The Mysterious Bell – Chapter 560
अपने हिसाब से सोचने लगा — मुझे यह ठीक करना है। बस एक लीवर है, मुड़ी हुई धातु है, दो घंटे का काम। फिर यह पानी देगा। फिर गली का पानी वापस आएगा। और फिर मुझे काग़ज़ नहीं चाहिए। काग़ज़ का जवाब लोहे से।
मैंने घंटी को जेब में छुआ।
और घंटी ने कहा — चार शब्द।
"नल नहीं, रिश्ता।"
मैं रुक गया।
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
क्योंकि मुझे समझ आ गया।
हम चारों तरफ़ से घिरे हुए थे, और सबका दरवाज़ा एक ही था — पानी। रणवीर ने इमारतें नहीं गिराईं, ईंटें नहीं तोड़ीं। उसने बस एक काग़ज़ बनवाया — पानी का काग़ज़ — और पूरी गली प्यासी हो गई।
और ज़्यादा बड़ी बात यह थी कि उस काग़ज़ की सबसे मज़बूत कील जो थी, वो हबीब चाचा के अपने बेटे के हाथ में थी।
क्योंकि साइट पर काम करने वाले लोगों को पता होता है कि साइट कैसे चलती है। और उस काग़ज़ पर किसका हाथ है, यह सिर्फ़ वही बता सकता है जो अंदर खड़ा हो।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद ने धीरे से कहा, "घर के अंदर से दरवाज़ा खोलना पड़ता है। बाहर से धक्का देने से दीवार गिरती है, दरवाज़ा नहीं खुलता।"
और तभी —
पीछे से एक आवाज़ आई।
"अब्बा।"
मैं मुड़ा।
गली के मुँह पर एक लड़का खड़ा था। उम्र पच्चीस-छब्बीस के आसपास। सिर पर पीला हेलमेट, हाथ में झोला, पैरों में साइट के जूते, कपड़ों पर सीमेंट की सफ़ेद धूल, और आँखों में वो शर्म जो बेटे की आँखों में तब आती है जब वो अपने बाप के सामने खड़ा होता है और नहीं जानता कि क्या कहे।
हबीब चाचा ने सिर उठाया।
चेहरे पर कुछ नहीं था। बिल्कुल कुछ नहीं। और यही सबसे बुरा था।
इमरान ने हेलमेट उतारा। उसने एक कदम आगे रखा और फिर रुक गया, जैसे गली ने उसे अंदर आने से मना कर दिया हो।
फिर उसने कहा — और उसकी आवाज़ पूरी गली ने सुनी, क्योंकि उस वक़्त गली में कोई नहीं बोल रहा था —
"मैं पानी लाऊँगा।"
हबीब चाचा के हाथ काँपे।
"पर अपने बाप के आँगन से नहीं।"
वो चुप हो गया।
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा। उस्ताद ने अपनी कॉपी सीने से और कसकर पकड़ ली। मीरा ने धीरे से कैमरा उठाया और मैंने हाथ से रोका — अभी नहीं। कुछ चीज़ें कैमरे के लिए नहीं होतीं।
मैंने इमरान की तरफ़ देखा।
और मुझे अचानक वो पल याद आया जब पापा ने कहा था — पच्चीस साल की चुप्पी ने मुझे बचाया नहीं, खोखला किया।
मैंने घंटी जेब में छुई।
वो ठंडी थी। पर हिल रही थी।
जैसे किसी की साँस।
मैंने एक कदम आगे रखा और सोचा — अब जो भी होगा, इस रिश्ते से होगा। काग़ज़ से नहीं। पानी से नहीं। इस बाप और इस बेटे के बीच से होगा।
और मुझे सच में नहीं पता था कि मैं क्या कहने वाला हूँ। पर मुझे इतना पता था कि अगर आज मैंने यहाँ गलत शब्द बोला, तो कल गली में पानी फिर भी नहीं आएगा, और रिश्ता तो कभी नहीं आएगा।
मैंने मुँह खोला।
घंटी खुद भी चुप थी। जैसे वो भी सुनना चाहती हो कि मैं क्या कहता हूँ।
॥
मैंने मुँह खोला, पर पहला शब्द इमरान ने नहीं, गली ने बोला।
क्योंकि जैसे ही मैंने कदम आगे बढ़ाया, पीछे से बाल्टियों की आवाज़ आई। लोहे के हैंडल पत्थर पर टकराए। कोई किसी से कह रहा था, "तेरी बारी बाद में, पहले मेरी।" कोई कह रहा था, "सुबह से खड़ी हूँ, एक बूँद नहीं मिली।"
हबीब चाचा ने इमरान की तरफ़ देखा।
देखा। ठीक से देखा। अपने बेटे को देखा, जो गली के मुँह पर खड़ा था, हेलमेट हाथ में, सीमेंट की धूल से सफ़ेद, और आँखों में वो टूटापन जो बीस साल की चुप्पी में ढल जाता है।
और फिर हबीब चाचा ने नज़र हटा ली।
न हाँ, न ना। न गुस्सा, न प्यार। बस हटा ली। जैसे कोई दीवार पर का पोस्टर देखकर आँख फेर लेता है।
इमरान के हाथ से हेलमेट फिसला।
फिर उसने उसे उठाया, झोले में डाला, और बिना कुछ कहे गली के किनारे पत्थर पर बैठ गया।
न गया। न आया।
मैं बीच में खड़ा रह गया।
काजल मेरे पीछे आई और धीरे से बोली, "कुछ बोल क्यों नहीं रहा?"
"सोच रहा हूँ," मैंने कहा।
"क्या सोच रहा है?"
"कि बाप-बेटे की चुप्पी में खुद से ज़्यादा मेरा वक़्त गया है, यह सोच रहा हूँ। और मुझे यह भी नहीं पता कि इसमें मेरा हक़ क्या है।"
काजल ने कुछ नहीं कहा।
तभी गली में पानी की कतार बढ़ गई।
सुबह के आठ बजे थे, पर धूप पहले से चढ़ी हुई थी। शबनम आपा की गुमटी के चूल्हे पर बर्तन नहीं थे, क्योंकि शबनम आपा ने चूल्हा बंद कर दिया था। गुमटी के बाहर की बेंच पर पाँच औरतें बैठीं थीं, और किसी के हाथ में चाय का कप नहीं था। यह नज़ारा ही अजीब था। इस गली में चाय के बिना लोग बैठते नहीं थे।
पहली बाल्टी लेकर नसीमा बाई आई। मुँह पर थकान, हाथ पर आटे का निशान। उसने बाल्टी मेरे सामने रखी और बोली, "अंकुश, तेरा नल सूखा है, मेरा भी। पूरी गली का सूखा है। हबीब चाचा का पंप तोड़ दिया, अब बचा क्या?"
"बचा है," मैंने कहा। "बस सोच रहा हूँ कि किससे शुरू करूँ।"
"शुरू क्या करना है? पानी लाना है।"
"पानी लाना है, पर पहले यह देखना है कि पानी किसने रोका।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर उस्ताद की तरफ़, फिर गुमटी की तरफ़। "सबको पता है किसने रोका। फिर भी कोई कुछ नहीं बोलता।"
"तो आज बोलेंगे," मैंने कहा। "एक-एक करके।"
तभी बच्चों की टोली दौड़ती हुई आई।
सानिया आगे, उसके पीछे गुड्डू, फिर रफ़ीक़ और आख़िर में चिंटू, जो अपनी चप्पल पकड़े हुए था, जैसे भागते-भागते निकल आई हो।
"अंकुश भैया!" सानिया ने कहा, साँस फूली हुई। "हमने गिन लिया।"
"क्या गिना?"
"बर्तन। हर घर के।"
रफ़ीक़ ने अपनी टूटी चश्मे से देखा और बोला, "कुल मिलाकर चालीस से ज़्यादा बाल्टियाँ हैं। और सत्रह घड़े। और तीन टब। एक टब तो वो बड़ा वाला है जिसमें कपड़े धोते हैं।"
चिंटू ने कहा, "और सात मग भी हैं। छोटे वाले। बच्चों के।"
गुड्डू ने कहा, "मग तो पानी नहीं रोकते।"
"रोकते हैं," चिंटू ने कहा, गंभीरता से। "जब प्यास लगी हो, तो मग बाल्टी जैसा ही होता है।"
मुझे हँसी आई।
पर हँसी गले में ही रुक गई, क्योंकि सानिया ने आगे कहा, "अंकुश भैया, सबसे ज़्यादा बर्तन सुनीता दीदी के क्वार्टर के बाहर हैं। राहुल ने दो बाल्टियाँ और एक टब निकाल रखा है। वो कह रहा था कि अगर पानी न आया तो वो स्कूल भी नहीं जाएगा, क्योंकि नहाए बिना नहीं जाएगा।"
"और सुनीता दीदी ने क्या कहा?"
सानिया ने कंधे उचकाए। "कुछ नहीं। बस बैठी थी। उसके हाथ में कटोरी थी, खाली।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद मेरे पास आए, कॉपी सीने से लगाए। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस मेरे कंधे पर हाथ रखा और दबाया। जैसे कह रहे हों — सुन रहा है? सुनता रह। बात दरवाज़े से नहीं, खिड़की से आती है, और खिड़की की तरफ़ देखने के लिए सिर घुमाना पड़ता है।
तभी गली के मुँह पर ट्रक की आवाज़ आई।
भारी, गरजती, दबंग।
मैं मुड़ा।
एक टैंकर आ रहा था। पुराना, पीले रंग का, ऊपर लोहे की सीढ़ी, पीछे से पानी टपक रहा था — टप, टप, टप — जैसे टैंकर खुद भी प्यासा हो।
टैंकर के बोनट पर कोई बैठा था।
बबलू पांडे।
आज उसने चेन नहीं पहनी थी। पानदान नहीं था। हाथ पर सफ़ेद रूमाल बँधा था, जिस पर गुलाबी दाग सूख रहा था। वो मुस्कुरा रहा था, और उस मुस्कान में वो बात थी जो भूखे आदमी के सामने रोटी लहराने वाले की आँखों में होती है।
टैंकर रुका।
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