The Mysterious Bell – Chapter 589
"कौन बैठता था?"
"जिनके नाम यहाँ लिखे हैं," मैंने कहा। "और जिनके नाम मिटा दिए गए।"
तभी माचिस बुझ गई। टिंकू ने तीसरी जलाई।
और तीसरी की रोशनी में मैंने देखा — कमरे की सबसे पीछे वाली दीवार पर, ज़मीन से थोड़ा ऊपर, एक चौकोर निशान था।
साफ़ निशान। जैसे वहाँ से कोई चीज़ हटाई गई हो। धूल से अलग रंग — दीवार की सीलन के बीच एक साफ़, सूखा चौकोर।
मैंने अपनी आँखें सिकोड़ीं।
"मीरा, देखो ये।"
वो मेरे पास आई। तीली की रोशनी में उसने देखा।
"कुछ था यहाँ," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "कुछ बड़ा। शायद एक तस्वीर। या कोई तबेला। या—"
और तभी…
टक।
एक आवाज़ आई। बहुत धीमी।
टक।
दूसरी।
टक।
तीसरी।
टिंकू ने डरकर पीछे देखा।
"भैया, कौन?"
मैंने अपने कान सीधे किए। आवाज़ दीवार के अंदर से आ रही थी। पीछे वाली दीवार से। उसी चौकोर निशान के पीछे से।
टक। टक। टक।
तीन धीमी आवाज़ें। जैसे कोई अंदर से दीवार खटखटा रहा हो। बस इतनी धीमी, जैसे ख़ुद भी डर रहा हो कि कहीं कोई सुन न ले।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी गरम थी। इतनी गरम कि कपड़े के बाहर से भी महसूस हुई।
और घंटी ने कहा —
"यहाँ टूटा इंसान नहीं। वादा है।"
मैंने घंटी को जेब से निकाला। तीली की रोशनी में उसका पीतल चमका। उस पर खुदा फूल आज किसी और तरह से दिख रहा था — जैसे वो फूल नहीं, कोई छोटा-सा दरवाज़ा हो।
"कैसा वादा?" मैंने धीरे से पूछा।
"जो तीन बार खटखटाता है," घंटी ने कहा, "वो अपनी बात नहीं कहता। वो सिर्फ़ याद दिलाता है"वो सिर्फ़ याद दिलाता है," घंटी ने कहा।
"क्या याद दिलाता है?" मैंने पूछा।
"कि यहाँ कुछ बंद है," घंटी ने कहा। "और बंद चीज़ें जब बहुत देर तक बंद रह जाएँ, तब वो खटखटाने लगती हैं। खुद को याद दिलाने के लिए नहीं। उनको याद दिलाने के लिए, जो उन्हें भूल गए।"
टिंकू ने तीली को ऊपर उठाया। रोशनी में दीवार का वो चौकोर निशान और साफ़ दिखा।
"भैया," उसने धीरे से कहा। "मुझे यहाँ डर लग रहा है।"
"डर अच्छी चीज़ है, टिंकू," मैंने कहा। "डर बताता है कि तू ज़िंदा है। जो नहीं डरता, वो या तो बहादुर है, या मर चुका है।"
"और तुम?" उसने पूछा। "तुम्हें डर नहीं लगता?"
"मुझे बहुत लगता है," मैंने कहा। "बस मैंने उससे नमस्ते कर ली है। अब वो मेरे साथ चलता है, पीछे नहीं रहता।"
मीरा ने आगे कदम बढ़ाया। उसकी छोटी टॉर्च की बत्ती झिलमिला रही थी। दीवारें अंदर से मोटी थीं — पुराने पत्थर, उनके बीच धूल की सफ़ेद लकीरें, ऊपर से टपकता पानी।
"इसमें हवा नहीं है," उसने कहा। "मतलब यहाँ आख़िरी बार दरवाज़ा खुला, बहुत साल पहले था।"
"और अगर हवा नहीं, तो खटखटाने वाला भी कहाँ से आया?" टिंकू ने पूछा।
"इसीलिए," घंटी ने कहा, "यहाँ टूटा इंसान नहीं। वादा है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे पूछ रहा हो — भैया, तू ही समझा दे।
मैंने घंटी को जेब में वापस नहीं रखा। हाथ में रखी।
नीचे, सीढ़ी के अगले मोड़ पर, वो सफ़ेद परछाईं अब भी खड़ी थी। अब और पास — सिर्फ़ दो सीढ़ियाँ दूर। उसका चेहरा पूरा नहीं दिख रहा था, पर उसका कुर्ता ऐसा था जैसे बरसों से न धोया गया हो — सफ़ेद, पर पीले की तरफ़ झुका हुआ, किनारों पर ज़र्दी।
और उसने फिर कहा —
"नाम ठीक बोला। अंकुश यादव। बाप शंकर यादव। माँ सुशीला। बहन काजल। पर अंकुश," उसने कहा, "तूने सीढ़ियाँ नहीं गिनीं।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
पर मैंने किसी को कुछ महसूस नहीं होने दिया। मैंने सीढ़ी के पत्थर पर पैर जमाया और ऐसे हँसा जैसे कोई पुरानी गली में चाय वाला मज़ाक कर रहा हो।
"सीढ़ियाँ?" मैंने कहा। "भाई साहब, मैं सुबह उठकर सबसे पहले कुछ नहीं गिनता। न सीढ़ियाँ, न चाय के कप, न चप्पल। सीधे काम पर लगता हूँ। गिनती मेरी कभी अच्छी नहीं रही। स्कूल में मास्टर जी कहते थे — अंकुश, तू पहाड़ा भूल जाता है, पर पेंच कसना याद रहता है।"
सफ़ेद परछाईं चुप रही।
"और नाम," मैंने कहा, "नाम मुझे पूरा याद है। बाप, माँ, बहन, गली, दुकान — सब याद है। क्योंकि ये चीज़ें गिनने की नहीं, जीने की होती हैं।"
मेरा हाथ टिंकू के कंधे पर गया।
"बोल, टिंकू," मैंने कहा। "अपना पूरा नाम बोल। ज़ोर से।"
टिंकू ने गला साफ़ किया। पहले उसकी आवाज़ फँसी, फिर खुल गई।
"टिंकू," उसने कहा, फिर रुका, और ज़ोर से बोला, "टिंकू यादव। बाप — वो नहीं हैं। पर माँ — शीला देवी। गली — साइकिलों की गली। उस्ताद — अंकुश भैया।"
मेरी आँखें भर आईं। पर मैंने मुस्कुराकर छुपा लिया।
"मीरा," मैंने कहा।
मीरा ने सीधे परछाईं की तरफ़ देखा — बिना डरे, बिना झुके।
"मीरा तिवारी," उसने कहा। "बस्ती की आवाज़। पापा की बेटी। और जो काग़ज़ मैंने पाँच साल पहले ग़लत छापा था, उसे आज ठीक करने आई हूँ।"
परछाईं ने एक कदम पीछे किया।
फिर बोली — और इस बार उसकी आवाज़ में वो मिठास थोड़ी कम थी।
"नाम जानते हो," परछाईं ने कहा। "पर सीढ़ी गिनने से क्या फ़र्क़ पड़ता है, वो नहीं जानते। शंकर यादव को पता था। वो सीढ़ियाँ गिनते हुए उतरे थे — अट्ठाईस। और इस बार भी अट्ठाईस ही गिनी।"
मैं ठिठका।
"पापा ने गिनी थीं?"
"जिस दिन उन्होंने उस दरवाज़े के नीचे अंगूठा लगाया था, उस दिन भी यहाँ आए थे," परछाईं ने कहा। "पर अंगूठा लगाने से पहले। शायद यही सोचकर कि यहाँ कुछ ऐसा मिलेगा, जो उन्हें रोक देगा।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा उतर गया।
मैंने परछाईं को ठीक से देखना चाहा — चेहरा, आँखें, हाथ — पर रोशनी वहाँ तक नहीं पहुँच रही थी। टिंकू की तीली की लौ काँप रही थी, जैसे खुद भी कुछ देखकर डर गई हो।
और फिर…
परछाईं कुछ और नहीं बोली।
बस ठंडी हवा की तरह, एक झोंके में, वो कमरे की दीवार में घुल गई। जैसे किसी ने गहरी साँस ली हो, और साँस के साथ ही वो गायब हो गई।
टिंकू ने पीछे देखा।
"भैया, वो…"
"हाँ," मैंने कहा। "गई।"
"कहाँ?"
"अगर मुझे पता होता," मैंने कहा, "तो मैं तुमसे क्यों पूछता?"
मीरा ने टॉर्च की बत्ती उस जगह पर की जहाँ परछाईं खड़ी थी। ज़मीन पर कुछ नहीं था। बस पत्थर का फ़र्श, और उस पर एक पतला-सा नम निशान — जैसे कोई नंगे पैर से वहाँ खड़ा हुआ हो और फिर हट गया हो।
"ये सूख रहा है," मीरा ने कहा। "मतलब अभी भीगा था।"
"मतलब वो हमसे पहले यहाँ थी," मैंने कहा। "बहुत पहले नहीं।"
हम आगे बढ़े। सीढ़ियाँ खत्म हुईं और हम एक चौड़े, ठंडे तहखाने में उतर आए।
यहाँ हवा में गंध थी — जला हुआ काग़ज़ और उसके ऊपर फिनाइल। दोनों मिलकर एक ऐसी बदबू बना रहे थे, जो नाक में नहीं, सीने में लग रही थी।
टिंकू ने तीसरी तीली जलाई। चौथी, पाँचवीं, छठी — हर बार जल्दी-जल्दी, जैसे अंधेरे को थोड़ी देर और दूर धकेलना हो।
और रोशनी में जो दिखा, उसने मेरा मुँह खामोश कर दिया।
कुर्सियाँ।
बीस-पच्चीस पुरानी लकड़ी की कुर्सियाँ — कुछ की पीठ टूटी, कुछ की टाँगें ज़ंग लगी कीलों से जुड़ी, कुछ पर धूल की इतनी मोटी परत कि लगा चादर ओढ़ी हो। सब एक आयत में रखी हुईं। सब एक-दूसरे से बराबर दूरी पर। जैसे किसी सभा के लिए सजाई गई हों।
और उनके सामने, दीवार से सटी एक लंबी लकड़ी की मेज़।
मेज़ पर रजिस्टरों का ढेर। बीस, तीस, शायद पचास। लाल जिल्द, भूरी जिल्द, कुछ बिना जिल्द के, धागे से सिले। किसी पर मोटी धूल, किसी पर चूने की सफ़ेद बूँदें।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno