श पर बैठा था। घुटने सीने से चिपके हुए। सिर नीचा। और दोनों हाथ — दोनों हाथ अपने सिर पर रखे हुए।
वो हिल नहीं रहा था। हाँफ़ भी नहीं रहा था। बस बैठा था — जैसे कोई बच्चा जो खेल में हारकर कोने में बैठ गया हो।
"इमरान!" मैंने कहा और दौड़कर उसकी तरफ़ बढ़ा।
वो उठा नहीं। मैंने उसका कंधा पकड़ा। उसका शरीर ठंडा था — ठंडा नहीं, गर्म नहीं। जैसे किसी कपड़े को रात भर बाहर छोड़ दिया हो।
"इमरान, उठ। हम आए हैं।"
उसने सिर उठाया। आँखें खुली थीं, पर कुछ और देख रही थीं — मुझे नहीं। शायद इस कमरे को भी नहीं। कुछ और दूर।
"तुम्हें पता है," उसने कहा, इतनी धीमी आवाज़ में कि मुझे उसके होंठों की हरकत देखनी पड़ी, "यहाँ हवा का आना-जाना किसी-किसी रात होता है। सिर्फ़ तब, जब बाहर बारिश आती है। और मैंने यहाँ तीन बारिशें सुनी हैं।"
"कितनी देर हो गई, इमरान?" मीरा ने पूछा।
"पता नहीं," उसने कहा। "कमरे में अंधेरा है। ऊपर की सीढ़ी से जो रोशनी आती है, वो भी तो नहीं आ रही।"
"पर तुम बोल रहे हो," मैंने कहा। "मतलब कुछ तो हुआ। कोई तो आया।"
वो चुप हुआ।
फिर बोला — और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ पहचाना-सा डर आया।
"एक आदमी आया," उसने कहा। "सफ़ेद कुर्ते में। यहीं बैठ गया। मेरे सामने। बहुत देर बैठा। कुछ नहीं बोला। फिर उठकर चला गया — और जाते-जाते इतना ही कहा कि तू अंकुश के पास नहीं जाएगा। क्योंकि तू अंकुश को भूल जाएगा।"
"क्या?" मैंने कहा।
"मैंने कहा कि नहीं भूलूँगा," इमरान ने कहा। "तो उसने कहा कि भूल जाएगा, क्योंकि यहाँ अंदर आदमी वक़्त भूल जाता है। पहले दिन, फिर दिन, फिर सब। मैं सोचता रहा कि ये सब क्या बकवास है। पर…" वो रुका। "भैया, मुझे अब याद नहीं आ रहा कि मैं यहाँ कब आया। कल आया था? या उससे पहले? मुझे याद है कि बाहर रोशनी थी और मैं साइट की तरफ़ जा रहा था। फिर यहाँ। फिर कुछ नहीं।"
मेरे पेट में कुछ पत्थर जैसा बैठ गया।
टिंकू ने इमरान का हाथ पकड़ा। इमरान ने उसकी तरफ़ देखा, और पहली बार उसकी आँखों में कुछ जाना-पहचाना आया।
"टिंकू?" उसने कहा। "तू भी यहाँ?"
"मैं तो तुझे लेने आया हूँ, निकम्मे," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"चलो," मीरा ने कहा। "पहले इसे ऊपर ले चलो। फिर जो देखना है देखेंगे।"
"नहीं," मैंने कहा।
वो रुकी।
"अंकुश—"
"मीरा, अगर हम अभी ऊपर चले गए," मैंने कहा, "तो साहब का आदमी रात भर में ये कमरा एक बार फिर बंद करवा देगा। और अगली बार उस दरवाज़े को खोलने के लिए हमें एक और बत्तीस साल लगेंगे। हमें एक चीज़ चाहिए — सबूत। वो कुछ ऐसा, जो ज़मीन के साथ सीधा जुड़े।"
"रेजिस्टर?" मीरा ने मेज़ की तरफ़ इशारा किया।
"हाँ," मैंने कहा।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी गरम थी। बहुत गरम।
"क्या चाहिए?" मैंने धीरे से पूछा।
घंटी चुप रही।
"बोल ना," मैंने कहा।
"तीन," घंटी ने कहा।
"तीन क्या?"
"तीन खटखटाहटें सुन," घंटी ने कहा। "वो तुझे बताएँगी।"
और तभी…
टक।
टिंकू ने अपना हाथ मेरी कलाई पर जोर से दबाया।
टक।
मीरा ने टॉर्च को उस दीवार पर की जिसकी तरफ़ मेरी पीठ थी।
टक।
तीन आवाज़ें। धीमी। बराबर। और बेहद करीब।
दीवार के अंदर से।
मैंने तेज़ी से पीछे मुड़कर देखा। दीवार — बस दीवार। पीछे वाली दीवार जिस पर वो चौकोर निशान नहीं था। सिर्फ़ धूल और पत्थर।
"फिर से?" मैंने कहा।
पर तीन खटखटाहटें फिर नहीं आईं।
घंटी ने कहा — "अब समझा? ये इंसान नहीं। ये वादा है। कोई सात आदमियों ने मिलकर ये ज़मीन दी थी, अस्पताल के नाम पर। और उन सातों ने शर्त लगाई थी कि ज़मीन बिकेगी नहीं। अब किसी ने बेच दी। पर सातों में से एक भी अभी तक चुप है — क्योंकि उसे पता ही नहीं चला। और वो चुप्पी," घंटी ने कहा, "यहाँ दीवार के अंदर बैठी है। वो खटखटाती है। रोज़ नहीं। हर साल नहीं। तीसरे साल।"
"क्यों तीसरे साल?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि तीसरा साल," घंटी ने कहा, "ब्याज का साल होता है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा — मुँह खुला, आँखें बड़ी।
"भैया, ये क्या बोल रही है?"
"मतलब," मैंने कहा, "ये आवाज़ें कोई डराने के लिए नहीं हैं। ये सिर्फ़ गिनती कर रही हैं। जैसे कोई बंदा हर तीसरे साल दस्तक देता है और पूछता है — किसी को याद है कि ये ज़मीन किसकी है?"
"तो फिर इस बार," मीरा ने कहा, "तीसरा साल क्यों?"
"क्योंकि इस बार," मैंने कहा, "सातवें आदमी की चुप्पी को भी कुछ महसूस हुआ है। मेरे दादा जगदीश यादव।"
और उसी वक़्त, आख़िरी खटखट के बाद, दीवार के उसी हिस्से से एक पतली दरार फूटी — जैसे चूने के नीचे कुछ साँस ले रहा हो। दरार से धूल का एक पतला झोंका नीचे गिरा।
मैंने मीरा का हाथ पकड़ा।
"उठाओ इमरान को," मैंने कहा। "पहले ऊपर ले चलो। फिर उतरेंगे।"
"और रजिस्टर?" उसने पूछा।
"रजिस्टर का एक भी पन्ना," मैंने कहा, "बिना मेज़ के बताए नहीं उठेगा। मुझे देखना है कि कौन सा रजिस्टर खुद को उठने देता है।"
हमने इमरान को बीच में लिया — एक तरफ़ मैं, दूसरी तरफ़ टिंकू, और मीरा आगे टॉर्च लिए। हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
और जैसे ही मैंने पहली सीढ़ी पर पैर रखा, इमरान ने मेरे कान के पास धीरे से कहा —
"अंकुश भैया, एक बात।"
"हूँ।"
"उस आदमी ने जाते वक़्त एक चीज़ छोड़ी थी," उसने कहा। "एक चीज़ जो मैंने उस संदूक के नीचे छिपा दी है, क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैं उसे अपने पास रखूँगा, तो वो मुझे ले जाएगा। वो काग़ज़ नहीं थी। वो एक चीज़ थी।"
"क्या चीज़?" मैंने पूछा।
"पीतल की सीटी," इमरान ने कहा। "बिल्कुल वैसी ही, जैसी बंसीलाल चाचा की है।"
मैं एक पल के लिए रुका।
मैंने ऊपर सीढ़ी की तरफ़ देखा — जहाँ से रोशनी आ रही थी। जहाँ बंसीलाल को खड़ा होना चाहिए था।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो पहले से ऊपर की तरफ़ देख रही थी। उसके चेहरे पर जो था, वो मैंने पहचान लिया — पत्रकार का डर नहीं था, इंसान का डर था।
हम ऊपर पहुँचे। दरवाज़ा खुला था। बाहर लोहे के फाटक की तरफ़ से हबीब चाचा की आवाज़ आ रही थी — "अंकुश! जल्दी आ!"
और सीढ़ी पर, ठीक उसी दूसरी सीढ़ी पर जहाँ बंसीलाल खड़े थे…
सिर्फ़ उनकी पीतल की सीटी पड़ी थी।
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