The Mysterious Bell – Chapter 577
"मैंने कहा था — सिर साबुत है तो हेलमेट बदल ले। इसने कहा — पहले तेरी चप्पल बदल दूँगा।"
चाचा हँसे। एक छोटी सी हँसी, जो गले में ही फँस गई और फिर टूटकर रोने में बदल गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। मैंने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की। कुछ रोना ऐसा होता है जिसे रोकना उससे बड़ा ज़ुल्म है।
मीरा ने मेरी कलाई दबाई। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने आँखों से दुकान की तरफ़ इशारा किया। मैंने सिर हिलाया।
"चाचा," मैंने कहा, "दुकान चलिए।"
"इमरान?"
"इसलिए ही दुकान। यहाँ गली में हर कोई सुन रहा है। और जो मैं अभी कहूँगा, वो सबके लिए नहीं है।"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर उस पानी के पीछे कुछ और था — वो चीज़ जो आदमी के अंदर तब जागती है जब उसका बच्चा खतरे में हो। डर नहीं। कुछ और। कुछ ज़्यादा ठंडा।
"चलते हैं," उन्होंने कहा।
उस्ताद की दुकान का शटर आधा गिरा हुआ था। अंदर बत्ती जल रही थी, पर मशीन बंद थी। उनकी मशीन का पहिया अब भी वैसे ही रुका हुआ था जैसे कोई हाथ उसे पकड़कर रोक दे। दुकान में कपड़े की गंध थी, धूल, और उसके नीचे इस्तरी की गरम लोहे जैसी हल्की गंध — जो शायद सिर्फ़ मेरी कल्पना थी, क्योंकि इतनी रात तक उस्ताद इस्तरी नहीं करते।
उस्ताद स्टूल पर बैठे थे। चश्मा नाक पर था, कान पर पेंसिल। उन्होंने हमें देखा, फिर हेलमेट देखा, और उनका चेहरा कुछ नहीं बदला। उस्ताद का चेहरा बदलता नहीं। उस्ताद की आवाज़ बदलती है। और उनकी आवाज़ अब धीमी थी।
"मेज़ पर रखो," उन्होंने कहा।
मैंने रखा।
चाचा ने हेलमेट फिर छुआ और खींच लिया। मैंने उन्हें रोका नहीं।
मैंने नक़्शा निकाला।
"बत्ती लाओ," मैंने टिंकू से कहा। उसने दुकान की छोटी बत्ती मेज़ के ऊपर ला दी। उस्ताद ने उसके नीचे अपनी मशीन की दराज़ से एक साफ़ कपड़ा निकाला और मेज़ पर बिछा दिया — वो कपड़ा जिस पर कोई चीज़ रखते हैं तो रखी चीज़ कपड़े से ज़्यादा कीमती लगती है।
मैंने नक़्शा खोला।
वो पूरा नहीं था। आधा था। एक किनारा सीधा चीरा हुआ था, और बाकी किनारे मुड़े हुए। काग़ज़ पर पेंसिल की लकीरें थीं — पतली, जल्दी में खींची गई, पर इतनी साफ़ कि समझ आ जाए। नीचे की तरफ़ एक बड़ा घेरा था, और उस घेरे के अंदर बहुत छोटे अक्षरों में कुछ लिखा था।
"काला कमरा," मीरा ने पढ़ा। उसकी आवाज़ में वो झटका था जो आदमी को सिर्फ़ तब लगता है जब काग़ज़ पर लिखी बात ज़मीन से मिल जाए।
मैंने अपनी उँगली उस घेरे पर रखी।
"ये अस्पताल की नीचे वाली मंज़िल है।"
"कैसे पता?" टिंकू ने पूछा।
"क्योंकि ऊपर ये दो लकीरें हैं — ये सीढ़ी हैं, जो माँ के कमरे के बाहर से नीचे जाती है। और ये — देख, ये दवा की खिड़की है। फ़ार्मेसी। यहाँ से बाईं तरफ़ मुड़कर अगर नीचे जाओ, तो ये कमरा आता है।"
मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से काग़ज़ों की तह निकाली। पुराने ज़मीन के काग़ज़ों की नक़लें, जो उसने दफ़्तारों से जोड़ी थीं। उसने उन्हें नक़्शे के साथ रखा, उँगली चलाई, और फिर धीरे से बोली —
"अंकुश, ये कमरा दवा की कोठरी के ठीक नीचे है।"
दुकान में एक पल के लिए सब रुक गया।
"ठीक नीचे?" मैंने कहा।
"हू-ब-हू नीचे। जिस जगह आज दवा की खेप रखी जाती है, उसके फ़र्श के नीचे।"
उस्ताद ने चश्मा सरकाया। उन्होंने नक़्शे पर उँगली रखी और काफ़ी देर तक देखते रहे। फिर उन्होंने उँगली हटाई और स्टूल की पीठ पर झुक गए, जैसे कोई पुराना बोझ अचानक कंधों पर आ गया हो।
"ये जगह," उन्होंने कहा, "बत्तीस साल पहले सील कर दी गई थी।"
"आपको पता है?" मीरा ने पूछा।
"मुझे ये पता है कि सील हुई थी। किसने की, ये नहीं पता। उस साल यहाँ बहुत कुछ बंद हुआ था। लोग बंद करके चले गए, और जो चले गए, वो कभी ये पूछने नहीं लौटे कि चाबी कहाँ गई।"
"पर कोई सील तो किसी वजह से होती है," मैंने कहा।
"हर सील की एक वजह होती है," उस्ताद ने कहा। "पर हर वजह सच नहीं होती।"
चाचा ने अब तक कुछ नहीं कहा था। वो हेलमेट पकड़े बैठे थे, और उनकी उँगलियाँ उस टेप के किनारे को बार-बार दबा रही थीं। फिर उन्होंने सिर उठाया।
"इमरान इस कमरे के बारे में बात करता था," उन्होंने कहा।
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"कब?" मैंने पूछा।
"कुछ महीने पहले। एक दिन आया था, हाथ में मज़दूरी के पैसे थे और आँखों में कुछ और। मैंने पूछा कि क्या बात है। इसने कहा — बापू, उस अस्पताल के नीचे एक कमरा है जिसे साहब के आदमी खोलना चाहते हैं, पर खोलते नहीं। मैंने कहा, तुझे क्या? तू मज़दूर है, अपना काम कर। इसने कहा — बापू, वहाँ जो है, वो मज़दूरी का हिसाब नहीं है।"
"और आपने?" मीरा ने धीरे से पूछा।
"मैंने कहा — बेटा, जो हिसाब मज़दूरी का नहीं, वो हमारा नहीं।"
चाचा ने हेलमेट मेज़ पर रख दिया। उनका हाथ काँप रहा था, पर आवाज़ साफ़ थी।
"आज मैं वो बात वापस लेता हूँ। अब जो हिसाब मेरे बेटे का है, वो मेरा भी है। मैं अब चुप नहीं बैठूँगा। चाहे कुछ भी हो जाए।"
उस पल घंटी बजी।
पहले तो नहीं बजी। पहले वो ठंडी हुई — मैंने महसूस किया, जेब में, जैसे कोई बर्फ़ का टुकड़ा रख दे। फिर वो बजी, बहुत धीमी, बहुत छोटी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपनी लाठी ज़मीन पर टिका रहा हो।
"यहाँ जो टूटा है," घंटी ने कहा, "वो इंसान नहीं है।"
मैंने साँस रोकी।
"वादा है।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनका चेहरा अब भी वैसा ही था, पर उनकी आँखें थोड़ी सिकुड़ गईं।
"किसका वादा?" मैंने पूछा।
घंटी चुप हो गई।
"अंकुश," मीरा ने कहा, "इसका मतलब?"
"मतलब ये कि उस कमरे में कोई चीज़ बंद नहीं है, कोई बात बंद है। और जब बात बंद हो जाए, तो उसे खोलने के लिए ताला नहीं, सच चाहिए।"
टिंकू ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, और ठीक उसी वक़्त दुकान के आधे गिरे शटर पर एक परछाई पड़ी।
किसी ने बाहर खड़े होकर अंदर झाँका।
मैंने सिर उठाया।
बबलू पांडे खड़ा था।
और मैंने उसे देखते ही अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं किया।
वो वही बबलू था — मोटा शरीर, काला कोट, वही चेहरा जो पान चबाते हुए हमेशा हल्की मुस्कान में रहता था। पर आज उस मुस्कान का कोई निशान नहीं था। उसके होंठ सूखे थे और उसके हाथ — मैंने साफ़ देखा — काँप रहे थे। उसने दाहिने हाथ पर सफ़ेद रूमाल बाँधा हुआ था, जिस पर सूखा गुलाबी दाग था। उसकी गले की मोटी सोने की चेन गायब थी। उसकी जेब का उभार भी गायब था — पानदान नहीं था।
और सबसे अजीब बात — उसके होंठों पर पान की लाली नहीं थी। बिल्कुल नहीं। जैसे उसने सुबह से पान छुआ ही न हो।
मैंने स्टूल खिसकाया और खड़ा हो गया।
"बबलू भाई?"
उसने अंदर कदम रखा। दो कदम। तीसरे पर रुक गया, जैसे अंदर की हवा उसके लिए भारी हो।
"अंकुश," उसने कहा। बस मेरा नाम। आवाज़ में वो धमकी नहीं थी जो हमेशा होती थी। वो आवाज़ किसी ऐसे आदमी की थी जो बहुत देर से चलकर आया हो और अब खड़ा होने की ताक़त न बची हो।
"बैठो," उस्ताद ने कहा। उन्होंने कोई सवाल नहीं पूछा। उस्ताद कोई सवाल नहीं पूछते, वो बस चीज़ें रख देते हैं।
बबलू नहीं बैठा।
उसने हेलमेट देखा। फिर नक़्शा देखा। और उसके चेहरे पर जो हुआ, वो मैं कभी नहीं भूलूँगा — वो पल भर के लिए ऐसे पीछे हटा जैसे नक़्शे में आग लगी हो।
"ये तुमने कहाँ से निकाला?" उसने कहा। आवाज़ फटी हुई थी।
"आप बताइए," मैंने कहा। "ये आपने कहाँ देखा?"
वो चुप रहा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno