The Mysterious Bell – Chapter 566
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मैंने दोनों गिलास पीछे वाले तख़्ते पर रखे और पलटा।
हबीब चाचा का हाथ अब भी हवा में था। उँगलियाँ थोड़ी खुली, जैसे किसी ने कुछ पकड़ा हो और वो छूट गया हो। उनकी आँखें मेरी तरफ़ नहीं थीं। वो इमरान की तरफ़ भी नहीं थीं। वो बस सामने, पीपल की जड़ के पास, ज़मीन पर टिकी थीं, जहाँ धूप का एक टुकड़ा पड़ा था।
इमरान स्टूल पर बैठा था। उसके हाथ घुटनों पर थे। और उसकी उँगलियाँ अपनी ही जाँघ को इस तरह दबा रही थीं, जैसे कोई गिनती भूल रहा हो।
“कहाँ भेजी थीं?” मैंने पूछा। आवाज़ बहुत धीमी रखी। ऐसी आवाज़ जो किसी चीज़ को तोड़े नहीं।
इमरान ने साँस ली।
“डाक से कभी नहीं,” उसने कहा। “मैंने उन्हें यहीं छोड़ा था। आँगन की मुंडेर पर, साइकिल की टोकरी में, दरवाज़े के नीचे से सरका कर, संदूक के ऊपर। जहाँ नज़र जाती थी, वहीं रख दी। सोचता था, बाप को मिल जाएगी, पढ़ लेगा, फिर शायद एक बार पूछ लेगा कि तू कहाँ है।”
हबीब चाचा ने धीरे से सिर हिलाया। एक बार। दो बार। फिर बोले, इतना धीमे कि जैसे अपने ही कान में कह रहे हों।
“मुझे कोई चिट्ठी नहीं मिली।”
गली में चुप्पी उतर आई। पीपल की पत्तियाँ भी जैसे रुक गईं। दूर कहीं शबनम आपा की गुमटी से चिमटी की आवाज़ आई, फिर बंद हो गई।
मेरे मन में एक बात आई, और मैं उसे तुरंत कह नहीं पाया।
दो सच एक ही दरवाज़े पर खड़े हो सकते हैं और एक-दूसरे को देख नहीं पाते। बेटा कहता है रख कर गया। बाप कहता है मिली नहीं। दोनों झूठ नहीं बोल रहे। दोनों के हिस्से में सच है। और दोनों के बीच में कोई तीसरा है, जिसने वो चिट्ठियाँ उठाईं।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी अभी भी चुप थी। ठंडी भी नहीं, गरम भी नहीं। बस पीतल। जैसे वो भी इंतज़ार कर रही हो कि कोई एक सच्ची बात बोले, ताकि वो बोल सके।
“चाचा,” मैंने कहा, “आप घर चलिए। धूप तेज़ है। हम बात करेंगे।”
हबीब चाचा उठे। घुटने सीधे नहीं हुए, दो बार अटके। इमरान ने हाथ बढ़ाया, पर चाचा ने नहीं पकड़ा। न घुस्से से। डर से। जैसे पकड़ लेने से कोई पुरानी बात पकड़ में आ जाएगी।
वो चले गए।
इमरान वहीं बैठा रहा।
“तू भी चल,” मैंने कहा।
“मैं नहीं जाऊँगा,” उसने कहा। “मुझे उस आँगन में खड़ा होना अच्छा नहीं लगता।”
“तो खड़ा मत हो। बैठ जाना।”
वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया — थोड़ा-सा, टूटा हुआ। फिर उठा और चला गया, दूसरी तरफ़, साइट की तरफ़।
मैं पीपल के नीचे अकेला खड़ा रहा, और मुझे अपनी ही जेब में रखी घंटी से शिकायत होने लगी। तू क्यों चुप है? इतनी बड़ी बात चल रही है, तू कुछ कह क्यों नहीं रही?
पर घंटी ने कुछ नहीं कहा।
और मैं जानता हूँ, घंटी तब चुप होती है जब सच अभी पूरा नहीं हुआ होता। अधूरे सच पर वो बोलती नहीं। वो इंतज़ार करती है।
दोपहर तक गली में पानी का सवाल सिर पर चढ़ गया।
सुबह की कतार अब बातों में बदल गई थी। कोई कहता, टैंकर वाला रात को लौटेगा। कोई कहता, लौटेगा तो डंडा लेकर लौटेगा। कोई कहता, चूल्हा जलाने के लिए भी पानी चाहिए और यहाँ तो बरतन ही सूखे पड़े हैं।
मैंने टिंकू को बुलाया।
“स्कूल के आँगन में हैंडपंप है ना?”
“है,” टिंकू ने कहा। “पर गेट पर ताला है।”
“ताला चाबी से खुलता है, टिंकू।”
“रामलाल बाबा की चाबी से,” उसने कहा, और उसकी आँखों में वो चमक आ गई, जो हर उस काम से पहले आती है जिसमें उसे जासूसी करनी हो।
“तो जा। उनसे कह, पानी सिर्फ़ भरने के लिए, किसी चीज़ के लिए नहीं। और हाँ, गली की तरफ़ से कोई काग़ज़ वाला आए, तो गेट बंद कर देना।”
“और अगर वो धक्का दे?”
“तो खिड़की से कह देना कि घर में पानी है, काग़ज़ नहीं।”
टिंकू हँसा। फिर दौड़ा।
आधे घंटे में गली में साइकिलें, ट्रॉली, बाल्टियाँ, घड़े, और गुड्डू की अगुवाई में एक कतार खड़ी हो गई। सानिया ने बाल्टियों के नीचे कपड़ा बिछाया, ताकि रास्ते में पानी न गिरे। रफ़ीक़ ने अपनी टूटी साइकिल पर दो डिब्बे बाँधे और चिंटू ने उसके पीछे बैठकर पूरी गली को हिदायत दी कि कोई जल्दी नहीं करेगा।
शबनम आपा ने गुमटी का चूल्हा नहीं जलाया, पर उन्होंने बड़ा ताँबे का बर्तन बाहर रख दिया और कहा, “जो भरे, वो सबका भरे। एक बर्तन मेरे नाम भी।”
सुनीता दीदी ने भी एक बाल्टी भरी, और जब उसने मेरी तरफ़ देखा तो शर्म से नज़र नीची कर ली।
दोपहर के तीन बजे तक गली के हर घर में पानी था।
दो प्लास्टिक डिब्बे, जो बबलू ने छोड़े थे, उसी तरह खाली पड़े रहे। किसी ने उन्हें नहीं भरा। मैंने देखा, कई लोग जान-बूझकर उनसे बचकर निकले। गली का मन समझदार है। झूठ का पानी किसी को नहीं चाहिए।
शाम को उस्ताद अली बक्श ने मुझे दुकान पर बुलाया।
उनकी मेज़ पर हैंडपंप का टूटा हत्था रखा था — अब टूटा नहीं था। जुड़ा हुआ था। जंग साफ़ की हुई, लोहे की गर्दन पर दो पतले वेल्ड के निशान थे, लकड़ी का हिस्सा नया नहीं था, पर बैठा हुआ था।
“भारी नहीं है,” उस्ताद ने कहा। “पुराना है, इसलिए भारी लगता है। जब लगाओ, तो तेल डालकर लगाना। सूखा लोहा चीख़ता है।”
मैंने हत्था उठाया।
“चाचा जी के आँगन में जाना है,” मैंने कहा।
उस्ताद ने चश्मा सीधा किया और मेरी तरफ़ देखा।
“आँगन में जाने से पहले बात जान ले,” उन्होंने कहा। “आँगन वाला आदमी अक्सर अपने ही आँगन में कैद होता है।”
“किस बात की?”
“उसकी चिट्ठियों की,” उन्होंने कहा। “मैंने आज सुबह देखा, जब वो पीपल से उठा। उसका हाथ काँप रहा था। काँपने वाला हाथ झूठ नहीं बोलता। वो बस देर से बोलता है।”
शाम सात बजे मैं हबीब चाचा के घर पहुँचा।
उनका घर गली के मोड़ से हटकर था, नीम की छाया में। बाहर से दिखता नहीं, अंदर जाओ तो लगता है कि घर नहीं, कोई पुरानी याद रहने के लिए बना दी गई है। आँगन छोटा था। बीच में सीमेंट की परत उखड़ी हुई, उसमें से ईंटें दाँत दिखा रही थीं। दीवार के सहारे हैंडपंप का ज़ंग लगा पाइप खड़ा था, हत्था गायब। उसके नीचे पानी का कोई निशान नहीं था, बस सूखी धूल थी।
और कोने में इमरान की साइकिल खड़ी थी।
पुरानी, काली, पिछला मडगार्ड टेढ़ा। चेन चढ़ी हुई। और जब मैंने देखा, तो चेन पर ताज़ा तेल की पतली चमक थी।
हबीब चाचा चारपाई पर बैठे थे। मेरे आने पर उठने की कोशिश नहीं की।
“हत्था लाया हूँ,” मैंने कहा। “उस्ताद ने जोड़ दिया है।”
चाचा ने देखा। उनका गला भर आया, पर वो रोए नहीं। बोले, “रख दो।”
मैंने हत्था दीवार के सहारे रखा और चुपचाप उनके सामने वाली पुरानी चौकी पर बैठ गया।
आँगन के दूसरे कोने में एक संदूकची रखी थी।
लकड़ी की, छोटी, ऊपर पीतल की चार पट्टियाँ। मैंने देखा और मेरी नज़र वहीं अटक गई।
उस पर धूल की मोटी परत जमी थी।
इतनी मोटी कि किसी ने उसे बरसों नहीं खोला। और इतनी सीधी, इतनी बराबर, कि साफ़ लग रहा था — उस पर कुछ रखा भी नहीं जाता। कोई उसके पास आता भी नहीं।
मुझे अजीब लगा। घर में एक चीज़ ऐसी हो, जिस पर धूल जमने दी जाए, तो वो चीज़ या बहुत बेकार होती है, या बहुत ज़रूरी। बेकार चीज़ें लोग फेंक देते हैं। ज़रूरी चीज़ों से लोग डरते हैं।
“चाचा,” मैंने कहा, “चाय बना लूँ?”
“चूल्हा ठंडा है।”
“मैं जला दूँगा।”
वो कुछ नहीं बोले। मैं उठा, चूल्हे के पास गया। लकड़ी नहीं थी, रसोई में काग़ज़ के पुराने टुकड़े थे। मैंने देखा, वो अख़बार नहीं थे। वो पुरानी रसीदें थीं, फटी हुई, जिनसे किसी ने चूल्हा जलाया था।
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