The Mysterious Bell567 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 567

6 min read November 5, 2026

मैंने चाय बनाई और उनके हाथ में दी।

उन्होंने दो घूँट पिए। फिर गिलास घुटनों पर रख दिया।

“इमरान आज सुबह चला गया था, है ना?” उन्होंने पूछा।

“हाँ।”

“रात को वो यहाँ आया,” चाचा ने कहा। “उसने साइकिल की चेन में तेल डाला। मैंने छत से देखा। पर मैं नीचे नहीं आया।”

“क्यों?”

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उनकी उँगलियाँ गिलास पर कस गईं।

“मैंने उसे कभी ठीक से सुना ही नहीं,” वो बोले, अचानक, जैसे बात उनके अंदर से धक्का देकर निकली हो।

मैं चुप रहा।

“जब वो छोटा था, तो साइकिल के पुर्जे जोड़कर बैठता था। मैं कहता — पढ़ाई कर। पुर्जे तेरे किस काम के। जब वो दसवीं में फेल हुआ, तो मैंने कहा — तू निकम्मा है। जब वो मज़दूरी पर जाने लगा, तो मैंने कहा — तेरी ज़िंदगी में कुछ नहीं होगा। जब वो सीखने की बात करता, तो मैं कहता — पहले पैसा कमा, फिर सीखना।”

उन्होंने रुककर गिलास देखा, जैसे उसमें चाय नहीं, कोई पुराना चेहरा दिख रहा हो।

“मैं हर बार अपनी बात थोपता रहा। मैंने उससे कभी नहीं पूछा — तू क्या चाहता है? मैंने बस कहा कि मुझे क्या चाहिए।”

मैंने गला साफ़ किया।

“चाचा,” मैंने कहा, “आज सुबह आपने कहा कि आपको कोई चिट्ठी नहीं मिली।”

“नहीं मिली।”

“तो सात चिट्ठियाँ कहाँ हैं?”

उनका हाथ गिलास पर और कस गया।

तभी दरवाज़े पर साया पड़ा।

इमरान खड़ा था।

कमीज़ पर सीमेंट की सफ़ेदी थी, हाथ धुले नहीं थे। वो अंदर नहीं आया। दरवाज़े के फटे कोने पर खड़ा रहा, जैसे आँगन में पाँव रखना कोई गुनाह हो।

“आ जा,” चाचा ने कहा।

आवाज़ में गुस्सा नहीं था। थकान थी।

इमरान आया। दो कदम। फिर रुक गया।

“पापा,” उसने कहा।

“बैठ।”

वो नहीं बैठा।

“मैं कुछ कहने आया हूँ,” उसने कहा। “और अगर आज नहीं कहा, तो फिर कभी नहीं कहूँगा।”

चाचा ने उसकी तरफ़ देखा।

“मैं बिना बताए चला गया था,” इमरान ने कहा। “वो मेरी गलती थी। मुझे चाहिए था कि मैं एक बार आकर कहता — पापा, मैं निकल रहा हूँ। मुझे ये शहर नहीं चाहिए। मुझे ये झगड़ा नहीं चाहिए। पर मैंने कुछ नहीं कहा। मैं बोरा उठाकर निकल गया, और जब लौटा तो साल गुज़र चुके थे।”

चाचा ने गिलास चौकी पर रखा। उनका हाथ काँप रहा था।

“मैंने तुझे निकाला नहीं था,” वो बोले।

“कहने की ज़रूरत नहीं थी,” इमरान ने कहा। “मैं आपकी आवाज़ से समझ जाता था।”

दोनों चुप हो गए।

मैंने कभी दो आदमियों को इतनी तेज़ी से चुप नहीं होते देखा। दोनों की आँखें एक-दूसरे पर थीं, पर बीच में कोई शब्द नहीं था। जिस शब्द को आना चाहिए था, वो आते-आते दरवाज़े पर रुक गया था, और इधर-उधर देखने लगा था।

मेरी जेब में घंटी हल्की-सी गरम हुई।

इतनी हल्की कि जैसे किसी ने दूर से अँगीठी दिखाई हो।

फिर वो बोली, धीमे से, रूखी आवाज़ में।

“दरवाज़ा आधा खुला है। पूरा नहीं।”

मैंने आँख बंद की।

आधा। हमेशा आधा।

जैसे मेरी ज़िंदगी में हर दरवाज़ा आधा ही खुलता है। शबनम आपा और रज़िया का भी आधा। मीरा का भी आधा। मेरा और पापा का भी आधा। और अब ये।

“चाचा,” मैंने कहा, और आवाज़ में जो सख्ती मैं लाना चाहता था, वो नहीं आई, “वो संदूकची।”

उन्होंने देखा। बहुत देर देखा।

फिर वो उठे।

धीरे-धीरे गए, जैसे कोई पुरानी कब्र की तरफ़ जा रहा हो। संदूकची के सामने बैठे। पीतल की पट्टी पर हाथ रखा। और उसी पल मैंने देखा — उनकी उँगलियाँ साफ़ थीं। धूल उन पर नहीं लगी।

क्योंकि वो रोज़ उसे छूते हैं।

रोज़ छूते हैं, पर खोलते नहीं।

उन्होंने कुंडी खोली। ढक्कन उठाया, और अंदर से पुरानी लकड़ी और कपड़े की गंध आई।

संदूक के अंदर कपड़े थे — दो साड़ियाँ, मोड़ी हुई, ऊपर सफ़ेद, नीचे हरी। उनके नीचे एक कपड़े की पोटली। और उस पोटली के अंदर, बराबर, सीधे, एक-दूसरे पर रखे, सात लिफ़ाफ़े।

सात।

इमरान ने एक कदम पीछे रखा।

“ये…” उसकी आवाज़ फट गई।

“हाँ,” चाचा ने कहा। “ये वही हैं।”

इमरान ने अपनी तरफ़ देखा। उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसके सामने उसका ही पुराना ख़त खोल दिया हो।

हर लिफ़ाफ़े पर लिखाई थी।

वही लिखाई। जो ब आड़ा लिखती है, होड़ी का मोड़ चौड़ा करती है, और आख़िर में कलम ज़ोर से दबाकर रुकती है।

इमरान का ही हाथ। इमरान का ही नाम। ऊपर बड़े अक्षरों में उनके ही नाम से लिखा हुआ।

“आपने खोले ही नहीं?” इमरान ने पूछा।

चाचा ने सिर नीचा कर लिया।

“खोले नहीं,” वो बोले।

“सात साल?”

“सात साल।”

इमरान की आँखें भर आईं। पर गुस्से से नहीं। किसी और चीज़ से, जिसका नाम मैं नहीं जानता।

“क्यों?” उसने पूछा। “क्यों नहीं खोले?”

हबीब चाचा रोए।

वो फूट-फूटकर नहीं रोए। उनके कंधे हिले, आँखों से पानी गिरा, और उनकी आवाज़ इस तरह टूटी जैसे कोई पुरानी रस्सी अंत में टूटती है।

“क्योंकि खोलने का मतलब होता था कि मैं ने पढ़ लिया,” उन्होंने कहा। “और पढ़ने का मतलब होता था कि मैंने सुना। और सुनने का मतलब होता था कि मैं ग़लत था।”

उन्होंने अपनी हथेली संदूक के ढक्कन पर रख दी।

“मैं ग़लत नहीं दिखना चाहता था,” वो बोले। “अपने बेटे के सामने भी नहीं। अपने सामने भी नहीं।”

इमरान ने मुँह खोला, पर कुछ नहीं निकला।

“मैंने इन्हें डर से नहीं, गुस्से से बंद रखा था,” चाचा ने कहा। “डर तो बाद में आया। पहले गुस्सा था। गुस्सा कि मेरा बेटा मुझे छोड़कर गया। और फिर, जब गुस्सा उतरा, तो डर आया — कि अगर इसमें कुछ ऐसा लिखा होगा जो मुझे झेलना पड़ेगा, तो मैं झेल नहीं पाऊँगा। और फिर साल गुज़र गए, और फिर खोलना… खोलना तो अब गुनाह लगता है।”

मैं चुप बैठा रहा। मेरी जेब में घंटी अब गरम थी, पर बजी नहीं।

“आज मैं खोलूँ?” चाचा ने पूछा। उन्होंने पूछा नहीं, उन्होंने माँगा। मेरी तरफ़ देखकर, जैसे मैं कोई हिसाब रखने वाला आदमी हूँ, जो बता सके कि खोलने पर क्या घटेगा।

“आपका संदूक है,” मैंने कहा।

“पर अब ये सिर्फ़ मेरा नहीं है,” उन्होंने कहा।

उन्होंने ऊपर वाला लिफ़ाफ़ा उठाया।

इमरान ने आँखें बंद कर लीं।

काग़ज़ पुराना था, इसलिए किनारे से चटक सकता था। चाचा ने उँगली अंदर डाली, धीरे से किनारा खोला, और लिफ़ाफ़े के मुँह को ऊपर किया।

और तभी एक चीज़ नीचे गिरी।

पतला काग़ज़, हल्का गुलाबी, बीच से दो बार मोड़ा हुआ। वो फ़र्श पर गिरा, धूल में हल्का-सा उछला, और पलटकर सीधा हो गया।

मैंने उसे उठाया।

वो रसीद थी।

ऊपर छपा था — नूर अस्पताल। नीचे हाथ से लिखी दवा का नाम, जो मैं पूरा नहीं पढ़ सका, पर शुरुआती अक्षर पहचाने — वही दवा जो माँ की फाइल में लिखी है। रकम लिखी थी, तारीख़ लिखी थी, और नीचे हस्ताक्षर — इमरान।

दवा की रसीद। पूरे पैसे जमा। कुछ बाकी नहीं।

इमरान ने आँखें खोलीं और रसीद देखी।

“ये…” वो बोला, और फिर रुक गया।

हबीब चाचा ने रसीद मेरे हाथ से ली। उन्होंने उसे पलटा। पीठ पर भी कुछ लिखा था — नीली स्याही, छोटी लिखाई।

और उसी पल मेरी नज़र रसीद के नीचे वाले कोने पर पड़ी।

वहाँ एक गोल मोहर थी। आधी घिसी हुई। नीली।

वही नीली।

वही गोल मोहर, जो तीन औरतों के काग़ज़ों पर थी। वही मोहर, जो पानी के काग़ज़ पर थी। वही मोहर, जिसके नीचे कभी हकीम अली का नाम पढ़ा गया था।

और उस मोहर के ठीक नीचे, नीली स्याही में एक छोटी पंक्ति।

दो शब्द।

अंगूठा — बाकी।

मैंने साँस रोक ली।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho