The Mysterious Bell578 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 578

6 min read November 5, 2026

"बबलू भाई," मैंने धीरे से कहा, "आपके हाथ काँप रहे हैं। आपकी चेन नहीं है। आपने पान नहीं चबाया। और आप रात के इस वक़्त, बिना किसी को लाए, मेरी दुकान पर खड़े हैं। इसका मतलब है कि आप आए नहीं हैं — आप भागकर आए हैं।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, डबडबाई हुईं, और उनमें वो डर था जो आदमी को रात में उठाकर खिड़की तक ले जाता है।

"साहब के आदमी," उसने कहा। "उन्होंने आज रात… उस कमरे के बाहर… मैंने दो आदमी पहले भेजे थे, समझे थे कि सिर्फ़ बक्सा है। सिर्फ़ बक्सा उठाना है। पर…"

"पर?"

"पर वो कमरा बक्से वाला नहीं है।"

चाचा ने कुछ कहना चाहा, और मैंने उन्हें आँखों से रोका। अभी बबलू को बोलने दो। जो डरा हुआ आदमी खुद बोल रहा हो, उसे रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि डरा हुआ आदमी एक ही बार सच बोलता है — ठीक उस वक़्त जब डर झूठ से बड़ा हो जाए।

"बबलू भाई, आपने वो कमरा खोला?"

उसने सिर हिलाया। न हाँ में, न ना में। फिर उसने हाथ उठाया और रूमाल से माथा पोंछा।

"मैंने खुद नहीं खोला," उसने कहा। "साहब के लोगों ने खोला। दो आदमी थे, लकड़ी के जूते पहने हुए। एक के हाथ में लालटेन थी। उन्होंने दरवाज़ा खोला, और…"

"और?"

"और फिर उन्होंने अंदर रोशनी नहीं डाली।"

मैंने साँस रोक ली। मीरा ने मेरी कलाई दबाई। टिंकू ने एक कदम पीछे हटकर उस्ताद की मशीन की मेज़ पकड़ ली।

"लालटेन थी," बबलू ने कहा, आवाज़ लगातार नीचे जा रही थी, "पर उन्होंने उसे बाहर ही रखा। दरवाज़े के बाहर। एक आदमी दरवाज़े के पास खड़ा रहा, लालटेन हाथ में, और दूसरा अंदर गया — अंधेरे में। जब वो लौटा तो उसका मुँह ऐसा था… मैंने उसे पहले कभी ऐसा नहीं देखा। मैंने पूछा, क्या देखा? उसने कहा — कुछ नहीं। और फिर उसने कहा — बबलू भाई, उस कमरे में रोशनी लेकर मत जाना।"

दुकान में सन्नाटा छा गया।

"रोशनी क्यों नहीं?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ ठंडी और साफ़ थी, जैसे किसी डॉक्टर की।

बबलू ने उसकी तरफ़ देखा। फिर उसने बहुत धीरे, बहुत सँभालकर, वो बात कही जो उसने अंदर ही अंदर रातों से पाली थी —

"क्योंकि रोशनी उसे जगा देती है।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

"उसे?" मैंने कहा। "किसे?"

बबलू ने जवाब नहीं दिया। उसने बस वो सफ़ेद रूमाल मेज़ पर रख दिया, जैसे कोई गवाही का सबूत रख रहा हो, और फिर कहा —

"इमरान का क्या?"

चाचा आगे आए। उन्होंने हेलमेट उठाया और बबलू के सामने रख दिया।

"ये इमरान का है," उन्होंने कहा। "मेरा बेटा कहाँ है?"

बबलू ने हेलमेट देखा और उसका चेहरा एक और बार पलट गया।

"मैंने उसे उस कमरे के पास नहीं भेजा," उसने कहा। "मैंने सिर्फ़…"

"सिर्फ़ क्या?"

"मैंने सिर्फ़ साहब को फोन किया। मैंने बस कहा कि वो नक़्शा लेने गया है। बस इतना। उसके बाद जो हुआ, मैं वहाँ नहीं था। फिर मैंने सुना कि दो आदमी उसके पीछे गए थे और…"

वो रुक गया।

"और क्या सुना?" मैंने पूछा।

"और ये सुना कि उन्होंने उसे उसी कमरे में बंद कर दिया।"

चाचा की आँखें बंद हो गईं। शबनम आपा ने उन्हें पकड़ लिया, वरना वो गिर पड़ते।

"दरवाज़ा अंदर से बंद होता है या बाहर से?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ खुद मुझे अजीब लग रही थी — बहुत सपाट, बहुत शांत, जैसे मैं किसी और की बात सुन रहा हूँ।

"बाहर से," बबलू ने कहा। "उस पर पुराना ताला है। लोहे का। पर ताला पुराना है तो क्या, साहब के आदमी उसे खोल सकते हैं। मैं… मैं तुमसे यही कहने आया हूँ। तुम उसे बचा सकते हो।"

"मैं?" मैंने कहा। "मैं एक साइकिल मिस्त्री हूँ।"

"तुम वो हो जिसके पास घंटी है।"

उसने ये कहा और दुकान में फिर वो पल आया — वो ठंडा, चुप, थमा हुआ पल, जिसमें हवा भी साँस लेना भूल जाती है।

मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। बहुत ठंडी।

और फिर वो बजी।

बहुत धीरे। इतनी धीरे कि जैसे किसी ने बहुत दूर से खुद को याद किया हो।

"जो बंद है," घंटी ने कहा, "वो कैद नहीं है। जो बंद है, वो इंतज़ार है।"

"इंतज़ार किसका?"

"उस आदमी का," घंटी ने कहा, "जो उसे खोलने के लिए नहीं, सुनने के लिए जाएगा।"

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने अपना चश्मा उतार दिया था और उसे कपड़े से पोंछ रहे थे, बहुत धीरे। उनका हाथ स्थिर था। उनका चेहरा स्थिर था। पर मैंने देखा — उनकी उँगली कपड़े पर ज़रूरत से ज़्यादा देर तक रुकी रही।

"उस्ताद," मैंने कहा, "आप कुछ जानते हैं।"

"मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ," उन्होंने कहा, "कि बत्तीस साल पहले जिस रात वो कमरा बंद हुआ, उस रात इस गली में एक ही आदमी ने अपना मुँह खोला था। बाकी सब चुप रहे।"

"कौन?"

उस्ताद ने चश्मा पहना। उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे किसी पुराने हिसाब की आख़िरी लाइन पढ़ रहे हों।

"जिसका नाम उस काग़ज़ में और साथ है।"

मैं कुछ कहने ही वाला था कि टिंकू ने अचानक कहा —

"उस्ताद, इमरान भैया को कितनी देर हुई?"

मैंने घड़ी देखी। दो बजकर बीस मिनट। साइट से छह बजे निकला था। आठ घंटे से ज़्यादा।

"बहुत देर," मैंने कहा।

चाचा ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो सवाल था जो मैं टाल रहा था।

"तुम जाओगे ना?" उन्होंने पूछा।

मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा।

"चाचा," मैंने कहा, "मैं अकेला नहीं जाऊँगा।"

"अकेला क्यों नहीं?"

"क्योंकि आपका बेटा जिस कमरे में बंद है, वहाँ जाने के लिए ताला नहीं, आदमी चाहिए। और एक आदमी अंधेरे में सिर्फ़ अंधेरा देखता है। दो आदमी एक-दूसरे को देखते हैं।"

शबनम आपा ने अपनी चिमटी उठाई और मेज़ पर रख दी — वो चिमटी जो गुमटी में रोज़ चूल्हे में जाती थी। उसकी आवाज़ में वो कड़क थी जो सिर्फ़ उनके पास थी।

"सुबह," उन्होंने कहा, "मैं चूल्हा नहीं जलाऊँगी। आज सुबह मेरी गुमटी से कोई चाय नहीं पीकर जाएगा।"

रज़िया ने उनकी तरफ़ देखा। कुछ ऐसा देखा जो बहनों के बीच सिर्फ़ बहनें समझती हैं।

"मैं साथ चलूँगी," रज़िया ने कहा।

"तुम नहीं," शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ नरम हो गई। "तू गुमटी पर रह। अगर मुझे कुछ हो जाए तो किसी को तो याद रहेगा कि यहाँ चाय बनती थी।"

"आपा!" रज़िया उठ खड़ी हुई।

"बैठ।"

वो बैठ गई।

मैंने सबको देखा — चाचा, उस्ताद, मीरा, टिंकू, शबनम आपा, रज़िया, और बबलू जो दरवाज़े के पास खड़ा था, हाथ में रूमाल, आँखों में वो डर जो अब भी बुझा नहीं था।

"बबलू भाई," मैंने कहा।

"हूँ।"

"आप आज रात मेरे साथ चलिए?"

उसने सिर उठाया। उसकी आँखों में पहले झिझक आई, फिर कुछ और।

"तुम मुझे साथ ले रहे हो?" उसने कहा। "मैं… मैंने तुम्हें धमकाया है। मैंने तुम्हारी दुकान वाली जगह को… मैंने…"

"आपने बताया," मैंने कहा। "आज रात आपने मुझे बताया कि उन्होंने इमरान को बंद कर दिया। अगर आप न आते, तो मुझे यह नहीं पता होता कि कौन सा दरवाज़ा खोलना है।"

वो एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसके होंठ काँपे और उसने बहुत धीरे कहा —

"मैंने एक आदमी बेचा है।"

"पता है।"

"फिर क्यों?"

"क्योंकि अब आप उसे वापस लाने चल रहे हैं," मैंने कहा। "और घंटी का हिसाब बिक्री से नहीं, वापसी से चलता है।"

घंटी जेब में फिर बजी — इस बार छोटी सी, एक घंटी जैसी, जैसे किसी ने अनजाने में ही कोई बात सही कह दी हो।

"चार अंक," घंटी ने कहा। "बिक्री वाला आदमी लौट रहा है।"

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