The Mysterious Bell – Chapter 585
“मैं उस दिन उसके पास बैठा था,” उन्होंने कहा, “जब वो पाँच साल का था और उसने मेरी पहली चाय बनाई थी। उसने चीनी नहीं डाली थी। मैंने कहा था — चीनी नहीं डाली। और वो रो पड़ा था।”
उनके हाथ काँप रहे थे।
मैंने उनके दोनों हाथ पकड़े और उन्हें उठाया। मेरी पीठ में खिंचाव आया, पर मैंने उन्हें उठा ही लिया। उनका वज़न पहले से कम लगा — जैसे डर आदमी का वज़न भी खा जाता है।
“चाचा, सुनिए,” मैंने कहा। “इमरान अभी ज़िंदा है।”
“तुम्हें कैसे पता?”
“क्योंकि उसने फोन किया,” मैंने कहा। “मरा हुआ आदमी फोन नहीं करता। उसने सिर्फ़ दो शब्द कहे — काला। और लाइन काट दी। मरा हुआ आदमी फोन नहीं काटता। वो सिर्फ़ चुप हो जाता है।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“और ये हेलमेट?” उन्होंने कहा। “ये किसने लौटाया?”
“जिसने इसे कल लिया था,” मैंने कहा। “वो हमें डरा रहा है। वो चाहता है कि हम डरकर पीछे हट जाएँ। पर एक बात वो भूल गया।”
“क्या?”
“जो आदमी डराने के लिए चीज़ें लौटाता है,” मैंने कहा, “वो खुद डरा हुआ है। क्योंकि अगर उसे डर न होता, तो वो कुछ लौटाता ही नहीं।”
हबीब चाचा ने मेरी बात सुनी। फिर उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं और सीधे खड़े हो गए।
“मैं फाटक पर रहूँगा,” उन्होंने कहा। “जब मेरा बेटा बाहर आएगा, तो पहले मैं उसके मुँह पर थप्पड़ मारूँगा। फिर गले लगाऊँगा। फिर सात चिट्ठियाँ न पढ़ने की माफ़ी माँगूँगा।”
“पहले थप्पड़?” टिंकू ने कहा।
“पहले थप्पड़,” उन्होंने कहा। “क्योंकि वो मेरा बेटा है। और बेटे को थप्पड़ भी बाप ही मारता है।”
उस्ताद ठीक उसी वक़्त आए। उनके गले में एक छोटी सीटी लटकी थी, जो उन्होंने किसी पुराने धागे से बाँधी थी। उनके हाथ में कैंची थी — वही कैंची, जो सुबह मुझे उनकी दुकान में नहीं दिखी थी।
“ये?” मैंने कहा।
“ये मेरी है,” उन्होंने कहा। “कल कोई मेरी दुकान से ले गया था और आज सुबह वापस रख गया।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“कुछ और गया?” मैंने पूछा।
“नहीं,” उन्होंने कहा। “पर एक चीज़ आई है।”
“क्या?”
“मेरी मशीन के नीचे एक पर्ची थी,” उन्होंने कहा। “छोटी सी। उसमें सिर्फ़ एक लाइन थी।”
“क्या लिखा था?”
“लिखा था — जो नीचे जाएगा, वो ऊपर नहीं आएगा।”
वो चुप हो गए। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वही चीज़ थी जो पचास साल पुरानी थी — एक आदमी जिसने पहले भी एक दरवाज़ा खोला था और फिर कभी उसे बंद नहीं कर पाया।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “अब भी वक़्त है।”
“नहीं है,” मैंने कहा।
“तू सोच ले।”
“उस्ताद,” मैंने कहा, “अगर हम आज नहीं गए, तो परसों रणवीर वो कमरा खुद खोलेगा। और उस वक़्त हमें न चाबी होगी, न दरवाज़ा, न इमरान।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर सीटी को हाथ में लिया और उसे बजाया — हल्की सी, जैसे किसी चिड़िया को बुला रहे हों।
“एक सीटी — रुको,” उन्होंने कहा। “दो सीटी — भागो। तीन सीटी — मैं खुद आऊँगा।”
“और अगर चार बजे?” टिंकू ने कहा।
“चार नहीं होगी,” उन्होंने कहा। “मैं सिर्फ़ तीन बजाऊँगा। उसके बाद सीटी बजाने वाला कोई नहीं होगा।”
शबनम आपा गुमटी से नहीं आईं। पर रज़िया आई। उसके हाथ में स्टील का गिलास था, जिसमें पानी था।
“चाचा,” उसने कहा और हबीब चाचा की तरफ़ बढ़ाया।
उन्होंने पानी पिया। फिर उसने गिलास वापस लिया और मेरी तरफ़ देखा।
“मैं पंद्रह साल बाहर रही हूँ,” उसने कहा। “मुझे पता है इंतज़ार क्या होता है। इंतज़ार सबसे ज़्यादा थकाता है। लड़ाई नहीं।”
“आप अंदर नहीं जाएँगी,” मैंने कहा।
“मैं नहीं जाऊँगी,” उसने कहा। “मैं गुमटी पर रहूँगी। और अगर सीटी बजी, तो मैं पहले उस चूल्हे को जलाऊँगी, फिर देखूँगी क्या होता है।”
मैं हँसा।
“यही ठीक है,” मैंने कहा।
बबलू पांडे नीम के नीचे से आया। उसने अपना सफ़ेद रूमाल खोला और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“इसके अंदर देखो,” उसने कहा।
मैंने रूमाल खोला। अंदर कोई चीज़ नहीं थी।
“क्या देखूँ?” मैंने कहा।
“इसके अंदर कुछ था,” उसने कहा। “एक छोटी पर्ची। और अब नहीं है।”
“क्या लिखा था?”
“मैं नहीं पढ़ सका,” उसने कहा। “पर उस पर लिखा था — अब घंटी किसके पास रहेगी।”
वो रुका। फिरबबलू ने अपनी जेब टटोली, जैसे वो पर्ची वहाँ से भी गायब हो गई हो।
"मैंने इसे दस मिनट पहले ही तो देखा था," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो ढीठपन नहीं था जो थाने के सामने हुआ करता था। "मैं सुबह से इसी रूमाल में बाँधे घूम रहा था। किसी को पता ही नहीं था कि इसमें क्या है।"
"किसी को पता था," मीरा ने कहा। उसने अपना कैमरा अभी भी नीचे किया हुआ था। "क्योंकि जिसने ये पर्ची रखी थी, उसे ये भी पता था कि तुम इसे कब खोलोगे।"
बबलू ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं जानता हूँ तुम सोच रहे हो कि मैंने खुद निकालकर कहीं और रख दी," वो बोला। "पर मैंने नहीं की। मैंने तुम्हें सच बताया था। मैं अब भी सच बोल रहा हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ काँप रहे थे। और उसका दाहिना हाथ, जिस पर सफ़ेद रूमाल बँधा था, वो रूमाल अब भी सूखा रहा होगा — पर उसके नीचे कुछ और था, जो मुझे दिख रहा था।
"अपना रूमाल खोलो," मैंने कहा।
"क्यों?"
"खोलो।"
उसने धीरे से गाँठ खोली। रूमाल के नीचे उसकी हथेली पर एक जगह लाल थी, जैसे किसी ने ज़ोर से दबाया हो।
"यह क्या है?" टिंकू ने पूछा।
"जब मैं सो रहा था," बबलू ने कहा, "तब किसी ने मेरा हाथ पकड़कर मेरे ही रूमाल में पर्ची बाँध दी। मुझे पता भी नहीं चला। उठा तो पर्ची को महसूस किया, और जैसे ही तुम लोगों को दिखाने के लिए खोला — वो अंदर नहीं थी।"
वो रुका।
"जैसे वो पर्ची खुद को देखने पर मर जाती है," उसने कहा। "जैसे वो चाहती थी कि तुम्हें पता चले — पर तुम्हारे हाथ में कुछ न आए।"
मेरी जेब में घंटी फिर हिली। एक हल्की सी, पतली आवाज़ — जैसे दूर से कोई साया बुला रहा हो।
मैंने चारों तरफ़ देखा। फाटक पर सिर्फ़ नीम का पेड़ था, सूखी नाली थी, और दूर अस्पताल की पीली दीवार। और उस दीवार के पास, धूल में, मुझे वो चीज़ दिखी जो अभी पाँच मिनट पहले वहाँ नहीं थी।
इमरान का पीला हेलमेट।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी देखा था। उसने कैमरा उठाया, एक फ्रेम लिया, फिर मेरी तरफ़ देखा — बिना कुछ कहे। मैंने सिर हिलाया। वो जानती थी कि मुझे क्या कहना है।
मैं दौड़कर उस हेलमेट के पास पहुँचा। टिंकू मेरे पीछे आया। हबीब चाचा ने धीरे से पुकारा — "इमरान?" — जैसे उनके मुँह से अपने आप निकल गया हो।
हेलमेट धूल में पड़ा था। ऊपर से फटा हुआ। टेप उसका जगह-जगह से उखड़ा हुआ। और वो धूल में इस तरह रखा था, जैसे किसी ने जान-बूझकर उसे सीधा करके नहीं, बल्कि हल्का सा तिरछा रखा हो।
मैंने उसे उठाया।
"अंकुश," मीरा ने कहा, "पाँच मिनट पहले ये यहाँ नहीं था।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा।
"फिर किसने—"
"जिसने बबलू के रूमाल में पर्ची रखी," मैंने कहा। "उसी ने इसे यहाँ रखा। जान-बूझकर। हमें दिखाने के लिए।"
मैंने हेलमेट के अंदर देखा। उसके अंदर का कपड़ा अलग करके मैंने उसी जगह हाथ डाला जहाँ से पहले नक़्शा मिला था।
इस बार भी कुछ था।
मैंने उसे बाहर निकाला। काग़ज़ का एक टुकड़ा — वो पहला फटा कोना, जो कल मिला था। पर इस बार उसके ऊपर कुछ और था। किसी ने उसी टुकड़े पर पेंसिल से एक छोटा सा कमरा बनाया था — चौकोर, दो लाइनें, एक-दो सीढ़ियाँ — और उसके ऊपर मोटे अक्षरों में लिख दिया था —
"काला कमरा"।
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