The Mysterious Bell – Chapter 565
काले कोट में, पीछे दो आदमी एक ट्रॉली खींच रहे थे, जिस पर प्लास्टिक के बड़े-बड़े डिब्बे लदे थे। नीले, पीले, सफ़ेद। ऊपर से ढके हुए।
बबलू के हाथ में काग़ज़ों का बंडल था। और उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो मुझे किसी चीज़ की याद दिलाती है — ऐसी मुस्कान जो चाकू से पहले आती है।
"अंकुश भाई!" वो चिल्लाया। "पानी आ गया!"
गली के लोग निकलने लगे। पहले दो, फिर पाँच, फिर दस।
वो औरत भी आई जिसके हाथ में बच्चा था। वो बूढ़ा भी आया जो सुबह कतार में खड़ा था। सुनीता भी दरवाज़े से झाँकने लगी।
बबलू ने ट्रॉली के पास खड़े होकर काग़ज़ ऊपर उठाया।
"सुनो! सब सुनो!" वो बोला। "साहब ने कहा है — गली को पानी चाहिए। तो पानी मिलेगा। मुफ़्त।"
भीड़ में कुछ लोग आगे बढ़े।
"कितना मुफ़्त?" किसी ने पूछा।
"पूरा मुफ़्त," बबलू ने कहा। "डिब्बे मुफ़्त। गाड़ी मुफ़्त। रोज़ सुबह-शाम पानी।"
"और बदले में?"
"बदले में कुछ नहीं," बबलू ने कहा। "बस दो अंगूठे।"
उसने दो उँगलियाँ उठाईं।
"दो," उसने दोहराया। "एक इस पानी के काग़ज़ पर। एक पीछे वाले प्लॉट के काग़ज़ पर। बाकी सब माफ़। साहब कहते हैं — जो पानी दे, उससे अंगूठा भी माँग लो, ताकि कल को कोई झगड़ा न हो।"
भीड़ में फुसफुसाहट हुई।
"दो अंगूठे क्या," एक आदमी बोला, "चार लगा देंगे। पानी तो मिले।"
एक औरत ने अपना डिब्बा आगे बढ़ाया।
"भर दो," उसने कहा। "बच्चे बैठे हैं।"
बबलू मुस्कुराया।
"बिल्कुल," उसने कहा। "पहले काग़ज़।"
उसने काग़ज़ों का बंडल खोला और पहला काग़ज़ आगे बढ़ाया।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी।
उसी वक़्त मीरा आई।
वो कहीं से भागकर आई थी — साँस फूली हुई, कैमरा कंधे पर, बाल माथे पर चिपके हुए।
"अंकुश," उसने धीमे से कहा, "ये काग़ज़ देख।"
"क्या है?"
"गवाह का नाम।"
मैंने काग़ज़ देखा। ऊपर मोटी लाइन में लिखा था — पानी की सुविधा हेतु सहमति पत्र। नीचे छोटी लाइनें, फिर अंगूठे की खाली जगह, फिर मोहर।
और सबसे नीचे, एक छोटे बक्से में दो नाम थे।
बाहरी गवाह — और उसके नीचे — स्थानीय गवाह।
मीरा ने उँगली उस नाम पर रखी।
"पढ़," उसने कहा।
मैंने पढ़ा।
"हबीब खाँ।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"हबीब चाचा का नाम क्या है?"
"हबीब अली," मैंने कहा।
"और नीचे जो बाहरी गवाह का नाम है," मीरा ने कहा, "वो वही नाम है जो उन तीन औरतों के काग़ज़ों पर था। जो कल मैंने तेरे सामने खोले थे।"
मेरी उँगलियों में काग़ज़ कस गया।
"यानी," मैंने धीमे से कहा, "ये काग़ज़ कह रहा है कि हबीब चाचा ने गवाही दी है।"
"और नाम भी ग़लत है," मीरा ने कहा। "इतना ग़लत कि अगर चाचा खुद पढ़ते, तो पहचान भी न पाते।"
मैंने पीछे देखा।
हबीब चाचा अब भी स्टूल पर बैठे थे, पर उनका सिर घूम चुका था। पूरा। वो काग़ज़ देख रहे थे।
"क्या है?" उन्होंने पूछा। "मेरा नाम क्यों लिया?"
मैंने काग़ज़ उनकी तरफ़ बढ़ाया और ज़ोर से पढ़ा — ताकि पूरी गली सुन ले।
"स्थानीय गवाह — हबीब खाँ, पुरानी गली, नूर अस्पताल के पास।"
गली में चुप्पी छा गई।
हबीब चाचा ने लाठी के सहारे खुद को उठाया। उनकी टाँग काँप रही थी, पर वो खड़े हो गए।
"मैंने कोई गवाही नहीं दी," उन्होंने कहा। आवाज़ ऊँची नहीं थी, पर साफ़ थी। "मैंने यह काग़ज़ छुआ भी नहीं। मेरा नाम है हबीब अली। खाँ नहीं। मेरे बाप का नाम खाँ नहीं था।"
उन्होंने बबलू की तरफ़ देखा।
"तूने मेरा नाम कहाँ से उठाया?"
बबलू ने कंधे उचकाए।
"चाचा, नाम तो काग़ज़ में लिखा है," उसने कहा। "हमने नहीं लिखा। ऊपर से आया है।"
"तो ऊपर वाले को बुला," हबीब चाचा ने कहा। "मैं उससे पूछूँगा कि मेरा नाम लिखने से पहले उसने मुझसे पूछा क्यों नहीं।"
भीड़ में कुछ लोग पीछे हटे।
पर कुछ लोग अब भी डिब्बों की तरफ़ देख रहे थे। पानी की तरफ़। क्योंकि प्यास नाम नहीं पूछती। प्यास सिर्फ़ डिब्बा देखती है।
मैंने काग़ज़ मोड़ा।
फिर मैंने वो काग़ज़ बबलू की तरफ़ बढ़ा दिया।
"ले जा," मैंने कहा।
वो मुस्कुराया। "सोच लो, अंकुश। पानी —"
"जिस पानी में झूठ घुला हो," मैंने कहा, "वो प्यास नहीं बुझाता।"
चुप्पी।
मैंने उसके हाथ में काग़ज़ रख दिया।
"तेरे डिब्बे वापस ले जा।"
भीड़ में एक आवाज़ उठी।
"अंकुश, हमें पानी चाहिए!"
मैंने पलटकर देखा। वो औरत थी, गोद में बच्चा, आँखों में थकान।
"मिलेगा," मैंने कहा। "आज रात।"
"कैसे? पंप टूटा है। टैंकर तूने भगा दिया।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"मैंने टैंकर नहीं भगाया," मैंने कहा। "मैंने झूठ भगाया। पानी आज रात आएगा। मेरे हाथ से। अगर न आए, तो कल सुबह जो मशीन आएगी, उसके सामने मैं खुद खड़ा मिलूँगा।"
वो कुछ नहीं बोली। बच्चा उसकी गोद में सो रहा था।
बबलू ने काग़ज़ अपने बंडल में रखा, फिर ट्रॉली की तरफ़ देखा।
"दो डिब्बे यहीं छोड़ देता हूँ," उसने कहा। "गुस्सा ठंडा हो, तो भर लेना। साहब का दिल बड़ा है।"
उसने मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
"और अंकुश," उसने कहा, "कल सात बजे। मशीन। तेरे पास एक रात है। उसका इस्तेमाल समझदारी से करना।"
वो चला गया। ट्रॉली चली गई।
गली में दो प्लास्टिक के डिब्बे पड़े रह गए — पानी से भरे, ढके हुए, जैसे दो सफ़ेद झूठ।
मैंने उन्हें नहीं छुआ।
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी छुई।
वो चुप थी।
बिल्कुल चुप।
न गर्म, न ठंडी।
मैंने घंटी को हिलाया — धीरे से, अँगूठे से — पर वो नहीं बजी।
जैसे कह रही हो — अभी कोई सच बोला ही नहीं।
मैं पलटा।
हबीब चाचा अब भी खड़े थे। इमरान अब भी स्टूल पर बैठा था।
दोनों के बीच चाय के दोनों गिलास ठंडे पड़े थे।
मैंने कुछ कहना चाहा — कुछ ऐसा जो माहौल हल्का कर दे, जो हँसी ले आए। मेरी आदत है। जब बात भारी हो, मैं मज़ाक में उतार देता हूँ।
पर इस बार मैं चुप रहा।
क्योंकि मुझे लगा — अगर मैंने अभी मज़ाक किया, तो जो सच आधा खुला है, वो बंद हो जाएगा।
मैंने दोनों गिलास उठाए और पीछे रखने चला गया।
और तभी, मेरे पीछे, इमरान ने कहा।
आवाज़ बहुत धीमी थी। इतनी धीमी कि मुझे लगा शायद मैंने सुना नहीं, शायद हवा ने कहा।
"मैंने सात चिट्ठियाँ भेजी थीं।"
मैं रुक गया।
"एक भी वापस नहीं आई।"
मैंने पलटकर देखा।
हबीब चाचा के हाथ में चाय का गिलास नहीं था। उनका हाथ खाली था — हवा में, थोड़ा ऊपर, जैसे किसी चीज़ को पकड़ना चाहा हो और वो चीज़ मिली न हो।
और वो हाथ काँप रहा था।
तेज़ नहीं। बहुत धीरे। पर काँप रहा था।
और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — डर नहीं, गुस्सा नहीं, बस एक अजीब-सी खाली जगह। जैसे कोई पुराना संदूक खुला हो और उसमें से सब कुछ निकल चुका हो।
मैं वहीं खड़ा रहा।
मेरे हाथ में दो ठंडे गिलास थे।
और गली में चुप्पी इतनी थी कि मुझे अपनी साँस भारी लगने लगी।
सात चिट्ठियाँ।
सात।
और एक भी वापस नहीं आई।
तो सवाल यह नहीं था कि बेटे ने क्यों लिखा।
सवाल यह था — वो चिट्ठियाँ पहुँची कहाँ?
उस आँगन में, जहाँ हैंडपंप का हत्था गायब था, पर साइकिल की चेन में तेल डला हुआ था?
या किसी और हाथ में, जिसने उन्हें खोला भी नहीं?
मैंने हबीब चाचा की तरफ़ देखा।
उनका हाथ अब भी काँप रहा था।
और मेरी जेब में घंटी चुप थी — इतनी चुप कि मुझे लगा, अब ये चुप्पी गली की नहीं, किसी और की है।
किसी ऐसी चीज़ की, जो अभी बोली नहीं।
पर बोलने वाली थी।
बहुत जल्दी।
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