The Mysterious Bell586 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 586

6 min read November 5, 2026

और उसके चारों तरफ़ पेंसिल से एक गोल घेरा खींचा हुआ था।

"ये क्या है?" टिंकू ने मेरे कंधे के ऊपर से झाँककर कहा।

"किसी ने हमें रास्ता दिखाया है," मैंने कहा।

"रास्ता या जाल?" हबीब चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी। "यही तो वो कमरा है जिसमें इमरान को बंद किया जा रहा है।"

"देखिए," मीरा ने कहा।

उसने अपनी उँगली नक़्शे के दाहिने कोने पर रखी। वहाँ पेंसिल से एक छोटी सी तारीख़ लिखी थी। हाल्की, मिटी-मिटी। जैसे किसी ने जल्दी में लिखी हो।

"ये तारीख़?" टिंकू ने कहा।

"रविवार," मीरा ने धीमे से कहा।

कुछ देर कोई नहीं बोला।

वो रविवार — वही रविवार जो इसी हफ़्ते आने वाला था। और वही रविवार जिस दिन रणवीर भारद्वाज ने मेले के मैदान में ज़मीन के दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर कराने की सभा रखी थी।

"तो मतलब," बबलू ने धीरे से कहा, "अब तक तो बोला जा रहा था कि कमरा शाम को खुलेगा। रविवार — होली का दिन — ताला खुलेगा।"

"हाँ," मीरा ने कहा। "और मतलब यह भी है कि अब हमारे पास सिर्फ़ पाँच दिन हैं। उससे ज़्यादा नहीं।"

हबीब चाचा फाटक के पास खड़े थे। उनके हाथ जोड़े हुए थे। मैंने देखा — उनकी नज़र उस काग़ज़ पर थी जो मेरे हाथ में था।

और फिर वो घुटनों पर बैठ गए।

"चाचा—" मैंने कहा।

"मैंने फिर से खो दिया," वो बोले।

उनकी आवाज़ टूट गई। वो धूल भरी ज़मीन पर घुटनों पर बैठे थे, और उनके हाथ दोनों तरफ़ फैले थे, जैसे कुछ ढूँढ रहे हों जो कभी था ही नहीं।

"चाचा, उठिए," मैंने कहा और उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"मैं नहीं उठूँगा," वो बोले। "मैंने उसे शहर जाने से नहीं रोका। मैंने उसे सात चिट्ठियाँ लिखने दीं, और एक भी नहीं पढ़ी। मैंने उसे अपने ही आँगन में अपने ही हाथ से पानी भरने से रोका। और अब वो उस कमरे में है जहाँ मेरे जैसा कोई नहीं पहुँच सकता।"

मैं उनके पास बैठ गया। मेरे घुटने उनके घुटनों के सामने थे।

"चाचा, वो ज़िंदा है," मैंने कहा। "मैं जानता हूँ आपको यक़ीन नहीं हो रहा। पर जो मर जाता है, उसका मुँह बंद हो जाता है। इमरान का नहीं हुआ। उसने फोन किया। उसने एक शब्द कहा। और एक शब्द कहने वाला इंसान अभी यहीं है, इस शहर में, इस दीवार के पीछे। और जो ज़िंदा है, उसे ढूँढना हमारा काम है।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"अगर वो ज़िंदा है," उन्होंने कहा, "तो मैं पहले उसे थप्पड़ मारूँगा।"

"मारिए," मैंने कहा।

"फिर गले लगाऊँगा।"

"लगाइए।"

"और फिर उसे अपनी सातों चिट्ठियाँ पढ़कर सुनाऊँगा," वो बोले। "और बताऊँगा कि मैंने उन्हें क्यों नहीं छुआ।"

मैंने हाथ बढ़ाया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। मैंने उन्हें उठाया। वो खड़े हो गए। उनके घुटनों पर धूल थी। मैंने अपनी जेब से रूमाल निकाला और उनकी तरफ़ बढ़ाया।

"नहीं," उन्होंने कहा। "धूल रहने दो। जब तक ये धूल नहीं जाती, तब तक मैं जानता रहूँगा कि मेरा बेटा अंदर है।"

तभी मेरी जेब में घंटी बजी। एक बार। पतली, फीकी। पर इस बार उसमें वो गूँज नहीं थी जो आम तौर पर होती थी। इस बार वो ऐसी बजी, जैसे कोई दूर से बुला रहा हो — कोई ऐसा जो पास नहीं, पर दूर भी नहीं।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"क्या कहा?" उसने पूछा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "अभी कुछ नहीं।"

"घंटी ने कुछ कहा?"

"उसने कहा," मैंने धीमे से कहा, "कि अंदर मुझे जो मिलेगा, वो वो नहीं होगा जो मैं ढूँढ रहा हूँ।"

"ये उसने नहीं कहा," मीरा ने कहा। "ये तुमने खुद कहा।"

"तुम्हें कैसे पता?"

"क्योंकि जब घंटी कुछ कहती है," उसने कहा, "तो तुम्हारा चेहरा बदल जाता है। जब तुम खुद कहते हो, तो तुम्हारी आँखें।"

मैं हँसा।

"तुम पत्रकार हो," मैंने कहा। "तुम्हें सब दिखता है।"

"यही मेरा काम है," उसने कहा।

बंसीलाल उस वक़्त तक हमारे पीछे खड़े थे। मैंने देखा वो अपनी कमर से कुछ निकाल रहे थे। एक काली चाबी — वही जो उन्होंने कल दी थी। पर उन्होंने उसे वापस अपनी जेब में रख लिया था। अब वो उसे फिर से मेरी तरफ़ बढ़ा रहे थे।

"ये लो," उन्होंने कहा। "पर सुनो।"

"बोलिए।"

"अंदर जाते ही दरवाज़ा बंद मत करना," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "बत्तीस साल पहले मैंने एक बार इस कमरे का दरवाज़ा पीछे से बंद किया था — एक आदमी के कहने पर। उस आदमी ने कहा था कि अंदर कुछ ज़रूरी रखा है, कोई न देखे। और उसके बाद से मैं उस दरवाज़े को खुद नहीं खोल पाया। आज तुम खोल रहे हो। पर खुला रहने दो। खुला रखने से अंदर हवा आती है। और जहाँ हवा आती है, वहाँ आदमी ज़िंदा रहता है।"

मैंने चाबी ली।

"मैं ये याद रखूँगा," मैंने कहा।

"नहीं," उन्होंने कहा। "याद मत रखो। बस दरवाज़ा बंद मत करना।"

मैंने चाबी को अपनी हथेली में रखा। पर फिर मैंने मुड़कर देखा।

पीपल के नीचे से टिंकू आ रहा था, उसके हाथ में एक लंबी सी चीज़ थी। जब वो पास आया तो देखा — वो एक लकड़ी का लंबा डंडा था, जिसके ऊपर एक छोटी सी पीतल की बाल्टी टँगी थी।

"ये क्या है?" मैंने पूछा।

"माइक," उसने कहा, बड़े गर्व से।

"ये माइक नहीं, बाल्टी है," मीरा ने कहा।

"अंकुश भैया ने कहा था ना," टिंकू ने कहा, "कि जो अंदर जाए, उसकी आवाज़ बाहर सुननी चाहिए। तो मैंने सोचा — ये बाल्टी से बोलेंगे तो आवाज़ दूर तक जाएगी।"

मैं हँसा। पहली बार उस सुबह मैं सच में हँसा था।

"ठीक है," मैंने कहा। "बाल्टी रख टिंकू। तू मेरे साथ अंदर आ रहा है। अगर मुझे कुछ हो जाए तो तू बाहर आकर उस्ताद को सीटी दे। और अगर तू न आ पाए, तो बाल्टी को पत्थर मारकर बजाना।"

"पर भैया—"

"बाल्टी ही सही," मैंने कहा। "माइक से बेहतर है।"

मीरा ने देखा।

"अंकुश," उसने कहा, "मैं चाहती हूँ कि तुम एक बात मानो।"

"क्या?"

"जब हम अंदर जाएँ," उसने कहा, "तो जो भी मिले — साँप, खज़ाना, आदमी, आवाज़ — तुम मेरी तरफ़ देखकर पहले मेरा हाथ थामना। पहले मुझे बताना। क्योंकि अगर तुम अकेले दौड़ोगे, तो मैं तुम्हारे पीछे नहीं आऊँगी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्यों?"

"क्योंकि तुम्हारे पीछे दौड़ने वाले बहुत हैं," उसने कहा। "टिंकू, बच्चे, चाचा, बबलू। मैं उनमें नहीं हूँ। मैं तुम्हारे साथ चलने वाली हूँ। और साथ चलने वाले एक-दूसरे का हाथ पहले थामते हैं, पीछे नहीं देखते।"

मैंने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।

"ठीक है," मैंने कहा।

हबीब चाचा ने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी तरफ़ देखा। मैंने उन्हें अपनी कलाई दी। उन्होंने उसे कसकर थामा।

"मैं यहीं रहूँगा," उन्होंने कहा। "फाटक पर। और जब तक मेरा बेटा बाहर नहीं आता, मैं अपनी जगह से हिलूँगा नहीं।"

"चाचा," मैंने कहा, "अगर आपको कोई और आता दिखे — जो अंदर जाने की कोशिश करे — तो—"

"तो मैं उसका नाम पूछूँगा," उन्होंने कहा। "और अगर वो नाम न बताए, तो मैं अपनी लाठी उठाऊँगा।"

"आपकी लाठी?"

"मेरी लाठी नहीं," उन्होंने कहा। "इमरान की साइकिल का हैंडल। मैंने उसे आज सुबह आँगन से उठा लिया था। दोनों सिरों पर रबर की ग्रिप है। सत्तर साल के बूढ़े के हाथ में वो लाठी से कम नहीं लगता।"

मैं हँसा और उनकी तरफ़ देखा।

फिर मैंने बबलू की तरफ़ देखा। वो अब भी मेरी तरफ़ देख रहा था, अपने हाथ की लाल जगह को रगड़ते हुए।

"बबलू," मैंने कहा, "तू बाहर रहेगा।"

"मैं बाहर रहूँगा," उसने कहा। "मैं अपने हाथ पर क़सम खाता हूँ। आज जो मेरे हाथ पर लिखा हुआ जा रहा है — वो तेरा नाम है, अंकुश। मैं इसे मिटाऊँगा नहीं।"

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