The Mysterious Bell568 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 568

7 min read November 5, 2026

हबीब चाचा ने देखा। उनका चेहरा बदल गया। वो रसीद को दूर करके देखने लगे, जैसे आँखें धोखा दे रही हों।

“मैंने ये रसीद नहीं देखी,” वो बोले। “मैंने ये कभी नहीं देखी।”

“पर ये आपके संदूक में थी,” मैंने कहा।

“इसका मतलब… इसका मतलब ये पैसे किसी ने दिए…”

“इमरान ने दिए,” मैंने कहा। “देखिए, हस्ताक्षर उसके हैं।”

“नहीं,” इमरान ने कहा। वो आगे आया और रसीद को देखने लगा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। “मैंने ये दवा खरीदी थी, पर… पर रसीद मैंने अपने हाथ में नहीं ली। मैंने पैसे किसी और के हाथ से भेजे थे। मैंने चिट्ठी में लिखा था कि ये पैसे माँ की दवा के लिए हैं — मैंने ये रसीद नहीं देखी।”

मैं उन दोनों के बीच खड़ा था, और मेरे हाथ में वो रसीद थी जो सात साल पहले किसी चिट्ठी में बंद होकर आई थी और किसी ने खोली नहीं।

“तो रसीद यहाँ कैसे आई?” मैंने पूछा।

जवाब किसी के पास नहीं था।

और मेरी जेब में घंटी ने बहुत धीमे से, बहुत रूखे स्वर में, एक ही शब्द कहा।

“हाथ।”

मैंने रसीद फिर देखी।

उस पर दो हाथ थे।

एक, जिसने दवा दी। एक, जिसने पैसे दिए। और एक तीसरा, जिसने रसीद को इस संदूक तक पहुँचाया — वो हाथ, जिसने सात चिट्ठियाँ उठाईं और इन सात सालों में एक भी बाप के हाथ में नहीं आने दीं।

हबीब चाचा ने रसीद सीने से लगा ली।

“मैंने इसे क्यों नहीं खोला,” वो बोले, अपने आप से, बहुत धीमे।

इमरान उनके पास बैठ गया।

दोनों के बीच अब भी वो शब्द नहीं आया था, जिसका नाम माफ़ी है। पर अब उनके बीच कुछ और था — एक रसीद, एक टूटी मुंडेर, और सात ख़त जो कभी पढ़े नहीं गए।

मैंने सातवाँ लिफ़ाफ़ा उठाया, जो सबसे नीचे था।

ऊपर लिखा था, बड़े अक्षरों में — “आख़िरी।”

मैंने उसे चाचा की तरफ़ बढ़ाया।

“ये आख़िरी है,” मैंने कहा। “इसे आज खोल लीजिए।”

चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर अब भी था — सात साल पुराना, सूखा, बैठा हुआ डर।

“अगर इसमें भी कुछ…” वो रुक गए।

“तो हम सब मिलकर पढ़ेंगे,” मैंने कहा। “अकेले नहीं।”

उन्होंने लिफ़ाफ़ा हाथ में लिया।

मेरी जेब में घंटी चुप थी, पर उसका पीतल अब ठंडा नहीं था। उसमें गरमी थी — वैसी गरमी, जैसे किसी ने दरवाज़े का कुंडा छुआ हो और वो अभी-अभी हिला हो।

आधा खुला।

आधा अभी भी बंद।

और ऊपर वाले लिफ़ाफ़े के नीचे, रसीद की पीठ पर, वो दो शब्द अभी भी मेरी आँखों में तैर रहे थे।

अंगूठा बाकी।

किसका अंगूठा?

और किस काग़ज़ पर?

मैंने धूल में बैठे उस संदूक की तरफ़ देखा, जिस पर सात साल की परत जमी थी, और मुझे लगा — गली में अभी भी एक ऐसा संदूक है, जिसे किसी ने खोला नहीं, सिर्फ़ रोज़ छूकर देखा है।

और जिस दिन वो खुलेगा, उस दिन शायद सिर्फ़ चिट्ठियाँ नहीं निकलेंगी।

उस दिन कुछ और निकलेगा।

जिसका इंतज़ार गली नहीं कर रही।

जिसका इंतज़ार साहब कर रहा है।

॥

लिफ़ाफ़ा हबीब चाचा के हाथ में था, और वो काँप रहा था।

पीला, मोटा, कोना मुड़ा हुआ। ऊपर बड़े अक्षरों में किसी ने मोटी कलम से लिखा था — आख़िरी। स्याही अक्षरों के किनारों से फैल गई थी, जैसे लिखते वक़्त हाथ रुका हो, फिर ज़ोर लगाकर लिखा गया हो।

चाचा उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे, पर अँगूठा फिसल रहा था। उनके चश्मे पर धूल थी, और वो धूल उन्होंने पोंछी नहीं। इमरान उनके बगल में घुटनों के बल बैठा था, हाथ ज़मीन पर टिके हुए, जैसे कोई चीज़ गिर न जाए इसलिए सँभाल रहा हो।

मैंने कहा, “चाचा, आप खोलिए। ये आपका ही है।”

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर लिफ़ाफ़े की तरफ़। फिर इमरान की तरफ़। और उनका हाथ और ज़्यादा काँपने लगा।

तुम सोच रहे होगे कि लिफ़ाफ़ा खोलने में क्या रखा है। तो सुनो — लिफ़ाफ़ा खोलना आसान है। उसमें जो लिखा है, उसे पढ़ना आसान नहीं है। और उसे पढ़कर वो कह देना, जो सात साल से नहीं कहा गया, वो सबसे मुश्किल है।

लिफ़ाफ़े के अंदर चार पन्ने थे।

चारों तह किए हुए, चारों पर नीली स्याही, चारों पर वही टेढ़े-मेढ़े बड़े अक्षर, जैसे किसी ने दूर से पढ़ने वाले के लिए लिखा हो।

पहला पन्ना सबसे ऊपर था, और सबसे पुराना।

चाचा ने उसे खोला, आँखों के पास ले गए, और ज़ोर से पढ़ने लगे। ज़ोर से इसलिए, क्योंकि उन्हें अपनी ही आवाज़ पर भरोसा नहीं था।

“अब्बा।”

यही पहला शब्द था। और यही शब्द सुनते ही चाचा की गर्दन थोड़ी झुक गई।

“अब्बा, मैं ठीक हूँ। आप मेरी चिंता मत करना। साइट पर काम मिल गया है। सीमेंट की बोरियाँ ढोता हूँ। सुबह छह बजे उठता हूँ और रात को नौ बजे हाथ-मुँह धोता हूँ। धूल इतनी है कि आँख में जाती है, पर आँख बंद करके मुँह धो लेता हूँ तो निकल जाती है।”

चाचा रुके। उन्होंने एक बार इमरान की तरफ़ देखा, फिर पन्ने पर लौट आए।

“अब्बा, पहले महीने के पैसे में से मैंने दवा की रसीद भेजी थी। पैसे मैंने उसी आदमी के हाथ भेजे जो साइट पर सबका पैसा घर पहुँचाता है। उसका नाम मैं चिट्ठी में नहीं लिख रहा, क्योंकि मुझे पता है आप उससे पूछने जाएँगे और फिर बात बढ़ जाएगी।”

मेरे मुँह से बिना मतलब की एक हँसी निकल गई। चाचा ने सिर उठाया।

“क्यों हँस रहा है?”

“कुछ नहीं चाचा,” मैंने कहा। “बस ये सोच रहा था कि बेटा कितना भी बड़ा हो जाए, बाप से छिपाने के लिए वो भी वही पुरानी तरकीबें लगाता है।”

चाचा कुछ नहीं बोले। पर उनके होठों पर एक बार कुछ हिला, जो न हँसी थी, न गुस्सा।

दूसरा पन्ना था — और वो सबसे भारी था।

“अब्बा, पंप का हत्था मैंने तोड़ा नहीं था।”

चाचा ने पढ़ते-पढ़ते रुककर ऊपर देखा। इमरान ने अपना सिर और नीचे झुका लिया।

“पर सच ये है कि मैं उस दिन घुस्से में था। आपने कहा था कि मैं निकम्मा हूँ, मैं वही करता हूँ जो मुझे करना चाहिए। मैं बाहर जाने की बात कर रहा था और आप सुनते ही नहीं थे। मैंने पंप से हाथ नहीं हटाया, मैंने हत्था पकड़कर खींचा था। वो मेरे हाथ में आ गया और मैं वो अपने साथ ले आया।”

“अब्बा, मैंने उसे छुपाया नहीं। मैंने उसे अपने थैले में रखा और अपने साथ रखा। छह महीने मेरे पास रहा। रात में सोते वक़्त मैं उसे छूता था।”

“मैंने सोचा था कि जिस दिन आप मुझसे पूछेंगे, उस दिन मैं हत्था लौटा दूँगा और कहूँगा — अब्बा, देखो, मैंने ठीक कर दिया। बस एक बार आप पूछ लो। एक बार।”

चाचा का हाथ काँपा और पन्ना हवा में हिल गया।

इमरान धीरे से बोला, “अब्बा, उस दिन आपने कुछ नहीं पूछा।”

“मैंने सोचा तू चला गया, तुझे घर छोड़ना था,” चाचा ने कहा। आवाज़ सूखी थी, जैसा आँगन का पत्थर दोपहर में होता है।

“मुझे जाना नहीं था,” इमरान ने कहा। “बस किसी को पूछना था।”

और यही बात तुम समझ लो — घर में सबसे ज़्यादा नुकसान वो नहीं करता जो चिल्लाता है। नुकसान वो करता है जो चुप रहता है, और दूसरा भी चुप रहता है, और बीच में साल गुज़र जाते हैं।

चाचा ने तीसरा पन्ना खोला।

इस पन्ने के अक्षरों में जल्दी थी, जैसे कोई बहुत दिन रुककर एक साँस में लिख रहा हो।

“अब्बा, मैं हर रविवार फ़ोन लगाता हूँ। घंटी बजती है, आप उठाते हैं, मैं कहता हूँ — अब्बा। और आप कहते हैं — हूँ।”

“बस। वही एक हूँ। और मैं उस हूँ के आगे कुछ नहीं कह पाता। मन में सौ बातें होती हैं — पूछना होता है कि कमर कैसी है, दवा ले रहे हैं या नहीं, सुबह की चाय बन रही है या नहीं, मोहल्ले वाले अब भी मेरी बात करते हैं या नहीं। पर वो हूँ सुनते ही सब कुछ गले में अटक जाता है।”

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