The Mysterious Bell583 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 583

6 min read November 5, 2026

यही सोचकर मैंने अपनी जेब में घंटी फिर छुई।

वो चुप थी। पर उसका पीतल गरम था — जैसे वो सुन रही हो।

॥

मैं सीधा घर की तरफ़ चला।

गली में अभी धूप पूरी तरह नहीं खुली थी। पीपल की छाया लंबी थी और उसमें बुज़ुर्गों की चबूतरी खाली पड़ी थी। किसी ने आज सुबह चबूतरी पर पानी नहीं डाला था, इसलिए उस पर कल की धूल जमी थी। दूर कहीं किसी के घर से प्रेशर कुकर की सीटी आ रही थी, और उसके नीचे एक और आवाज़ थी — किसी बच्चे के रोने की, जो हर सीटी पर एक झटका लेकर चुप हो जाता था।

मेरी जेब में घंटी थी। गरम। चुप।

मैंने चलते-चलते अपनी मुट्ठी खोली। बंसीलाल की काली चाबी मेरी हथेली पर पड़ी थी। छोटी, घिसे दाँतों वाली, छल्ले पर लाल धागा बँधा हुआ। धागे की गाँठ पुरानी थी, पर धागा नया लग रहा था। जैसे किसी ने उसे हाल में बदला हो।

घर के आँगन का दरवाज़ा खुला था।

पापा फ़र्श पर बैठे थे। उनके सामने औज़ारदान खुला पड़ा था — लोहे का लंबा बक्सा, जिसके अंदर हर औज़ार अपनी जगह पर रखा था, जैसे कोई स्कूल का बस्ता हो। उसके पास ही भूरे कपड़े में लिपटी वो फाइल रखी थी, जिसे उन्होंने कल रात सीने से चिपकाया था। और उनकी कमीज़ की जेब से ज़ंग लगी चाबी का छल्ला झाँक रहा था।

मैंने उनके सामने बैठने के लिए जगह देखी। वही पुरानी ईंट, जिस पर बचपन में मैं बैठकर उन्हें औज़ार साफ़ करते देखता था।

“चाबी मिली?” उन्होंने पूछा, बिना ऊपर देखे।

“मिली,” मैंने कहा।

“काली?”

“काली,” मैंने कहा।

उनके हाथ में पुरानी रिंच थी। उन्होंने उसे औज़ारदान में रखा, फिर धीरे से बक्सा बंद किया। चाबी घुमाई। क्लिक की आवाज़ आई, जैसे किसी ने दूर से जवाब दिया हो।

“वो कमरा मैं जानता हूँ,” उन्होंने कहा।

मैं चुप रहा।

“कभी अंदर नहीं गया,” उन्होंने कहा। “पर बाहर खड़ा रहा हूँ। एक बार। पाँच साल पहले। सीढ़ी पर बैठकर।”

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें औज़ारदान पर थीं, मेरे पर नहीं।

“उस वक़्त मुझे लगा कि अंदर से कोई गिन रहा है,” उन्होंने कहा। “धीरे-धीरे। एक, दो, तीन। और हर गिनती पर दीवार से आवाज़ आती थी, जैसे कोई दरवाज़ा खटखटा रहा हो। फिर आवाज़ रुक गई।”

“किस गिनती पर रुकी?” मैंने पूछा।

“सत्ताईस,” उन्होंने कहा।

आँगन में एक पल के लिए सिर्फ़ गौरैया की आवाज़ बची।

“पापा,” मैंने कहा, “तुम अंदर मत चलना।”

“मैं अंदर नहीं जाऊँगा,” उन्होंने कहा। “मैं पिछले फाटक पर खड़ा रहूँगा। जब तक तू बाहर नहीं आएगा, मैं वहीं रहूँगा। अगर आठ बजे तक तू नहीं आया, तो मैं खुद अंदर आऊँगा।”

“और अगर तुम गए,” मैंने कहा, “तो माँ को कौन देखेगा?”

वो चुप हो गए।

मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ खुरदुरी थीं, ग्रीस की पुरानी परत से भरी हुई। उन्होंने मेरा हाथ नहीं छोड़ा, पर हल्का सा दबाया।

“तेरे पास कुछ है?” उन्होंने पूछा।

“क्या?”

“कोई निशान लगाने को। चॉक।”

मैंने जेब टटोली। टिंकू ने कल दुकान पर सफ़ेद चॉक का एक छोटा टुकड़ा छोड़ा था — जिससे हम गली में योजना लिखते हैं और फिर मिटा देते हैं।

“है,” मैंने कहा।

“तो सुन,” उन्होंने कहा। “सीढ़ियाँ गिनते जाना। जाते वक़्त जितनी गिनी, लौटते वक़्त उतनी ही मिलें। अगर एक भी ज़्यादा मिले, तो रुक जाना। वापस मत चढ़ना।”

“क्यों?”

“क्योंकि ज़्यादा सीढ़ियों का मतलब है कि तू उसी जगह से नहीं चढ़ रहा जहाँ से उतरा था,” उन्होंने कहा।

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

“ये तुम्हें किसने बताया?”

“बंसीलाल ने,” उन्होंने कहा। “उसने बहुत बातें बताई थीं उस रात। मैंने सुनी थीं, पर समझा नहीं था। अब समझ आ रहा है।”

फिर उन्होंने एक और बात कही, बहुत धीरे, जैसे वो बात कहने के लिए उन्हें अपने अंदर से कुछ खींचना पड़ा हो।

“दरवाज़ा अगर खुद बंद होने लगे,” उन्होंने कहा, “तो चाबी अंदर से आधी घुमा देना। पूरी मत घुमाना। आधी घुमाने से दरवाज़ा न बंद होगा, न खुलेगा। वो अटका रहेगा। और अटका हुआ दरवाज़ा सबसे ज़्यादा सुनता है।”

“क्या मतलब?”

“मतलब ये कि जब तू सुन नहीं पा रहा हो, तब दरवाज़ा सुनता है,” उन्होंने कहा। “ये मेरी समझ है। तेरा क्या, तेरी समझ क्या कहती है, वो तू जाने।”

मैं हँसा। हँसी फटी हुई निकली।

“तुम्हारी समझ से बुरी नहीं होगी,” मैंने कहा।

“चल,” उन्होंने कहा। “तेरे पीछे टिंकू खड़ा है, वो तीन बार जूता पटक चुका है।”

मैंने मुड़कर देखा। टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में मेरी माँ का गुलाबी दुपट्टा और सिर पर काला एक काँच वाला चश्मा। उसने देखा कि मैंने उसे देख लिया, तो सीधा खड़ा हो गया।

“उस्ताद,” उसने कहा, “मीरा दीदी कह रही थीं कि रज़ा सलीम दस बजे पीपल पर आएगा।”

“जानता हूँ,” मैंने कहा।

“और काजल दीदी अस्पताल से आई हैं,” उसने कहा। “वो रो रही हैं। नहीं, रो नहीं रही। बस आँखें भरी हुई हैं।”

मैं उठा।

काजल आँगन के बाहर खड़ी थी, हाथ में प्लास्टिक की थैली। उसमें दवा के दो पत्ते थे, और कुछ नहीं।

“खत्म?” मैंने पूछा।

“दो पत्ते बचे हैं,” उसने कहा। “डॉक्टर इसरानी कह रहे हैं कि नई खेप रुकी है। काग़ज़ साफ़ न हो तो दवा नहीं आएगी। माँ को कल सुबह की खुराक चाहिए।”

“कल सुबह तक काग़ज़ साफ़ होगा,” मैंने कहा।

“कैसे?”

“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर होगा।”

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही डर था जो पहली बार अस्पताल में माँ को भर्ती करते वक़्त था। फिर उसने अपना डर पीछे धकेला और आवाज़ सख़्त की।

“अगर तुम आज रात नहीं लौटे,” उसने कहा, “तो मैं उस कमरे में खुद जाऊँगी। और मेरे पास कोई चाबी नहीं होगी। मैं दरवाज़ा तोड़ दूँगी।”

“तोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी,” मैंने कहा।

“मैं मज़ाक नहीं कर रही।”

“मैं भी नहीं,” मैंने कहा। “काजल, तू माँ के पास रह। बस यही एक काम तेरा है। और वो सबसे बड़ा काम है।”

उसने सिर हिलाया। फिर मेरी कमीज़ पकड़ी और खींची, जैसे बचपन में करती थी।

“तुम बदल गए हो,” उसने कहा।

“अच्छे के लिए?”

“पता नहीं,” उसने कहा। “पहले तुम सबसे झगड़ते थे। अब सबको साथ लेकर चलते हो। मुझे डर लगता है कि तुम खुद कहीं पीछे न छूट जाओ।”

मैं हँसा। इस बार हँसी ठीक निकली।

“मैं अंकुश हूँ,” मैंने कहा। “मैं पीछे नहीं छूटता। मैं तो वो हूँ जो दूसरों को खींचकर बाहर लाता है।”

“हाँ,” उसने कहा। “और खुद कभी बाहर नहीं आता।”

वो अंदर चली गई।

मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा। आँगन में पापा ने औज़ारदान उठाया और दीवार से टिका दिया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर अपनी कमीज़ की जेब से ज़ंग लगी चाबी निकाली, उसे देखा, और वापस जेब में डाल दी।

मैंने पीछे मुड़कर पैर बढ़ाए।

पीपल पर रज़ा सलीम ठीक दस बजे आया। न ठीक दस बजे — दस बजकर कुछ मिनट पर, जैसे वो घड़ी से नहीं, अपने मन से चलता हो। उसके हाथ में लाल कपड़े में लिपटा मोटा रजिस्टर था। उसके पीछे वही काला दुबला आदमी खड़ा था, हाथ पीछे बाँधे।

रज़ा ने रजिस्टर चबूतरी पर रखा और बिना कुछ कहे पन्ने पलटने लगा।

“सातवाँ नाम,” उसने कहा और उँगली रख दी।

जगदीश यादव। मेरे दादा का नाम, नीली स्याही में, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में। नाम के नीचे बराबर हिस्सा लिखा था, और उसके नीचे एक अंगूठा — धुँधला, फीका, पर असली।

“ये अंगूठा झूठा नहीं है,” रज़ा ने कहा। “ये मजबूरी का है। सात अंगूठों में सिर्फ़ यही एक ऐसा है जो झूठा साबित नहीं हुआ।”

“क्यों?”

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho