The Mysterious Bell – Chapter 584
“क्योंकि इसे लगाने वाले ने बाद में इसे मिटाने की कोशिश नहीं की,” उसने कहा। “झूठा अंगूठा लगाने वाला हमेशा मिटाने की कोशिश करता है। सच्चा अंगूठा लगाने वाला चुप बैठ जाता है। तुम्हारे दादा चुप बैठ गए।”
मैंने रजिस्टर को छुआ। काग़ज़ पुराना था, पर उसकी गंध नई थी — जैसे अभी किसी अलमारी से निकाला गया हो।
“और कटा पन्ना?” मीरा ने पूछा, जो मेरे पीछे आ गई थी।
रज़ा ने जेब से एक मोड़ा काग़ज़ निकाला, उसे हवा में पकड़ा, और वापस जेब में रख दिया।
“ये पन्ना मेरे पास है,” उसने कहा। “और ये तभी तुम्हारे हाथ में आएगा जब घंटी का लोहे का टुकड़ा मेरे हाथ में आएगा।”
“नहीं,” मैंने कहा।
“सोच लो,” उसने कहा। “यही पन्ना बताएगा कि ज़मीन किसकी है और किसने उसे बेचा।”
“घंटी का टुकड़ा नहीं दूँगा,” मैंने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि घंटी मेरी नहीं है,” मैंने कहा। “वो उस आदमी की है जिसने इसे पचास साल संभाला और मुझे दिया। मैं उसका हिस्सा किसी को नहीं बेचता।”
रज़ा मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में कोई गुस्सा नहीं था, कोई धमकी नहीं थी। सिर्फ़ एक पुरानी थकान थी, जैसे वो बरसों से इसी जवाब का इंतज़ार कर रहा हो।
“तो फिर पन्ना तुम्हारे पास नहीं आएगा,” उसने कहा। “पर एक बात सुन लो। जिस दिन तुम्हें लगे कि तुम सब कुछ खो रहे हो, उस दिन मेरे पास आना। मैं तुमसे कुछ नहीं माँगूँगा।”
वो रजिस्टर उठाकर चला गया।
टिंकू ने उसके जाने के बाद कहा, “उस्ताद, ये आदमी अच्छा है या बुरा?”
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर ये ज़रूर है कि ये झूठ नहीं बोलता। और झूठ न बोलने वाला आदमी अच्छा न हो, तो और भी खतरनाक होता है।”
अब दोपहर से पहले सब अस्पताल के पिछले दरवाज़े पर जमा होने लगे।
वो जगह मैंने पहली बार इतनी साफ़ देखी। पीछे की दीवार पीली थी, पर उस पर बरसों की धूल और बरसात की लकीरें ऐसी जमी थीं कि दीवार किसी पुराने नक्शे जैसी लगती थी। दीवार के साथ सूखी नाली चलती थी, जिसमें अब पानी नहीं, सिर्फ़ सूखे पत्ते और किसी की फेंकी हुई चप्पल पड़ी थी। और उसी दीवार के आख़िर में लोहे का फाटक था — काला, ज़ंग लगा, जिसका ऊपरी कब्ज़ा टूटा था और नीचे का कब्ज़ा पूरा झुका हुआ।
बंसीलाल की चारपाई उसी फाटक के पास पड़ी थी।
उन्होंने आज सुबह नहाने के बाद साफ़ कुर्ता पहना था। यह मैंने पहली बार देखा। उनकी दाढ़ी कटी हुई थी, बाल कंघी किए हुए, और हाथ में वही काली चाबी थी — दोनों हाथों से पकड़ी हुई, जैसे कोई चिड़िया पकड़ी हो और छूट जाने का डर हो।
“आ गए,” उन्होंने कहा।
“आ गए,” मैंने कहा।
“सब आ गए?”
“लगभग,” मैंने कहा। “उस्ताद गुमटी पर हैं। शबनम आपा ने चूल्हा बंद रखा है। रज़िया भी वहीं है। हबीब चाचा रास्ते में हैं। बबलू—”
“वो कहाँ है?”
“वहीं खड़ा है,” मैंने कहा और सिर से इशारा किया।
बबलू पांडे नीम के पेड़ के नीचे खड़ा था। उसकी सोने की चेन गायब थी, पानदान गायब था, और उसके दाहिने हाथ पर सफ़ेद रूमाल बँधा था। वो अपनी जेब बार-बार टटोल रहा था, जैसे कुछ खोज रहा हो जो वहाँ नहीं है।
बंसीलाल ने चाबी आगे बढ़ाई। मेरी तरफ़।
फिर वापस खींच ली।
फिर आगे बढ़ाई।
“बाबा,” मैंने कहा, “दे दीजिए।”
“एक बात कहूँ?” उन्होंने कहा।
“कहिए।”
“दरवाज़ा अंदर जाते ही बंद मत करना,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो काँपते हुए भी साफ़ बोल रहे थे। “उस कमरे में हवा नहीं चलती। आवाज़ चलती है। दरवाज़ा बंद हुआ तो आवाज़ भी बंद। और जिस कमरे में आवाज़ बंद हो जाए, वहाँ इंसान कुछ देर में अपनी आवाज़ भी भूल जाता है।”
“हम दरवाज़ा खुला रखेंगे,” मीरा ने कहा।
“और एक बात,” उन्होंने कहा। “जो भी अंदर जाए, वो अपना नाम ज़ोर से बोले। पूरा नाम। दीवार को नाम सुनना पड़ता है। तभी वो रास्ता देती है।”
“नाम?” टिंकू ने कहा। “मेरा नाम भी?”
“तेरा भी,” बंसीलाल ने कहा। “और तू मेरे पास रहेगा। सीढ़ी पर। मैं तेरा हाथ पकड़कर रखूँगा।”
“मैं अंदर जाऊँगा!” टिंकू ने कहा।
“तू सीढ़ी पर रहेगा,” मैंने कहा।
“उस्ताद—”
“टिंकू,” मैंने कहा, “ये सीढ़ी का काम सबसे ज़रूरी है। अगर दरवाज़ा बंद होने लगे, तो तू बाहर से आवाज़ देगा। तेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचेगी, इसीलिए मैं तुझे बाहर रख रहा हूँ।”
उसने मुँह बनाया। फिर मान गया। फिर उसने अपनी जेब से माचिस की डिब्बी निकाली और उस पर कुछ लिखा।
“क्या लिख रहा है?” मैंने पूछा।
“आज की तारीख़,” उसने कहा। “और वक़्त। ताकि बाद में कोई झूठ न बोले।”
मुझे हँसी आई। फिर हँसी रुक गई।
क्योंकि मैंने फाटक के पास ज़मीन पर कुछ देखा।
पीला हेलमेट।
वही हेलमेट, जो कल हमें नीम के नीचे मिला था और जिसे हमने बंसीलाल की चारपाई के नीचे रख दिया था। वो अब ठीक दरवाज़े के सामने रखा था। सीधा, टिकाकर। ऊपर से साफ़, धूल पोंछी हुई। जैसे किसी ने उसे उठाया हो, साफ़ किया हो, और फिर जान-बूझकर वहीं रख दिया हो।
“बाबा,” मैंने कहा, “आपने इसे यहाँ रखा?”
“मैंने चारपाई के नीचे रखा था,” उन्होंने कहा। “सुबह उठा तो ये यहाँ पड़ा था। मैंने सोचा कि हवा से आ गया होगा। पर हवा से सीधा खड़ा कौन होता है?”
मैंने हेलमेट उठाया।
उसका वज़न वही था। ऊपर टेप से बँधी दरार वही थी। अंदर कपड़े की परत वही थी।
और उस परत के नीचे, वही फटा नक़्शा।
मेरा हाथ रुक गया।
“मीरा,” मैंने कहा, “नक़्शा तेरे बैग में था ना?”
उसने अपना बैग खोला। पलटा। फिर से पलटा। उसका चेहरा बदल गया।
“था,” उसने कहा।
“अब?”
“नहीं है।”
मैंने नक़्शा खोला। वही फटा कोना, वही आधा नक़्शा — पर अब उस पर कुछ नया था। नीचे वाले हिस्से में, जहाँ कमरे की लाइन बनी थी, उस जगह पर गोल घेरा बना था और अंदर लिखा था — काला कमरा।
अक्षर पेंसिल के थे। छोटे, तेज़, झुके हुए। जैसे किसी ने लिखते वक़्त हाथ नहीं रोका हो।
“ये इमरान की लिखाई नहीं है,” मीरा ने कहा।
“तुझे कैसे पता?”
“इमरान ने नक़्शा उतारा था,” उसने कहा। “उसके अक्षर सीधे और बड़े हैं। ये अक्षर किसी और के हैं।”
मीरा ने नक़्शे का किनारा पकड़ा और उसे धूप की तरफ़ किया।
“और ये देखो,” उसने कहा।
किनारे पर, बहुत छोटे, पेंसिल में एक तारीख़ लिखी थी। नीचे एक छोटा धागा-सा निशान भी था।
“रविवार,” मीरा ने कहा।
मैंने उसे देखा।
“आज क्या दिन है?” मैंने पूछा।
“शुक्रवार,” टिंकू ने कहा।
“तो रविवार कब है?”
“परसों,” उसने कहा।
“और रविवार को क्या है?” मीरा ने कहा।
मैं चुप हो गया।
रविवार। वही दिन जिस दिन रणवीर भारद्वाज की बड़ी सभा है। वही दिन जिस दिन वो अपने सारे काग़ज़ खोलकर शहर को दिखाएगा। वही दिन जिस दिन लोगों को डरना चाहिए।
तो ये कमरा उसी दिन के लिए तैयार किया जा रहा है।
मेरे पीछे घुटनों के टकराने की आवाज़ आई।
हबीब चाचा आए थे। उनके हाथ में वही हरी गाँठ वाला रूमाल था, जो उन्होंने इमरान को दिया था। पर इमरान के पास नहीं, उनके पास था। मतलब इमरान ने उसे वापस भेज दिया? या किसी ने वापस लाकर रख दिया?
उन्होंने हेलमेट देखा।
फिर नक़्शा देखा।
फिर वो घुटनों पर बैठ गए।
“मैंने इसे फिर खो दिया,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ रुँध गई। “पहली बार तब खोया जब मैंने उसकी सात चिट्ठियाँ नहीं खोलीं। और अब दूसरी बार।”
“चाचा,” मैंने कहा, “उठिए।”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno