The Mysterious Bell579 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 579

7 min read November 5, 2026

बबलू ने वो सुना या नहीं, मुझे नहीं पता। पर उसने वो सफ़ेद रूमाल मेज़ से उठाया, अपनी बाँह से खोला और अपनी जेब में रख लिया। फिर उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा —

"उस कमरे में रोशनी लेकर मत जाना।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने उस आदमी की आँखें देखी हैं जो बाहर आया था," उसने कहा। "वो आँखें नहीं थीं, अंकुश। वो दो चीज़ें थीं जो देख रही थीं, और उनमें इंसान नहीं था।"

उसने अपना हाथ ऊपर उठाया और उँगली मेरी तरफ़ की।

"और एक बात और।"

"कहिए।"

"उन्होंने उस कमरे में जो देखा, वो मुझे नहीं बताया। पर जब वो बाहर आया, तब उसने कुछ कहा। और वो शब्द मेरी छाती में लगे और आज तक लगे हुए हैं।"

"क्या कहा?"

बबलू ने अपना सिर मेरी तरफ़ झुकाया और इतनी धीरे कहा कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, इसलिए कि उस रात की बात ज़ोर से कहने से फिर ज़िंदा हो जाएगी —

"उसने कहा — इस कमरे में जो बैठा है, वो इमरान नहीं है। इमरान तो अब भी बाहर आने की सीढ़ी ढूँढ रहा है।"

॥

उसकी बात मेरे कान में रह गई।

जैसे कोई चीज़ कान में नहीं, सीधे सीने में उतर जाए और वहाँ बैठकर धीरे-धीरे साँस लेने लगे। मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उनके चश्मे के पीछे की आँखें बंद थीं, जैसे वो कुछ गिन रहे हों जो सिर्फ़ उन्हें दिख रहा हो। मीरा ने अपना कैमरा मेज़ पर रख दिया — वो कैमरा जो अब तक बंद था, पर उसका लाल धब्बा जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहा था।

"बत्तीस साल," उस्ताद ने आँखें खोलकर कहा। "बत्तीस साल पहले वो कमरा सील हुआ था। उस वक़्त मैं इस गली में सिलाई करता था, और उस कमरे की चाबी डॉक्टर इसरानी के पास थी। एक दिन वो आए, अपनी माँ की पुरानी सिलाई पेटी लेकर, और बोले — उस्ताद, इसे ताले में रखिए, कोई खोले तो नहीं, चलिए।"

"और फिर?" मैंने पूछा।

"और फिर वो कमरा बंद हो गया। डॉक्टर इसरानी ने उसके बाद उसका नाम नहीं लिया। जब भी कोई पूछता, वो कहते — वो कमरा गिर रहा है, वहाँ कोई नहीं जाता। पर गिरने वाला कमरा बत्तीस साल नहीं टिकता, अंकुश। गिरने वाली चीज़ पाँच साल में गिर जाती है। जो नहीं गिरती, वो टिकी रहती है किसी वजह से।"

टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, उस कमरे में क्या है?"

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर बबलू की तरफ़ जो दरवाज़े पर खड़ा था।

"वो मैं नहीं जानता," उन्होंने कहा। "पर एक बात जानता हूँ। बत्तीस साल पहले उस कमरे के ताले पर एक चीज़ लगी थी जो अब नहीं है। और जिस दिन वो चीज़ निकलेगी, उस दिन यह गली अपनी पुरानी नींद से जागेगी।"

मैं उठ खड़ा हुआ। मेरी जेब में घंटी थी — बंद, चुप, ठंडी। मैंने उसे हाथ में लिया। वो नहीं बजी। पर जब मैंने उसे उठाया, तो मुझे लगा जैसे कोई धागा खिंच रहा हो — मेरे हाथ से लेकर उस कमरे तक, जहाँ इमरान बंद था।

"सुबह जाना है," मैंने कहा। "बारह बजे के बाद नहीं। अभी रात है, अंधेरा है, और अंधेरे में वो हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे।"

"और सुबह?" मीरा ने पूछा।

"सुबह हमारा इंतज़ार कोई नहीं करता," मैंने कहा। "सुबह लोग सोते हैं, थके होते हैं, और सबसे ज़रूरी बात — सुबह उन्हें उम्मीद नहीं होती कि कोई आएगा।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो भाव था जो अब मैं पहचानने लगा था — वो जानती थी कि मैं ठीक कह रहा हूँ, पर वो चाहती थी कि मैं कहता कि हम सब साथ हैं।

"मैं साथ चलूँगी," वो बोली।

"तुम चलोगी," मैंने कहा। "क्योंकि अगर तुम नहीं चली, तो मैं यह कहीं नहीं लिखवा पाऊँगा कि यहाँ क्या हुआ।"

बबलू ने अपना हाथ उठाया।

"मैं नहीं चलूँगा," उसने कहा। आवाज़ में पहले डर था, फिर जैसे उसे अपनी ही बात पर शर्म आई। "मैं बाहर रहूँगा। मैं… मैं उस कमरे के अंदर नहीं जा सकता।"

"कोई मजबूरी नहीं," मैंने कहा।

वो मेरी तरफ़ आश्चर्य से देखने लगा। जैसे उसे उम्मीद थी कि मैं उसे डाँटूँगा, उस पर ताना मारूँगा, कहूँगा — तुमने ही तो बेचा था। पर मैंने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि मैं अंदर से जानता था — जो आदमी डरता है और फिर भी बाहर खड़ा रहता है, वो अंदर जाने वाले से कम नहीं। सिर्फ़ उसका युद्ध दूसरी जगह है।

उस रात हम सोए नहीं। हम बैठे रहे। उस्ताद की दुकान की टिक-टिक बंद थी। गुमटी में चूल्हा बंद था। पीपल के नीचे कोई नहीं था। गली इतनी चुप थी कि मुझे अपनी साँस भारी लग रही थी।

रात को तीन बार मैंने घंटी देखी। वो चुप थी। पर एक बार, जब मैं चार बजे के करीब आँख झपका रहा था, मुझे लगा जैसे किसी ने बहुत दूर से मेरा नाम लिया हो।

मैं उठ गया।

पाँच बजे टिंकू ने मेरा कंधा हिलाया। "उस्ताद, आप आँख बंद किए बैठे थे।"

"मैं सो नहीं रहा था," मैंने कहा।

"आप सो रहे थे।"

"टिंकू, अगर मैं सो रहा था तो तू बाहर क्यों खड़ा था?"

उसने अपनी उँगली गिनते हुए कहा, "क्योंकि आपने कहा था — सुबह चारों जागते रहना, कोई अकेला नहीं रहेगा।"

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"ठीक कहा तूने," मैंने कहा।

सुबह जब पहली किरण गली की पीली दीवारों पर पड़ी, तो मैं उठा। आँगन में टिंकू और सानिया बैठे थे। गुड्डू चबूतरी पर सो रहा था। हबीब चाचा ने आँखों पर हाथ रखकर पूरी रात बिताई थी — उन्होंने एक पल को भी आँख नहीं बंद की थी।

मीरा ने अपना कैमरा उठाया, फिर नीचे रख दिया। "नहीं," उसने कहा। "आज पहले देखेंगे, फिर रिकॉर्ड करेंगे।"

मैंने उसे देखा। वो मेरी तरफ़ नहीं देख रही थी, पर उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो पिछले कुछ दिनों में बदली थी — अब वो सबूत से पहले सच खोज रही थी।

हम निकले। मेरे पीछे मीरा, टिंकू, हबीब चाचा। बबलू दूर से हमारे पीछे-पीछे आ रहा था। मैंने उसकी तरफ़ देखा तो उसने हाथ हिलाया और दूरी बनाए रखी। मैंने कुछ नहीं कहा।

अस्पताल का पिछला रास्ता उसी तरह पड़ा था जैसा रात में था — सूखी नाली, टूटी बाउंड्री, लोहे का पुराना फाटक। और फाटक के पास, एक पुरानी चारपाई पर, नीली शर्ट पहने एक बूढ़ा आदमी बैठा था।

वो वर्दी जैसी नीली शर्ट थी — उसकी कलाई की कफ़ पुरानी थी, बटन पर धागा निकल आया था। उसके हाथ में एक लोहे का गिलास था, जिसमें आधी चाय थी। जब हम पास पहुँचे तो उसने गिलास चारपाई के नीचे रख दिया और अपनी कमर सीधी करने की कोशिश करी।

"कहाँ जा रहे हो?" उसने कहा। आवाज़ में थकान थी, पर कोई नरमी नहीं।

"बंसीलाल भाई?" मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू कौन है?"

"अंकुश। साइकिलों की गली का।"

"अंकुश यादव?" उसने कहा, और उसके भौंहें सिकुड़ीं। "तू उस मिस्त्री का लड़का है जो अंगूठा लगाता है?"

यह सुनकर मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

"आपको कैसे पता?"

"मैंने तीन रातों तक उसे उसी सीढ़ी पर बैठे देखा है," बंसीलाल ने कहा। "पाँच साल पहले। तेरे बाप एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाकर उतरते थे और सीढ़ी के नीचे बैठकर अपने हाथ देखते रहते थे। एक रात मैंने उसे रोटी दी। उसने नहीं खाई।"

मैं कुछ नहीं बोला।

मीरा ने आगे कदम बढ़ाया।

"बंसीलाल भाई," उसने कहा। "आपको कुछ पूछना है।"

"तुम कौन हो?"

"मीरा। बस्ती की आवाज़ चलाती हूँ।"

"अख़बार वाली?" उसका चेहरा सख़्त हो गया। "तुम लोग यहाँ क्यों आए हो? मैं तीस साल से इस अस्पताल में हूँ। मैंने कोई काग़ज़ नहीं लिया। मैंने कोई हाथ नहीं लगाया। जो मैंने किया, वो सिर्फ़ नौकरी की।"

उसने उठने की कोशिश करी, फिर बैठ गया। उसकी टाँग उसे साथ नहीं दे रही थी।

"बंसीलाल भाई," मैंने कहा। "हम आपसे कुछ नहीं पूछने आए। हम अपना एक आदमी ढूँढ रहे हैं।"

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