The Mysterious Bell – Chapter 576
टिंकू ने टॉर्च जलाई।
और रोशनी पड़ते ही ज़मीन हमसे बोल उठी।
वहाँ, दीवार से दो हाथ दूर, धूल में लकड़ी के जूतों के निशान थे। ताज़े। जितने ताज़े कि किनारे की धूल अभी बैठी भी नहीं थी। वो निशान दीवार के साथ-साथ चलते थे और फिर पीछे वाले फाटक की तरफ़ मुड़ जाते थे।
और उनके बीच, ज़मीन पर, कुछ चमक रहा था।
मैंने झुककर देखा। पीतल का बुरादा। बिल्कुल महीन, जैसे किसी ने पीतल की छड़ को रेती से रगड़ा हो और जो बुरादा गिरा, उसे पोंछा न गया। वो दीवार के साथ एक लाइन में बिखरा था — बुरादा, फिर धूल, फिर फिर बुरादा।
मैंने हाथ फैलाया।
घंटी जेब में काँपी। काँपी, हिली और बहुत धीमी आवाज़ में बोली —
"जूते पहले आते हैं। आदमी बाद में आता है।"
"मतलब?"
"जो जूते पहनकर आया," घंटी ने कहा, "वो काग़ज़ लेने नहीं आया। वो काग़ज़ देखने आया। और जो काग़ज़ देखने आता है, वो काग़ज़ रखता नहीं — वो काग़ज़ रखवाता है।"
मीरा ने ज़मीन की तरफ़ देखा और फिर दीवार की तरफ़। "यहाँ से अंदर जाने का रास्ता है?"
"पहले था," मैंने कहा। "फाटक है। पर वो बंद रहता है।"
"बंद था," टिंकू ने कहा।
हम दोनों ने उसकी तरफ़ देखा।
वो फाटक के पास गया था। अकेला। बिना पूछे। बिना बताए। यही उसकी आदत थी और यही चीज़ मुझे रात में सबसे ज़्यादा डराती थी।
वो फाटक के पास रुका, झुका, और फिर अचानक उठकर चीखा —
"उस्ताद! यहाँ कुछ पड़ा है!"
मेरा दिल एक बार धड़का और फिर रुक गया, जैसे किसी ने घड़ी की चाबी पकड़ ली हो।
हम दौड़े। मीरा पहले, मैं उसके पीछे, और रास्ते में मेरा पैर लोहे की चादर पर पड़ा और वो बजी, और उस आवाज़ ने पूरी रात को एक झटका दिया।
फाटक के पास, दीवार से सटा, पुराना नीम का पेड़ है। कोई उसे नहीं देखता, क्योंकि वो अस्पताल के पीछे है और अस्पताल के पीछे कोई नहीं आता। उस पेड़ के नीचे, धूल में, पीला हेलमेट पड़ा था।
वही हेलमेट। ऊपर से फटा, टेप से बँधा।
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने घुटने टेक दिए और हाथ बढ़ाया, और फिर पापा की बात याद आई — जो चीज़ ज़मीन पर पड़ी मिले, उसे छूने से पहले सोचना।
मैंने सोचा।
मैंने देखा। हेलमेट उल्टा पड़ा था। उसकी पट्टी खुली थी, जैसे किसी ने जल्दी में उतारा हो — खोली नहीं, उतारी। और उस फटी परत के नीचे से, हेलमेट के अंदर से, काग़ज़ का एक कोना बाहर झाँक रहा था।
नक़्शा।
आधा फटा हुआ नक़्शा।
मीरा ने टॉर्च मेरी तरफ़ की। रोशनी उस कोने पर पड़ी और मैंने देखा — काग़ज़ पर पेंसिल की लकीरें थीं, एक घुमाव था, और एक कोना ऐसा था जहाँ से काग़ज़ चीरा गया था, सीधा, साफ़, जैसे किसी ने जान-बूझकर फाड़ा हो।
टिंकू पीछे खड़ा था और उसकी साँस तेज़ थी।
"उस्ताद," उसने कहा, "अगर हेलमेट यहाँ है, तो इमरान भैया कहाँ है?"
मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने सिर्फ़ हेलमेट के अंदर से काग़ज़ खींचा — बहुत धीरे, बहुत सँभालकर, जैसे कोई चिड़िया का अंडा उठा रहा हो।
और जैसे ही वो काग़ज़ मेरे हाथ में आया, जेब में घंटी बजी।
पहली बार उस रात। पूरी आवाज़ से। इतनी तेज़ कि टिंकू चौंककर पीछे हटा और मीरा ने अपना हाथ दीवार पर टिका दिया।
और घंटी ने कहा —
"नाम लिया गया। अब नक़्शा तेरे हाथ में है, और आदमी उसके हाथ में।"
॥
नक़्शा मेरे हाथ में था और घंटी की आवाज़ अभी भी हवा में लटकी हुई थी।
"नाम लिया गया। अब नक़्शा तेरे हाथ में है, और आदमी उसके हाथ में।"
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा। वो पतला था, मुड़ा हुआ, और उसके किनारे पसीने से मेरे अंगूठों पर चिपक रहे थे।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो पूछना चाहता था, पर बोल नहीं रहा था। और टिंकू का चुप होना सबसे डरावनी चीज़ थी। वो बच्चा बोलता रहता है, तब भी बोलता है जब नहीं बोलना चाहिए। अगर वो चुप है, तो उसके अंदर कुछ हिल रहा है।
मीरा ने टॉर्च धीमी कर दी। रोशनी पीली होकर उस धूल में घुल गई जो हमारे पैरों के नीचे थी।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "इमरान का हेलमेट यहाँ है। इमरान नहीं है। मुझे समझ आ रहा है कि तू क्या सोच रहा है, पर…"
"मैं कुछ नहीं सोच रहा," मैंने कहा। "सोचना बाद में। पहले इसे यहाँ से हटाते हैं।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये जगह उसकी नहीं है।"
मैंने हेलमेट उठाया। वो हल्का था, बहुत हल्का। एक आदमी का हेलमेट उसके सिर के बिना इतना हल्का लगता है कि दिल धक से रह जाता है, जैसे कोई चीज़ बहुत बड़ी होकर भी खोखली हो गई हो।
मैंने उसे सीने से लगाया। टेप की गंध आई — पुराना टेप, धूल, और उसके नीचे इमरान की पसीने की गंध। मैंने आँखें बंद नहीं कीं। आँखें बंद करना तब चाहिए जब सब्र हो, और उस वक़्त मेरे पास सब्र नहीं था।
"फाटक के आगे क्या है?" मीरा ने पूछा। "क्या हम अंदर जा सकते हैं?"
"नहीं।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि अगर इमरान अंदर होता, तो वो हेलमेट बाहर नहीं पड़ा होता।"
मीरा ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। वो समझ गई। मीरा को समझने में देर नहीं लगती, बस कभी-कभी वो समझने से पहले गुस्सा कर लेती है।
मैंने एक बार फिर उन निशानों की तरफ़ देखा। लकड़ी के जूतों के निशान। वो फाटक तक आते थे, वहाँ रुकते थे, जैसे कोई खड़ा होकर कुछ देख रहा हो। और फिर वो वापस मुड़ते थे — गली की तरफ़, दीवार के साथ-साथ।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"तूने फाटक छुआ?"
"नहीं उस्ताद। मैंने सिर्फ़ झाँका। अंदर अंधेरा है। बहुत अंधेरा। ऐसा अंधेरा नहीं जैसे रात का हो। ऐसा अंधेरा जैसे वहाँ रोशनी जाती ही न हो।"
मेरी रीढ़ के साथ एक ठंडी लकीर सी गई।
"चल," मैंने कहा। "दुकान।"
रास्ते में कोई नहीं बोला। मीरा मेरे बगल में चल रही थी और टिंकू पीछे। उसकी चप्पल की आवाज़ और मेरे जूतों की आवाज़, बस यही। नीम के पेड़ के नीचे से गुज़रते वक़्त मैंने देखा कि उसकी जड़ पर कुछ पीला पड़ा है — काग़ज़ का कोना। मैंने उसे उठाया। फाड़ा हुआ टुकड़ा था, जिस पर बस एक शब्द बचा था — "नीचे"।
उसने मेरे हाथ में काँपते हुए कहा कि ये नक़्शे का ही टुकड़ा है।
गुमटी पर रोशनी जल रही थी।
शबनम आपा का चूल्हा अब भी जल रहा था, पर धुआँ पतला था — जैसे आग भी थक गई हो। रज़िया किनारे पर बैठी थी। और उनके बीच, स्टूल पर, हबीब चाचा बैठे थे। हाथ जोड़े हुए, आँखें ज़मीन पर, और वो लकड़ी के जूतों की तरह जमे हुए थे।
मुझे देखते ही वो उठ खड़े हुए। इतनी तेज़ी से उठे कि स्टूल पीछे हट गया और उसकी टाँग चटकी।
"इमरान?" उन्होंने कहा। बस एक शब्द। लेकिन उस एक शब्द में पूरा एक बाप था।
मैंने हेलमेट आगे किया।
चाचा ने देखा।
वो हिले नहीं। वो कुछ नहीं बोले। उनका हाथ हवा में रुक गया, जैसे किसी ने उसे बीच से पकड़ लिया हो। फिर उन्होंने हेलमेट को छुआ। उँगलियाँ उस फटी परत पर फिसलीं, टेप पर रुकीं, और फिर वो अपने होंठों पर हाथ रखकर बैठ गए।
शबनम आपा ने उनका कंधा पकड़ा।
रज़िया ने कहा, "चाचा, पानी पीजिए।"
चाचा ने सिर हिलाया। पानी नहीं पिया।
"ये इमरान का है," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे किसी और की हो। "ये टेप मैंने लगाया था। पिछले साल, जब ये फट गया था। ये बोलता था कि बापू, हेलमेट फट गया तो क्या, सिर तो साबुत है।"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
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