The Mysterious Bell570 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 570

7 min read November 5, 2026

मीरा ने एक बार भी बहस नहीं की। उसने तिपाई बंद की, कैमरा बैग में रखा, और चाय का गिलास दोनों हाथों से लिया। मैंने उसे देखा और मुझे लगा — जो आदमी कैमरा बंद कर सकता है, वो आदमी बहुत कुछ कर सकता है।

हबीब चाचा ने चाय पी। एक घूँट लिया, फिर दूसरा, फिर गिलास इमरान की तरफ़ बढ़ाते हुए बोले, “तेरी चाय में चीनी कम है।”

“अब्बा, ये आपका गिलास है।”

“तो?”

इमरान हँसा। उस हँसी में वो सारी साल थे जो बिना हँसे बीत गए।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी गरम थी, पर हल्की। जैसे किसी ने उसे गले से उतारकर मेज़ पर रख दिया हो और कह दिया हो — अब थोड़ी देर आराम कर।

“कितना गिना?” मैंने फिर धीरे से पूछा।

इस बार घंटी ने जवाब दिया।

“जितना सहा जा सके।”

मैं हँस पड़ा। “ये तो बहुत कम है।”

“तो कमर झुका के चल।”

यही उसका तरीक़ा है। कभी सीधा जवाब नहीं देती।

दोपहर हो गई थी। आँगन में पानी सूखने लगा, बच्चे अब भी भीगे खड़े थे, और गली में किसी ने हल्की-सी ढोल की ताल छेड़ दी। चाचा ने अपने बेटे को अंदर बुलाया, नाश्ता करने को कहा, और इमरान ने एक पल के लिए मेरी तरफ़ देखा, जैसे कह रहा हो — तू भी आ।

पर मैं नहीं गया।

मैं आँगन के बाहर नीम के नीचे खड़ा रहा और सोचता रहा कि आज का दिन अच्छा था। और जब दिन अच्छा हो तो मुझे हमेशा थोड़ा डर लगता है। मुझे पता है कि इस गली में अच्छे दिन अकेले नहीं आते। वो अपने साथ एक ख़ाली लिफ़ाफ़ा लेकर आते हैं।

मैं ठीक ही सोच रहा था।

शाम के करीब, जब गली में पानी सूख चुका था और गुमटी पर गिलासों की कतार लगी थी, इमरान मेरे पास आया।

उसके चेहरे पर वो रंग नहीं था जो सुबह था। वो हँस रहा था, पर हँसी त्वचा तक ही थी।

उसने मेरा कंधा पकड़ा और धीरे से कहा, “भाई, दो मिनट।”

हम नीम के उस पार चले गए, जहाँ से गली दिखती है पर गली से हम नहीं दिखते। उसने एक बार चारों तरफ़ देखा, फिर आवाज़ और धीमी कर दी।

“कल रात मैंने अस्पताल के नीचे लोहे का बक्सा ले जाते लोगों को देखा था।”

मेरे हाथ रुक गए।

“क्या?”

“कल रात,” उसने दोहराया। “मैं साइट से लौट रहा था। ग्यारह बजे के करीब। मैंने पीछे की गली पकड़ी, क्योंकि सामने ट्रक खड़ा था। और अस्पताल के पीछे वाले फाटक के पास एक टेम्पो खड़ा था। लाइट बंद थी। मैंने सोचा कि सामान उतार रहे होंगे।”

“फिर?”

“फिर मैंने देखा, चार आदमी भीतर से कुछ उठा रहे थे। भारी था, इसलिए दो आगे, दो पीछे। जब उन्होंने टेम्पो की लाइट के नीचे आकर उसे रखा, तब मैंने देखा — लोहे का बक्सा।”

मैंने साँस ली। “कैसा बक्सा?”

“बड़ा। ऊपर से पीटा हुआ, कोने पर कुछ लिखा था। मैं दूर था, पढ़ नहीं सका। पर उस पर धूल की परत नहीं थी। उसे अभी-अभी कहीं से खींचकर निकाला गया था, क्योंकि उसके नीचे की ज़मीन पर एक लंबी लकीर बन गई थी।”

“उनमें से कोई पहचाना?”

इमरान ने होंठ कसे।

“एक के हाथ में पीली फाइल थी,” उसने कहा। “पीली, मोटी। वो उसे सीने से लगाए खड़ा था, जैसे काग़ज़ नहीं, कोई बच्चा हो।”

मेरे पेट में कुछ ठंडा हुआ।

पीली फाइल।

जो फाइल मैंने गोविंद भाई के दफ़्तर में देखी थी, जो फाइल पाँच साल से चल रही थी, जिसका पहला पन्ना मेरे पापा के अंगूठे से जुड़ा था।

“और उन्होंने कुछ बोला?” मैंने पूछा।

“एक ने कहा — जल्दी करो, बारह बजे के बाद सीढ़ी बंद हो जाएगी और फिर अंदर जाना मुश्किल होगा।”

मेरी जेब में घंटी गरम हुई।

बहुत गरम।

मैंने हाथ डाला और उसे हथेली में लिया। वो जल रही थी, पर बजी नहीं। ऐसा लगा जैसे उसने अपनी आवाज़ रोक ली हो, क्योंकि अभी बोलने का वक़्त नहीं था। अभी सुनने का वक़्त था।

“तूने किसी को बताया?” मैंने पूछा।

“किसी को नहीं,” इमरान ने कहा। “मैं डर गया था। मैं सीधा अपने कमरे में आ गया और सो गया, पर नींद नहीं आई। सुबह मैंने सोचा कि कह दूँ, पर फिर सोचा कि किससे कहूँ? अब्बा से? वो तो मुझसे बोलते ही नहीं थे।”

वो रुका, फिर बोला, “आज जब पानी की धार निकली, तब मुझे याद आया। और मुझे ये भी याद आया कि कल रात गली में जिस बक्से की बात हो रही थी, उस पर दादा जगदीश यादव का नाम उभरा था।”

उसने मेरी तरफ़ देखा।

“वो वही बक्सा था क्या?”

मैंने जवाब नहीं दिया। मैं उस वक़्त जवाब नहीं दे सकता था, क्योंकि मुझे खुद नहीं पता था। पर अंदर कहीं एक आवाज़ थी जो कह रही थी — हाँ।

“अस्पताल के नीचे कौन सा कमरा है?” मैंने पूछा।

“वही जिसके बाहर तुम्हारी माँ को पलंग पर लिटाया गया था,” इमरान ने कहा। “उसके पीछे एक और कमरा है। छोटा। मैंने उसकी खिड़की अंदर से पटियों से बंद देखी है। साइट पर लोग कहते हैं कि उस कमरे में पुराना सामान रखा है। पर कोई उसे खोलता नहीं।”

मैंने नीम के तने पर हाथ रखा और कुछ देर चुप खड़ा रहा।

मेरे सामने पूरी गली चल रही थी। शबनम आपा गिलास धो रही थीं। रज़िया ट्रे उठा रही थी। टिंकू पानी में भीगी कमीज़ सुखाने के लिए चबूतरी पर बिछा रहा था। चाचा आँगन में बैठे थे, हत्था अब भी उनके हाथ के पास रखा था, और वो उसे बार-बार छू रहे थे, जैसे यक़ीन न आ रहा हो।

यह सब अच्छा था।

और ठीक इसी वक़्त किसी ने अस्पताल के नीचे से एक लोहे का बक्सा उठाकर कहीं भेज दिया था।

“इमरान,” मैंने कहा। “ये बात अभी किसी को नहीं।”

“अब्बा को भी नहीं?”

“अभी नहीं,” मैंने कहा। “आज उनका दिन है। उन्होंने आज पहली बार अपने बेटे का हाथ पकड़ा है। मैं उनके हाथ में आज एक और डर नहीं रखूँगा।”

इमरान ने सिर हिलाया।

“पर कल सुबह सात बजे मशीन आनी थी,” उसने कहा। “वो?”

“वो रुक गई,” मैंने कहा। “पानी के काग़ज़ ने रोक दी।”

“और काग़ज़ का क्या होगा?”

मैंने जेब में घंटी को दबाया। वो गरम थी, पर अब जल नहीं रही थी। वो ऐसे ठंडी हो रही थी जैसे किसी ने लंबी साँस ली हो।

“काग़ज़ का वो होगा,” मैंने कहा, “जो उस पर अंगूठा लगाने वाले का होगा। और मैं अभी तक यही ढूँढ रहा हूँ कि अंगूठा लगाने वाला कौन है।”

इमरान ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

“एक बात और,” उसने कहा। “जब वो बक्सा टेम्पो में रखा गया, तब उनमें से एक ने एक लाइन कही जो मुझे समझ नहीं आई।”

“क्या?”

“उसने कहा — अब घंटी किसके पास रहेगी?”

मेरी साँस रुक गई।

“तूने ठीक सुना?”

“हाँ,” इमरान ने कहा। “और फिर सब हँसे। उस हँसी में मज़ाक नहीं था। उस हँसी में वो चीज़ थी जो आदमी के पास होती है जब उसे लगता है कि उसने कोई बड़ा काम कर लिया है।”

मैंने जेब से घंटी निकाली और हथेली पर रखी।

दिन की आख़िरी रोशनी में वो पीली दिख रही थी, जैसे पुराना सोना। उस पर खुदा फूल अब भी साफ़ था। कल वो मंच पर गई थी, मेरी जेब से गायब हुई थी, किसी और के हाथ में बजी थी, और आज वो मेरी हथेली पर थी — चुप, गरम, थोड़ी थकी।

मैंने उसे धीरे से हिलाया।

बजी नहीं।

पर बोली।

इस बार बहुत धीमे, बहुत छोटा वाक्य।

“अब बक्सा नहीं, बक्से वाला ढूँढ।”

मैंने नीम के नीचे से गली की तरफ़ देखा। शाम की रोशनी में सब कुछ नरम दिख रहा था। चबूतरी, पीपल, गुमटी, उस्ताद की दुकान का टेढ़ा बोर्ड, और दूर अस्पताल की पीली दीवार, जिस पर कल रात से सीढ़ी बंद थी।

मुझे लगा कि कल सुबह सात बजे की मशीन तो रुक गई, पर उसके पीछे जो आदमी खड़ा है, वो नहीं रुका। वो बक्सा उठाकर कहीं और पहुँचा चुका है। और वो जानता है कि घंटी मेरे पास है। और वो यह भी जानता है कि मैं उस बक्से को ढूँढूँगा।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho