The Mysterious Bell – Chapter 561
गली की सारी बाल्टियाँ एक साथ आगे बढ़ीं, फिर रुक गईं, जैसे किसी ने हवा में लकीर खींच दी हो।
बबलू नीचे उतरा।
उसने पहले काजल को देखा, फिर मीरा को, फिर उस्ताद को, और सबसे आख़िर में मुझे।
"अंकुश भाई," उसने कहा, आवाज़ में मिठास घोलकर, "तुम्हारी दुकान बंद है, फिर भी तुम गली में खड़े हो। यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी खूबी है। दुकान बंद, पर आदमी खुला हुआ।"
"बबलू भाई," मैंने कहा, "सुबह-सुबह इतनी तारीफ़? कहीं मुँह में पान रखना भूल गए हो? तारीफ़ वाली बात है, पान की जगह तारीफ़ से काम नहीं चलेगा।"
गली में दो-चार लोग हँसे।
बबलू ने मुस्कान कस ली।
"मज़ाक ठीक है, पर पानी मज़ाक नहीं है," उसने कहा। "देखो, साहब को तुम लोगों की तकलीफ़ की बड़ी फ़िक्र है। इतनी गर्मी, इतने बच्चे, इतनी बूढ़ी औरतें। साहब ने कहा — भाई, इनको पानी दो। मुफ़्त नहीं, चलो, थोड़ा काग़ज़ी काम हो जाए, बस।"
उसने हाथ हिलाया।
टैंकर के पीछे से एक आदमी उतरा, हाथ में मोटा बंडल। काग़ज़ों का, रस्सी से बँधा। उसके पीछे दूसरा, हाथ में स्याही की डिब्बी और कपड़ा।
पूरी गली को पता था यह क्या है।
मुझे याद आया वो दिन जब दो सफ़ेद कुर्ते वाले गली में आए थे और बूढ़े काका ने अंगूठा लगाने से साफ़ मना कर दिया था। और मुझे याद आया कि उसी दिन मैंने सोचा था कि शायद इस बार कुछ नहीं होगा। शायद यह भी निकल जाएगा।
वो ग़लती थी।
वो धागा वहीं से शुरू हुआ था, और आज उसी धागे से पूरी गली फँसाई जा रही थी।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद धीरे से बोले, "काग़ज़ माँगो। पहले पढ़ो। पढ़ने से इनकार नहीं कर सकते।"
मैं आगे बढ़ा।
"बबलू भाई, एक काग़ज़ दिखाओ," मैंने कहा। "सबको। ज़ोर से। ताकि सब सुन लें। मैं पढ़ दूँगा।"
बबलू ने देखा, जैसे तराज़ू में तोल रहा हो। फिर उसने काग़ज़ निकाला, एक मोटी शीट, जिस पर नीली स्याही से बड़े अक्षरों में कुछ लिखा था, और नीचे गोल मोहर।
उसने इसे मेरे हाथ में रखा।
"पढ़ो," उसने कहा। "फिर बताओ कि साहब कितने बुरे हैं।"
मैंने काग़ज़ खोला।
ऊपर लिखा था — पानी की सुविधा अनुबंध। मुफ़्त। गली के हर परिवार को। हर महीने। पंद्रह दिन में पहली बार।
मैंने आगे पढ़ा।
फिर मैं चुप हो गया।
नीचे की लाइनें छोटी थीं। बहुत छोटी। ऐसी छोटी कि लगे कोई जान-बूझकर इन्हें छिपा रहा हो।
और उन लाइनों में वो बात लिखी थी जिसने मेरे हाथ ठंडे कर दिए।
मैंने सिर उठाया।
गली मेरी तरफ़ देख रही थी। बाल्टियाँ हाथों में, घड़े कमर के सहारे, बच्चे आगे, बूढ़े पीछे।
मैंने काग़ज़ ऊपर उठाया और ज़ोर से पढ़ा — "यह सुविधा उसी परिवार को मिलेगी जो पीछे वाले प्लॉट के सुधार कार्य से सहमत होकर, नीचे दिए गए स्थान पर अंगूठा लगाएगा।"
गली में सन्नाटा।
फिर कोई बोला, पीछे से, किसी औरत ने — "मतलब?"
"मतलब," मैंने कहा, "कि यह काग़ज़ ऊपर से पानी का है, और नीचे से ज़मीन का। बाक़ी सब दिखावा है। यह एक काग़ज़ में दो काम कर रहा है।"
बबलू हँसा। "तुम बहुत सोचते हो, अंकुश भाई। पानी पी लो पहले, फिर सोचना।"
"बबलू भाई," मैंने कहा, और मुझे पता था कि मैं क्या कहने वाला हूँ, "ज़रा सुनो। मेरा एक दोस्त था, उसकी शादी तय हो रही थी। लड़के वाले गए, लड़की वाले गए, बैठे, मिठाई आई, अच्छी बातें हुईं, और फिर लड़के वाले बोले — भाई साहब, बात आगे बढ़ाने से पहले एक छोटी सी बात। माँगने का मौक़ा है, तो हम अपनी गाड़ी भी ले जाएँगे।"
गली में हल्की हँसी।
"अब सोचो," मैंने कहा, "शादी में दहेज माँगना गुनाह है, यह तो सब जानते हैं। पर पानी के बदले ज़मीन माँगना इससे भी बड़ा दहेज है, क्योंकि इसमें तुम अपनी बेटी नहीं, अपनी छत का टुकड़ा दे रहे हो।"
हँसी बढ़ी।
कोई बोला, "सही कह रहा है।"
कोई औरत बोली, "मेरा तो घर ही जा रहा होगा तो पानी से क्या करूँगी?"
बबलू का चेहरा सख़्त हुआ। उसने काग़ज़ मेरे हाथ से खींचा।
"हँसी अच्छी बात है," उसने कहा, आवाज़ अब थोड़ी ऊँची। "पर याद रखो, हँसी से प्यास नहीं बुझती। जिस घर को पानी चाहिए, उसका एक अंगूठा चाहिए। बस एक। और काग़ज़ में कहीं यह नहीं लिखा कि घर तुम्हारा नहीं रहेगा। काग़ज़ में सिर्फ़ सुधार कार्य से सहमति लिखी है।"
"सुधार कार्य," मैंने कहा।
"हाँ, सुधार कार्य।"
"बबलू भाई, एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"सुधार कार्य में एक दिन मेरी दुकान भी आएगी, या सिर्फ़ मेरी ज़मीन?"
गली में फिर सन्नाटा।
बबलू ने काग़ज़ मोड़ा और जेब में डाल दिया। "अंकुश भाई, तुम्हारी दुकान का काग़ज़ बड़े साहब खुद देखेंगे। मैं उसमें नहीं पड़ता।"
"बड़े साहब खुद देखेंगे," मैंने दोहराया। "यह लाइन सुनकर अच्छा लगता है। जैसे डॉक्टर कहे कि तुम्हारा ऑपरेशन खुद भगवान करेंगे। बात अच्छी लगती है, पर भरोसा कम होता है।"
कुछ लोग फिर हँसे।
पर सबको हँसी नहीं आई। औरतें बाल्टियाँ लिए खड़ी थीं, और उनके चेहरे पर वो हिसाब चल रहा था जो गरीबी में हर रोज़ चलता है — पानी चाहिए या ज़मीन बचानी है, आज का पेट भरे या कल का घर।
यही सबसे बड़ा हथियार था रणवीर का। वो लोगों को डराता नहीं था। वो उन्हें भूखा रखकर खुद चुनने पर मजबूर करता था।
और सबसे बुरी बात यह थी कि वो चुनाव कभी बराबर का नहीं होता।
मैंने घंटी जेब में छुई।
वो ठंडी थी। बहुत ठंडी। जैसे बर्फ में दबी हो।
और फिर उसने कहा — धीमे, रूखे, चार शब्द।
"पहले ज़ुबान का रिसाव रोको।"
मैं रुक गया।
मैंने गली में देखा।
किसी ने किसी से कहा — "मैंने सुना है हबीब चाचा के बेटे ने ही पंप तोड़वाया।"
किसी ने कहा — "अरे, वो तो साइट पर काम करता है।"
किसी ने कहा — "बाप का पंप, बेटे की साइट। हिसाब तो बैठता है।"
किसी औरत ने धीरे से कहा — "शायद इसीलिए बेटा घर छोड़कर गया था।"
और यह सब दो मिनट में फैल गया। एक कान से दूसरे कान तक। बाल्टियों के बीच से, घड़ों के बीच से, बच्चों के बीच से।
यही रिसाव था।
मैंने आवाज़ ऊँची की।
"रुको," मैंने कहा। "सब रुको। एक बात सुन लो।"
गली चुप हुई, पर वो चुप्पी अच्छी नहीं थी। वो चुप्पी वो होती है जिसमें शक चलता रहता है, बस आवाज़ नहीं आती।
"अभी दो मिनट में," मैंने कहा, "मैंने पाँच लोगों को हबीब चाचा के बेटे के बारे में बात करते सुना। किसी को कुछ पता नहीं। पर सब बोल रहे हैं। और बबलू भाई यहीं खड़े हैं, और उन्होंने एक शब्द नहीं कहा। क्योंकि उन्हें इसी चीज़ की ज़रूरत थी — कि हम बोलें। कि हम खुद ही अपने को चीर दें।"
बबलू ने कहा, "मैंने कुछ नहीं कहा।"
"आपने कहा है," मैंने कहा। "कल गुमटी पर कहा था — पानी के पीछे कोई और बैठा है। आपने बीज बोया, अंकुर हमने निकाला। यही तो आपका काम है।"
गली में कोई नहीं बोला।
तभी इमरान उठा।
वो पत्थर से उठा, झोला कंधे पर डाला और सीधा मेरे पास आया। उसने बबलू को देखा, फिर गली को, फिर अपने बाप को।
हबीब चाचा ने नज़र नहीं उठाई।
इमरान ने झोला खोला।
उसके अंदर कुछ था — कपड़े में लिपटा, लंबा, भारी। उसने कपड़ा खोला और उसे ज़मीन पर रख दिया।
लोहे का टूटा हत्था।
हैंडपंप का हत्था। वो हिस्सा जो लीवर के सिरे पर लगता है, जिसे पकड़कर हम पानी निकालते हैं।
वो टूटा हुआ था। जंग लगा, किनारे से चटका, और एक तरफ़ वो लकड़ी गायब थी जो हाथ पकड़ने के लिए लिपटी होती है।
पूरी गली ने देखा।
इमरान ने कहा — और उसकी आवाज़ साफ़ थी, धीमी नहीं —
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