The Mysterious Bell575 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 575

7 min read November 5, 2026

उनके हाथ अभी जुड़े हुए थे।

"मेरा बेटा गया है," उन्होंने कहा। "और वो मेरी ऐसी ग़लती के लिए गया है। मैंने उसे कभी नहीं कहा कि तू अच्छा करता है। यही सबसे बड़ी बात है। मैंने उसे कभी नहीं कहा। सालों में कभी नहीं।"

तब मैं समझा कि आदमी का हाथ जोड़ना बहुत बड़ी चीज़ नहीं होती। आदमी का साफ़ बोलना बड़ी चीज़ होती है। और वो अभी कर रहे थे, पहली बार, नौ बजे रात को, गुमटी की पीली बत्ती के नीचे।

मैंने उनके हाथ नीचे किए और उनका एक हाथ अपने हाथ में लिया।

"चाचा," मैंने कहा। "एक बात पहले साफ़ कर दूँ। इमरान उस नक़्शे के लिए गया है जो मैंने भेजा। मैंने भेजा, आपने नहीं भेजा। अगर कुछ होता है तो हिसाब मेरा है।"

"हिसाब तेरा है," उन्होंने कहा। "पर बेटा मेरा है। और मैं उसे लेने जा रहा हूँ।"

"नहीं।" यह शब्द मेरे मुँह से निकला और मुझे खुद उसकी तेज़ी पर ताज्जुब हुआ। "आप नहीं जाएँगे। आप यहीं रहेंगे, गुमटी पर, शबनम आपा के साथ। अगर हम थोड़ी देर में न आएँ, तो आप थाने जाएँगे, दुबे अंकल के पास, और उन्हें जो भी बोलना हो बोलने देंगे। पर आप अभी नहीं जाएँगे, चाचा। क्योंकि अगर आप आए और आपको कुछ हो गया, तो इमरान मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। और मुझे माफ़ करने की आदत नहीं है — मुझे फ़र्क पड़ता है।"

वो मेरी तरफ़ देखते रहे।

फिर उन्होंने सिर हिलाया और मेरी तरफ़ कटोरी बढ़ा दी, जो अब भी उनके हाथ में थी।

"पी ले," उन्होंने कहा। "अबकी बार पानी गरम नहीं है।"

हम निकले। मैं, मीरा और टिंकू।

उस्ताद गुमटी पर रुके — मैंने उन्हें रोका, और मुझे लगा वो नाराज़ हुए, पर फिर उन्होंने कहा, "ठीक है। पर तू मुझे फोन पर साथ रखेगा। एक फोन एक कान होता है, और मेरे पास दो कान हैं।"

पापा दरवाज़े पर खड़े थे। उनके हाथ में वही भूरी फाइल थी, कपड़े में लिपटी। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस जब मैं गुज़रा, तो उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा, फिर हटा दिया, और एक छोटी सी बात कही —

"जो चीज़ ज़मीन पर पड़ी मिले, उसे छूने से पहले सोचना। ज़मीन झूठ नहीं बोलती, पर जो चीज़ ज़मीन पर रखता है, वो बोलता है।"

माँ सीढ़ी तक आई थीं, बैसाखी के सहारे, और खाँस रही थीं।

"जा," उन्होंने कहा। "पर लौटकर आ। और अगर न आ सके तो फोन कर। मैं जानती हूँ कि तू जब फोन नहीं करता, तब कुछ बड़ा होता है। इसीलिए आज फोन कर।"

काजल मेरे साथ दरवाज़े तक आई थी। उसने मेरे हाथ में एक छोटी टॉर्च रखी।

"मेरे बैग से है," उसने कहा। "नर्सिंग वाली टॉर्च। रात में घाव देखने के लिए होती है। बत्ती तेज़ है।"

"काजल मैं घाव नहीं —"

"ले ले," उसने कहा। "मुझे लगता है आज किसी को देखना पड़ेगा। और मुझे ये मत कहना कि तू डॉक्टर नहीं है। आज तू एक ही चीज़ के लिए जा रहा है — देखने के लिए।"

हम चले।

साइट का गेट नए बाज़ार के पीछे है, जहाँ पहले खाली मैदान था और अब सीमेंट की बोरियों के पहाड़ हैं। रात में वो जगह और बड़ी लगती है। दिन में तुम देखते हो कि बोरियाँ हैं, रेत है, लोहे की छड़ें हैं। रात में तुम्हें सिर्फ़ यह दिखता है कि एक आदमी इस सबके बीच कितना छोटा है।

गेट पर लोहे का एक छोटा केबिन था, जिसमें पीली बत्ती जल रही थी। उसके अंदर चौकीदार बैठा था — पचास के आसपास, सिर पर मोटा गमछा, हाथ में स्टील का गिलास।

वो हमें देखकर उठा।

"इमरान?" मैंने कहा।

उसने गिलास नीचे रखा। "तुम इमरान के कौन हो?"

"उसके बाप के जानने वाले।"

वो रुका। फिर उसने गेट के बाहर झाँका, जैसे अंधेरे में कोई खड़ा हो और सुन रहा हो।

"वो शाम को छह बजे हेलमेट लेकर निकला," उसने कहा। "मैंने पूछा कहाँ जा रहा है। बोला — बाहर। मैंने कहा छह बजे बाहर? बोला — बस थोड़ी देर का काम है। फिर वो गेट से बाहर निकला और मैंने उसे सड़क तक जाते देखा। उसके बाद मैंने उसे नहीं देखा।"

"किस तरफ़?"

"वो तो पता नहीं। बाहर जाने के बाद तो आदमी किसी का नहीं रहता।"

"कोई और था साथ?"

चौकीदार ने गमछा ठीक किया। "साथ था या नहीं, ये मैं नहीं कहूँगा। पर एक बात कहूँगा। आज शाम को यहाँ दो लोग आए थे, जो साइट के नहीं थे। वो बात कर रहे थे उस आदमी से जो पीली फाइल रखता है। और उसके बाद इमरान ने अपना हेलमेट तीन बार उतारा और तीन बार पहना। मैंने सोचा कि लड़का घबरा रहा है।"

"कहाँ बात कर रहे थे?"

उसने ठुड्डी से इशारा किया, बाएँ तरफ़, जहाँ साइट के पीछे छोटा सा दफ़्तर है — लोहे का कमरा, जिसकी खिड़की पर जाली और अंदर हरी बत्ती जलती है।

वो दफ़्तर हमने देखा। बंद था। अंदर अंधेरा।

मीरा ने अपना कैमरा निकाला। "मैं इसे चालू नहीं करूँगी," उसने कहा। "पर साथ रखूँगी। जब ज़रूरत होगी, तब चालू होगा।"

उस वक़्त मुझे कुछ और चाहिए था। मुझे बबलू चाहिए था।

और बबलू मिल गया।

वो साइट के पीछे, ट्रकों के बीच, एक टायर पर बैठा था। बिना चेन, बिना पानदान, बँधे हाथ के साथ। वो सिगरेट नहीं पी रहा था। वो बस टायर को खुरच रहा था नाखून से।

मैं गया और उसके सामने बैठ गया।

"बबलू भाई।"

"मैंने कह दिया था," उसने बिना देखे कहा। "मैंने कह दिया था कि मुझसे कुछ मत पूछ।"

"आज नहीं पूछूँगा। आज मैं सिर्फ़ बैठा हूँ।"

वो रुका। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो धमकाने वाले आदमी की आँखों में कभी नहीं होती — वो जानता था कि उसने क्या किया और वो उसे अकेले ढोना मुश्किल हो रहा था।

"मैंने साहब को फोन किया था," उसने कहा। "मैंने कहा — वो नक़्शा लेने गया है।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने रात देखी है।" उसने अपना बँधा हाथ उठाया। "ये रात मैंने देखी है। उस लोहे के बक्से के साथ जो अस्पताल के पीछे है। जिस दिन मैंने उसे खुला देखा, उस दिन मेरी नींद चली गई। तब से मैं रात में दो बजे उठता हूँ और दीवार को देखता रहता हूँ। मेरी बीवी कहती है कि बबलू तू बदल गया है। मैं कहता हूँ नहीं, मैं वही हूँ। बस अब मुझे पता है कि साहब के मुँह में जो मुस्कान है, वो मिठाई की नहीं, नाप की है। वो मुस्कुराकर देखता है कि तू कितना डरा। और जिस दिन तू पूरा डर जाए, उस दिन तेरा काम हो गया।"

"आज क्या हुआ?"

वो कुछ देर चुप रहा। फिर उसने बहुत धीरे कहा —

"आज शाम मैंने इमरान को साहब के दफ़्तर के पीछे किसी से बात करते देखा। पर वो बात कर रहा था, या बात सुन रहा था — ये मैं नहीं कह सकता। उसका हेलमेट वो हाथ में लिए खड़ा था, और उसके सामने जो खड़ा था, उसके पैरों में…"

वो रुका।

"किसके पैरों में?"

"लकड़ी के जूते," बबलू ने कहा। "वो लकड़ी के जूते। जिनकी आवाज़ गुमटी तक आती है।"

और फिर उसने अपना मुँह बंद कर लिया। बंद। बिल्कुल बंद। मैंने उसे तीन बार पूछा और उसने तीन बार अपना सिर झुका लिया, जैसे कोई गर्दन ही न हो, सिर्फ़ एक बोझ हो।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "कुछ और नहीं बोलेगा।"

"बोलेगा," मैंने कहा। "पर आज नहीं। आज उसका डर बड़ा है और हम छोटे हैं।"

हम अस्पताल की तरफ़ बढ़े।

रास्ता पीछे से जाता है — सूखी नाली के किनारे-किनारे, टूटी बाउंड्री के साथ, जहाँ रात में कुत्ते भी नहीं आते। मुझे वो रास्ता पता था, क्योंकि सत्तर अंक देकर मैंने एक बार वो फाटक छुआ था और उसकी परत देखी थी।

अस्पताल की पिछली दीवार आज अलग दिख रही थी। दीवार पर लगी लोहे की चादरें उतार दी गई थीं और ज़मीन पर पड़ी थीं। उनके बीच से प्लास्टर का पीला मुँह बाहर झाँक रहा था।

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