The Mysterious Bell – Chapter 562
"यह हिस्सा मैंने उसी दिन निकाला था, जिस दिन मैंने यह घर छोड़ा था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसके हाथ काँप रहे थे।
"मैंने इसे फेंका नहीं," उसने कहा। "मैं रोज़ इसे अपने झोले में रखता हूँ। साइट पर भी। सोने से पहले भी। जब अब्बा की याद आती है, तो इसे हाथ में पकड़ लेता हूँ।"
उसने रुककर साँस ली।
"मैंने यह नहीं तोड़ा। मैं इसे जोड़ नहीं पाया। दोनों में फ़र्क़ है। मैंने इसे जोड़ने की कोशिश की थी, एक बार, रातों-रात, अपने कमरे में। पर मुझे नहीं आता। मुझे लोहा जोड़ना नहीं आता। मुझे सीमेंट ढोना आता है।"
उसने अपने बाप की तरफ़ देखा।
"अब्बा, मैंने यह टुकड़ा उस दिन निकाला था क्योंकि यह टूटा था। और मैं उस दिन घर से गया क्योंकि मुझे लगा कि मैं भी इस टुकड़े की तरह हूँ — किसी काम का नहीं। मुझे पढ़ाई नहीं आई, अब्बा। मुझे तुम्हारा हुनर नहीं आया। मुझे सिर्फ़ भार उठाना आया। और भार उठाने वाले को घर में जगह नहीं मिलती, यह मैंने तुम्हारी चुप्पी से सीखा।"
हबीब चाचा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
बिल्कुल सफ़ेद। जैसे किसी ने उनके चेहरे से खून का आख़िरी कतरा भी खींच लिया हो।
उन्होंने धीरे से कहा — और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो चालीस साल की चुप्पी में जमा होती है — "तूने मेरा पंप नहीं तोड़ा।"
वो रुके।
"तूने मेरा घर तोड़ा था।"
इमरान पत्थर की तरह खड़ा रहा।
"एक टुकड़ा निकाल लिया," हबीब चाचा ने कहा, और अब उनकी आवाज़ काँप रही थी, "और चला गया। बिना बताए। बिना एक शब्द कहे। तेरी माँ ने तीन महीने तक तेरी थाली नहीं उठाई। तीन महीने। मैंने उसे कहा — वो लौट आएगा। वो हर रोज़ दरवाज़े की तरफ़ देखती रही। और मैं? मैं क्या कहता?"
उन्होंने आँखें मींच लीं।
"मैं तो तेरी साइकिल भी नहीं बेच सका, इमरान। तेरी साइकिल आज भी आँगन में खड़ी है। लोहे पर ज़ंग लग गई, टायर फट गए, पर मैंने उसे छुआ नहीं। मेरी बीवी कहती थी — यह साइकिल कब तक रखोगे? मैं कहता था — जब तक वो नहीं आता।"
इमरान की आँखें भर आईं।
"पर तू आया कब?" हबीब चाचा ने कहा। "आज। जब गली में पानी रुका। जब सब बोल रहे हैं। तब तू आया — और पानी का वादा लेकर। बाप के आँगन से नहीं, बोल दिया। बड़ी बात बोल दी।"
उन्होंने लाठी उठाई, फिर रख दी, जैसे हाथ में ताक़त न बची हो।
"तू आया होता," उन्होंने धीमे से कहा, "तो मैं तुझे पानी देता। गली को नहीं, तुझे। तेरी बाल्टी में अपने हाथ से भरता। पर तू पहले गली को बोलने आया, अपने बाप को नहीं।"
इमरान ने एक कदम आगे रखा।
"अब्बा —"
"मत कह," हबीब चाचा ने कहा। "आज कुछ मत कह। मैंने चालीस साल सुना है, इमरान। आज बस थोड़ा सा चुप रहने दे।"
वो मुड़े।
और चले गए। लाठी की आवाज़, धीमी, टपकती, गली की धूल में रह गई।
इमरान वहीं खड़ा रहा, टूटा हत्था हाथ में।
बबलू ने देखा, हँसा और बोला, "अच्छी बात है। घर की बात घर में। पानी की बात गली में। अब आओ, बाल्टियाँ आगे लाओ।"
कोई आगे नहीं आया।
कोई नहीं।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं, जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहे हों।
मैंने घंटी छुई।
वो ठंडी थी। पर अब हिल रही थी। जैसे अंदर से कोई आवाज़ आने वाली हो।
मैंने इमरान के कंधे पर हाथ रखा।
"अभी मत जा," मैंने कहा।
उसने सिर हिलाया। आँसू पोंछे।
"मुझे नहीं पता था," उसने कहा। "मुझे नहीं पता था कि वो साइकिल रखी है।"
"मुझे भी नहीं पता था," मैंने कहा, "कि मेरे पापा ने मेरे लिए कितनी चीज़ें अंदर दबा रखी हैं। यह बीमारी है, इमरान। इस गली की हर बाप-बेटे की बीमारी। हम सब चुप रहते हैं, और सोचते हैं कि चुप्पी से बचा लेंगे। बचता कुछ नहीं। सिर्फ़ देर होती है।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
बबलू का हाथ अब रूमाल पर कस रहा था। उसने अपनी जेब से फोन निकाला और किसी को मिलाया।
उसकी आवाज़ धीमी थी, पर मैंने सुना — "साहब, यहाँ कुछ गड़बड़ है। हाँ। वो लड़का आ गया। हबीब का।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
मीरा ने कैमरा नहीं उठाया। उसने सिर्फ़ सिर हिलाया, जैसे कह रही हो — मैं सुन रही हूँ, तुम चलो।
मैंने गली की तरफ़ देखा।
औरतें बाल्टियाँ लिए खड़ी थीं। बच्चे बर्तन गिनकर भूल गए थे। और सबसे पीछे, नीम की छाया में, सुनीता दीदी खड़ी थी — हाथ में वो खाली कटोरी, जो उसने सभा में ज़मीन पर रखी थी।
मैंने सुनीता दीदी की तरफ़ देखा। उन्होंने नज़र चुराई।
"बबलू भाई," मैंने कहा, "एक बात और पूछूँ?"
"पूछो। पर ज़्यादा मत पूछो। मेरा वक़्त है।"
"आपने कहा — जो अंगूठा लगाएगा, उसे पानी मिलेगा। ठीक है। पर एक बात बताओ — जिस घर में कोई अंगूठा लगाने वाला ही न हो? जैसे सुनीता दीदी का क्वार्टर। उसमें सिर्फ़ एक औरत है और एक चौदह साल का बच्चा। अंगूठा किसका लगेगा? राहुल का? चौदह साल के बच्चे का अंगूठा काग़ज़ पर चलेगा?"
बबलू हँसा।
"चलेगा," उसने कहा। "उम्र का क्या है? हम काग़ज़ देखते हैं, उम्र नहीं।"
गली में कोई बोला — "हद है।"
कोई औरत बोली — "बच्चे का अंगूठा? शर्म नहीं आती?"
बबलू ने कंधे उचकाए। "शर्म से पानी नहीं आता। मैं तो सिर्फ़ साहब का हुक्म बता रहा हूँ।"
मैंने घंटी जेब में छुई।
और घंटी ने कहा — साफ़, पहले से साफ़, जैसे अब उसकी आवाज़ गली की आवाज़ों में घुल गई हो —
"अब बोलो।"
मैंने आँखें बंद कीं।
फिर मैं मुड़ा और मैंने गली से कहा — "सब सुनो। मेरी बात ध्यान से। यह काग़ज़ मुफ़्त नहीं है। यह काग़ज़ उधार है। इसमें पानी ऊपर लिखा है, ज़मीन नीचे छिपी है। आज अंगूठा लगाओगे, कल यह गली तुम्हारी नहीं रहेगी। मैं जानता हूँ कि प्यास सबसे बड़ी होती है। जब बच्चा रोता है तो आदमी हर काग़ज़ पर अंगूठा लगा देता है। पर यही तो उनका हथियार है। वो हमें प्यासा रखेंगे, और फिर पानी का काग़ज़ थमा देंगे। हम पानी के लिए अंगूठा लगाएँगे, और वो हमारी ज़मीन के लिए।"
गली चुप थी।
फिर शबनम आपा ने कहा — और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो चूल्हे में कम पड़ी थी — "मेरा चूल्हा आज बंद है। कल भी बंद रहेगा। मैं अपनी गुमटी की ज़मीन पर अंगूठा नहीं लगाऊँगी। और जो लगाएगा, उसे मेरी गुमटी से चाय नहीं मिलेगी।"
किसी ने हँसी में कहा — "आपा, चाय तो बंद है ही।"
शबनम आपा ने कहा — "तो यह भी जान लो। मेरी चाय न मिलने की खबर पहले फैलेगी, फिर पानी की।"
गली हँसी।
और वो हँसी अच्छी थी। वो हँसी में डर का टूटना था।
बबलू ने फ़ोन जेब में रखा। उसका चेहरा अब मुस्कुरा नहीं रहा था।
"ठीक है," उसने कहा। "तुम्हारी मर्ज़ी। पर एक बात याद रखना। पानी कल भी नहीं आएगा। परसों भी नहीं। मशीन कल सुबह सात बजे आएगी। और मशीन काग़ज़ नहीं माँगती।"
वो टैंकर पर चढ़ा।
इंजन गरजा।
और टैंकर चला गया, पीछे से टपकता हुआ — टप, टप, टप।
जब टैंकर गली के मुँह से निकला, तो पीछे से एक आवाज़ आई।
"अंकुश भैया, वो टपकता था।"
चिंटू था।
"हाँ," मैंने कहा।
"तो हम बाल्टी रख देते टैंकर के नीचे। दो बूँद तो मिल जाती।"
मैं हँसा।
"चिंटू," मैंने कहा, "आज तूने सबसे समझदारी की बात कही। दो बूँद से काम नहीं चलेगा, पर याद रखना। दो बूँद भी किसी की प्यास बुझा सकती है, अगर वो सही हाथ में गिरे।"
चिंटू ने सीना फुलाया।
इमरान ने टूटा हत्था उठाया।
"यह मैं तुम्हें दे देता हूँ," उसने कहा। "तुम इसे जोड़ सकते हो। मुझे नहीं आता। तुम्हें आता है।"
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