The Mysterious Bell569 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 569

7 min read November 5, 2026

“इसीलिए मैंने सोचा, चिट्ठी लिखूँगा। चिट्ठी में हूँ नहीं सुनाई देगा।”

चाचा ने पन्ना नीचे रख दिया।

उन्होंने चश्मा उतारा, कुर्ते के आँचल पर उसे पोंछा, फिर वापस लगाया। और मैंने देखा कि पोंछने की ज़रूरत चश्मे को नहीं, आँखों को थी।

चौथा पन्ना — आख़िरी।

इस पर तारीख़ नहीं थी। नीचे कोई नाम नहीं था। बस आख़िरी में एक लाइन थी, पहले से ज़्यादा छोटी, इस बार जल्दी की नहीं, थकान की लिखाई।

“अब्बा, एक बात है जो मैं फ़ोन पर नहीं कह सकता और चिट्ठी में नहीं लिख सकता। जिस दिन आप मुझे बुलाएँगे, उस दिन मुँह पर कहूँगा। बस आप एक बार बुला लीजिए।”

चाचा ने पन्ना मोड़ा, फिर खोला, फिर मोड़ा।

फिर उन्होंने वो किया जो मैंने उन्हें कभी करते नहीं देखा था। उन्होंने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।

और अब मैं तुमसे एक बात कहूँगा जो सच है — गुस्सा एक झटके में नहीं टूटता। गुस्सा दरवाज़े की तरह नहीं होता जो धक्के से खुल जाए। गुस्सा पुरानी दीवार की तरह होता है। पहले उसमें बारीक दरार पड़ती है, जो किसी को दिखती नहीं। फिर एक दिन वो दरार बढ़ती है और अंदर से चूना झड़ने लगता है। और फिर उसी दीवार पर टिकी चीज़ें गिरने लगती हैं।

हबीब चाचा की दीवार आज झड़ रही थी।

“मैंने तुझे निकम्मा कहा था,” उन्होंने हाथों के पीछे से कहा। “गली में सब कहते थे, मैंने किसी को टोका नहीं। मैंने अपनी चुप्पी से उनकी बात मान ली।”

“अब्बा—”

“तेरे पीछे मैंने तेरी साइकिल आँगन में खड़ी रखी थी। धूल जमने देता था, पर किसी को छूने नहीं देता था। मैं रोज़ उसका हैंडल पकड़कर खड़ा होता था, जैसे तू अभी आएगा, साइकिल लेकर निकलेगा।”

इमरान का सिर झुका हुआ था। उसके हाथ ज़मीन पर थे, उँगलियाँ धूल में।

“और वो चिट्ठियाँ…” चाचा ने कहा। “सात चिट्ठियाँ। मैंने एक भी नहीं पढ़ी।”

“आपको मिली ही नहीं थीं, अब्बा,” इमरान ने कहा।

“तो भी मैंने पूछा नहीं। मैंने कभी ये नहीं पूछा कि तू कहाँ है, कैसे है, खाता है या नहीं। मैंने सिर्फ़ ये मान लिया कि तू भूल गया।”

फिर चाचा ने वो किया जो इस पूरे दिन का सबसे बड़ा काम था।

उन्होंने अपने बेटे का हाथ पकड़ा।

बहुत धीरे, जैसे कोई ज़ंग लगा हुआ दरवाज़ा पहली बार खोल रहा हो।

“इमरान।”

इमरान ने सिर उठाया।

“मैंने सुनने में देर की,” चाचा ने कहा। “माफ़ कर।”

इमरान ने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने एक बार गला साफ़ किया, फिर बोला, “अब्बा, मुझे भी बिना बताए नहीं जाना चाहिए था। मैंने पीछे मुड़कर देखा भी नहीं। अगर मैं एक बार रुक जाता, एक बार कह देता कि मैं जा रहा हूँ, काम करने, तो ये सब नहीं होता।”

“कहने की देर थी,” चाचा ने कहा। “सुनने की भी।”

और दोनों की आँखें भर आईं। किसी ने रोना शुरू नहीं किया। कोई चीखा नहीं। बस दोनों के हाथ जुड़े रहे, और आँगन में धूल उड़ती रही, और दूर कहीं नीम पर एक कौआ बोलता रहा, जैसे गली का कोई बूढ़ा अपने आप से बात कर रहा हो।

तभी मेरी जेब में घंटी गरम हुई।

धीरे से, आवाज़ किए बिना, जैसे किसी ने पीतल के ऊपर हथेली रख दी हो। मैंने जेब में हाथ डाला और उसे छुआ। गरमी आँगन की धूप जैसी नहीं थी। वो गरमी अंदर से आ रही थी।

फिर वो बजी।

छोटी, साफ़, एक बार।

और फिर उसकी आवाज़ आई। पहले जैसी रूखी नहीं।

“गिन लिया।”

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने चारों तरफ़ देखा, चाचा और इमरान अपने ही हिसाब में थे। मैंने धीरे से जेब में पूछा, “कितना?”

पर घंटी ने अंक नहीं बताए।

उसने बस इतना कहा, “हाथ छोड़ मत।”

मैं कुछ देर वहीं बैठा रहा, और मुझे लगा कि आज घंटी ठंडी नहीं है, बूढ़ी नहीं है, और आज उसकी आवाज़ में वो दो शब्द भी नहीं थे जो पिछले कई दिनों से थे — कम है, उधार है। आज उसने बस इतना कहा, जितना ज़रूरी था।

“अब्बा,” इमरान ने कहा। वो उठा और अपनी कमीज़ की जेब से कुछ निकाला। “ये आपका है। मैं आज लाया हूँ।”

उसके हाथ में पंप का हत्था था।

टूटा नहीं, टूटा हुआ भी नहीं — जोड़ा हुआ। उस्ताद ने कल रात ज़ंग छीलकर, लकड़ी का जो हिस्सा गायब था, उसकी जगह नई लकड़ी की पट्टी लगाकर, लोहे पर दो पेंच डालकर उसे ऐसा कर दिया था कि दूर से पुराना ही लगता था।

चाचा ने हत्था हाथ में लिया। उन्होंने उसे पलटकर देखा, नाखून से ज़ंग छेड़ी, फिर हल्के से बोले, “उस्ताद का हाथ है।”

“हाँ,” मैंने कहा। “उस्ताद ने कहा कि चीज़ें जोड़ने में सबसे ज़्यादा मेहनत ‘छिपाने’ में लगती है। अगर जोड़ साफ़ दिखे, तो लोग जोड़ नहीं देखते, टूटन देखते हैं।”

चाचा ने इमरान की तरफ़ देखा।

“चल,” उन्होंने कहा। “लगा।”

आँगन के कोने में वो हैंडपंप खड़ा था, जिसने बीस साल गली का पानी दिया था और जो कल से सूखा पड़ा था। उसका रंग उतरा हुआ, नीचे काई जमी हुई, और लीवर वाली जगह खाली थी — बस एक छेद, जैसे किसी के मुँह से दाँत निकल गया हो।

इमरान ने हत्था छेद में डाला।

अंदर जाते ही लोहे ने आवाज़ की, वो पुरानी चरचराहट, जो हर घर के पंप में होती है। चाचा ने अपना हाथ हत्थे पर रखा, ऊपर से, अपने बेटे के हाथ के ऊपर।

और दोनों ने साथ खींचा।

पहली बार — कुछ नहीं। सिर्फ़ हवा, एक लंबी सूखी साँस।

दूसरी बार — पानी की आवाज़ आई, पर ज़मीन के नीचे से, दूर। जैसे कोई नींद में बड़बड़ा रहा हो।

तीसरी बार — और मेरे हाथ से मेरी रिंच गिर गई, क्योंकि पानी फूट पड़ा।

पहले भूरा, फिर मटमैला, फिर साफ़। और फिर इतना तेज़ कि चाचा के कुर्ते पर छपाक पड़ी और उनका चश्मा धुँधला हो गया।

गली में आवाज़ गई।

टिंकू पहले पहुँचा, बिना चप्पल, एक पैर पर टेप पट्टी चिपकाए। फिर सानिया, फिर गुड्डू, फिर रफ़ीक़, और सबके पीछे चिंटू, जिसके हाथ में पुरानी रिम थी और जो उसे भूल ही गया।

“पानी!” सानिया चीखी, ऐसे चीखी जैसे स्कूल की छुट्टी हो गई हो।

बच्चे पानी में छपाक-छपाक मारने लगे। टिंकू ने मुँह सीधा धार के नीचे रखा और दोनों गाल फुला लिए। गुड्डू ने हाथ आगे किए और पानी उसकी उँगलियों के बीच से फिसलकर उसकी कमीज़ पर गिरा। रफ़ीक़ अपनी आधी मुड़ी चप्पल से पानी सींचने लगा। चिंटू ने धार के नीचे सिर रख दिया और उसकी नाक से पानी चढ़ गया, फिर वो खाँसते-खाँसते हँसने लगा।

और हबीब चाचा वहीं खड़े थे, कुर्ता गीला, चश्मा धुँधला, दोनों हाथ हत्थे पर, और अपने बेटे के हाथ के ऊपर।

“अब्बा, छोड़िए नहीं,” इमरान ने कहा, हँसते हुए। “धार बंद हो जाएगी।”

“बंद होने दे,” चाचा ने कहा। “मैं तो बीस साल से यही पकड़ रहा था, बंद थी।”

इसके बाद जो हुआ, वो सुनने में बहुत छोटा है, पर गली के हिसाब से बड़ा था।

शबनम आपा गुमटी से निकलीं, चिमटी हाथ में, और उन्होंने ऐलान किया, “चूल्हा जल रहा है। जिसको चाय चाहिए, वो अपना गिलास लेकर आए। आज कटोरी नहीं, गिलास।”

मैंने कहा, “आपा, आपने तो कहा था कि सच खुलने तक चूल्हा बंद।”

“सच खुल गया,” उन्होंने कहा, और रज़िया की तरफ़ देखकर मुस्कुराईं, “अब चूल्हा क्यों बंद रहे?”

रज़िया बर्तन धोने वाली जगह से गिलासों की ट्रे ले आई। उसके हाथ में वो पुरानी रेशमी चुनरी नहीं थी, बस एक साफ़ रूमाल था, जो उसने माथे पर बाँध लिया था।

चाय बंटी।

मीरा आई, कैमरा तिपाई समेत। उसने चाचा की तरफ़ देखा और पूछा, “चाचा, बीस सेकंड?”

चाचा ने उसे देखा। फिर पंप को देखा। फिर बोले, “आज नहीं, बेटा। आज कैमरा रख दे।”

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho