The Mysterious Bell – Chapter 587
वो मेरी तरफ़ आया और उसने अपना हाथ बढ़ाया।
मैंने उसका हाथ थामा। उसका हाथ ठंडा था। पर काँप नहीं रहा था।
"बबलू," मैंने धीरे से कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तूने मुझे कल रात गुमटी के पीछे फोन पर साहब से कहते सुना," मैंने कहा। "तूने कहा कि वो नक़्शा लेने गया है। उस वक़्त तुझे क्या लग रहा था? तेरा दिल क्या कह रहा था?"
वो रुका।
"मैं तेरा दुश्मन हूँ," उसने कहा। "मैं तेरे दुश्मन की तरफ़ से आया था। पर कल रात जब मैंने वो फोन किया, तो कहते वक़्त मेरा हाथ काँप रहा था। क्योंकि मुझे पता था — इमरान उस कमरे में अकेला है और उसकी माँ घर पर उसका खाना गरम रखे बैठी है। और मैं ये बात साहब को बता रहा हूँ, जो उसे कभी बाहर नहीं आने देगा।"
वो रुका।
"उस वक़्त मुझे लगा," उसने कहा, "कि मैंने अपनी ज़िंदगी में पहली बार किसी को इंसान की तरह देखा — और खुद को जानवर की तरह।"
मैंने उसका हाथ दबाया।
"आज बाहर रह," मैंने कहा। "अगर कोई आए जो तुझे पहचानता हो, तो उससे बात कर। अगर तेरे पास कोई नाम हो जो अंदर जाने की कोशिश करे, तो याद रखना। और अगर मैं बाहर आऊँ, तो तेरी उस रात की बात पर हम बैठकर एक चाय पिएँगे।"
वो हँसा। उसकी हँसी में पान की गंध नहीं थी, क्योंकि उसने सुबह से पान नहीं चबाया था।
"ठीक है," उसने कहा।
फिर मैंने उस्ताद को फोन मिलाया। उन्होंने दूसरी रिंग पर उठाया।
"उस्ताद," मैंने कहा, "हम तैयार हैं।"
"सीटी याद है?" उन्होंने पूछा।
"एक रुको, दो भागो, तीन आओ," मैंने कहा।
"और चार?"
"चार नहीं होगी," मैंने कहा।
वो हँसे। उनकी हँसी फोन पर भी सूखी सी लगी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "एक आख़िरी बात — अंदर जाते वक़्त, और बाहर आते वक़्त, अपना नाम याद रखना। पूरा नाम।"
"क्यों?"
"क्योंकि उस कमरे में," उन्होंने कहा, "नाम सबसे पहले जाता है। आवाज़ के बाद। और जो अपना नाम भूल जाए, वो बाहर आ भी गया तो वो वो नहीं होगा जो गया था।"
"ठीक है," मैंने कहा।
मैंने फोन रखा।
मीरा ने अपना कैमरा उतारकर बैग में रखा। उसने अपनी कलाई पर एक घड़ी बाँधी, जो मैंने पहले नहीं देखी थी। वो टूटी हुई थी। सुइयाँ हिल नहीं रही थीं।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"मेरे पापा की घड़ी," उसने कहा। "उन्होंने मुझे दी थी, उस दिन जिस दिन मैंने घर छोड़ा था। कहा था — जब तू सही वक़्त पर लौटेगी, तब ये अपने आप चलने लगेगी।"
"ये नहीं चल रही।"
"नहीं चल रही," उसने कहा। "पर आज मैं इसे पहन रही हूँ, क्योंकि मुझे लगता है — अगर मैं अंदर गई, और बाहर आई, तो आज सही वक़्त होगा।"
टिंकू आगे आया। उसके हाथ में एक छोटा सा औज़ार था — वो रिंच जो कल हमने उसकी तरफ़ बढ़ाई थी।
"मैं ये साथ ले जा रहा हूँ," उसने कहा।
"रिंच क्यों?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि अगर अंदर ताला हो," उसने कहा, "और चाबी काम न करे, तो रिंच काम आएगा। और अगर कोई पकड़े, तो ये मेरे हाथ में होगी।"
मीरा हँसी।
"तू सच में जासूस है," उसने कहा।
"मैं अंकुश भैया का शागिर्द हूँ," उसने कहा। "जासूस तो सानिया है। मैं तो सिर्फ़ हाथ हूँ।"
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। मेरी हथेली में वो गरम थी। पर इस बार उसमें एक अजीब सी बात थी — वो मेरी हथेली पर हल्की सी काँप रही थी। जैसे बूढ़े आदमी का हाथ।
"तू डर रही है," मैंने धीरे से कहा।
घंटी बजी। एक बार। हल्की।
"डरना अलग है," उसकी आवाज़ आई। "गिनती करना अलग है।"
"क्या गिन रही है?"
"जो अंदर है, वो तेरे जैसा नहीं है," उसने कहा। "वो बोलता नहीं, वो जोड़ता है। वो लोगों को जोड़कर एक-दूसरे के खिलाफ़ खड़ा करता है। और जब तक तू उसे शब्दों में पकड़ने की कोशिश करेगा, वो तेरे ही शब्दों को तेरे खिलाफ़ घुमा देगा।"
"तो मैं क्या करूँ?"
"तू जो करता है, वो कर," उसने कहा। "मरम्मत।"
और फिर वो चुप हो गई।
हम चल पड़े।
पीली दीवार के साथ-साथ हम पीछे के फाटक की तरफ़ बढ़े। टिंकू मेरे पीछे, मीरा मेरे साथ, हबीब चाचा फाटक पर, बबलू बाहर। बंसीलाल उस दरवाज़े के पास खड़े थे जिसके पीछे सीढ़ियाँ उतरती थीं।
अंधेरा था। दीवार के भीतर और भी अंधेरा था। सुबह की धूप अंदर तक नहीं आ रही थी।
बंसीलाल ने चाबी मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"ये लो," उन्होंने कहा।
मैंने चाबी ली।
"बंसीलाल भाई," मैंने कहा, "एक आख़िरी बात।"
"बोलो।"
"तीस साल में तुमने इस दरवाज़े को कभी अंदर से खुलते हुए सुना?"
वो रुके।
"एक बार," उन्होंने कहा। "दो साल पहले। रात में। मैंने सुना कि अंदर से कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है। तीन बार। फिर बंद हो गया। मैंने सुबह देखा — दरवाज़ा बाहर से बंद था। अंदर कोई नहीं था। पर मैंने उस दिन के बाद से अपनी चारपाई दरवाज़े के सामने से हटा दी है।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो ज़िंदा है," उन्होंने कहा, "वो खटखटाता है। जो मरा है, वो चुप रहता है।"
मैंने चाबी को ताले में डाला। ताला ज़ंग से भरा था। मैंने ज़ोर लगाया। चाबी घूमी नहीं।
"मीरा," मैंने कहा, "ये लो।"
मैंने चाबी उसे दी।
"मुझ पर भरोसा?" उसने पूछा।
"तुम पर भरोसा," मैंने कहा। "क्योंकि तुम्हारे हाथ काँपते नहीं।"
उसने चाबी ली। एक बार घुमाया। दो बार। तीन बार। ताला चरचराया, फिर टूटकर नीचे गिर गया। बंसीलाल ने एक आवाज़ निकाली — जैसे कोई पुराना बोझ उतर गया हो।
दरवाज़ा खुला।
अंदर अंधेरा था। एक सीलन भरी गंध आई — पुरानी, दम घोंटने वाली, जैसे बरसों से किसी कोठरी में हवा न आई हो।
मैंने अंदर देखा।
और तभी, उसी अंधेरे में, अस्पताल की नीचे वाली मंज़िल से एक परछाईं उभरी।
सफ़ेद कुर्ते वाली। लंबी। धीमी।
वो मेरे सामने नहीं थी, दूर थी — नीचे की सीढ़ियों के मोड़ पर, जहाँ रोशनी बमुश्किल पहुँच रही थी।
और वो धीरे से फुसफुसाई —
"जोड़ना बंद करो। अब तुम्हारा दोस्त मेरा मेहमान है।"
उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। उसकी आवाज़ में मिठास थी — जैसे किसी पुराने रिश्तेदार की, जो बरसों बाद आया हो और चाय माँग रहा हो।
मैंने मीरा का हाथ थामा।
"तैयार?" मैंने धीरे से पूछा।
"तैयार," उसने कहा।
"टिंकू?"
"तैयार, भैया," उसने कहा। उसकी आवाज़ में डर नहीं था, बस उतनी ही धौंकनी थी जितनी चौदह साल के लड़के में होनी चाहिए।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। हबीब चाचा दरवाज़े के बाहर खड़े थे, दोनों हाथ फाटक पर। बबलू उनके पीछे। बंसीलाल सीढ़ी पर।
मैंने अपनी जेब में घंटी फिर छुई। वो गरम थी। और उसने बहुत धीमे से कहा —
"नाम।"
मैंने अपनी आँखें बंद कीं।
"अंकुश," मैंने धीरे से कहा। "अंकुश यादव। बाप — शंकर यादव। माँ — सुशीला यादव। बहन — काजल। गली — साइकिलों की गली। घर — पीपल के नीचे, पत्थर की चबूतरी के सामने, वहाँ जहाँ उस्ताद अली बक्श की सिलाई मशीन टिक-टिक करती है।"
मैंने आँखें खोलीं।
"मैं जानता हूँ मैं कौन हूँ," मैंने कहा। "और मैं यहाँ तुम्हारी चाय पीने नहीं आया हूँ। मैं यहाँ अपना दोस्त लेने आया हूँ।"
और हम अंदर उतर गए।
सीढ़ियाँ ठंडी थीं। हर कदम पर एक आवाज़ आती थी — जैसे कोई पुराना पत्थर कराह रहा हो। मेरी हथेली में चाबी थी, दूसरी में मीरा का हाथ, और जेब में घंटी।
और नीचे, अंधेरे के उस मोड़ पर, वो सफ़ेद कुर्ते वाली परछाईं अब भी खड़ी थी — चुप। इंतज़ार करती हुई।
जैसे उसे पता हो कि हम आएँगे।
जैसे वो हमारा ही इंतज़ार कर रही हो।
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