The Mysterious Bell – Chapter 550
उनके एक कदम पीछे रज़िया थीं। सफ़ेद कपड़ा अब भी कंधों पर, आँखें सूजी हुईं, हाथ में कोई चीज़ नहीं। वो खड़ी थीं, बस खड़ी थीं, जैसे कोई बरसों बाद मैदान में उतरा हो और नहीं जानता हो कि हाथ कहाँ रखे।
शबनम आपा चबूतरी के सामने रुकीं।
गली में सन्नाटा था। स्टोव की हल्की फुँकार, नाली का पानी, और पीपल की पत्तियों में एक कौआ।
फिर शबनम आपा ने गला साफ़ किया और बोलीं।
वो आवाज़ उनकी नहीं लग रही थी। वो आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने सुबह उन्हें एक काग़ज़ पढ़ने को दे दिया हो और वो उसे शब्द-दर-शब्द सुना रही हों।
"सब यहीं हैं। अच्छा हुआ।"
उन्होंने एक बार सब पर नज़र घुमाई। मेरे ऊपर, उस्ताद पर, नसीमा बाई पर, मीरा पर। फिर रज़िया पर नहीं देखा।
"सुन लो सब। जो हुआ सो हुआ। पंद्रह साल का झगड़ा था। अब मैं माफ़ कर देती हूँ। आगे अपनी-अपनी राह चलो। मेरी राह अलग, इनकी राह अलग। न मेरा कोई किसी से लेना, न किसी का मुझसे।"
उन्होंने साड़ी का पल्लू ठीक किया।
"बस, इतना ही कहना था।"
और चुप हो गईं।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। पत्थर जैसी ठंडी।
एक पल।
दो पल।
पीपल की पत्तियाँ हिलीं।
गली में कोई नहीं बोला। सानिया की कॉपी पर उसका हाथ जम गया था। टिंकू ने पैर का अंगूठा ज़मीन पर रगड़ा। उस्ताद ने चश्मा ऊपर किया और फिर नीचे कर दिया। नसीमा बाई ने हाथ जोड़ लिए, जैसे किसी की मौत पर खड़ी हों।
मेरे हाथों में पसीना आ गया।
मुझे लगा कि नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, कोई तो कुछ बोले, घंटी तो कुछ कहे, कुछ तो कहे।
घंटी चुप रही।
तीन पल।
चार पल।
शबनम आपा ने चारों तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर पहले गुस्सा आया, फिर घबराहट। जैसे किसी ने उन्हें बताया हो कि नाटक हो गया, पर तालियाँ नहीं बजीं।
उन्होंने आवाज़ ऊँची की।
"मैंने माफ़ कर दिया! सुना नहीं किसी ने? माफ़ कर दिया!"
और तब घंटी बोली।
बहुत छोटी आवाज़। इतनी छोटी कि मुझे लगा कि किसी ने दूर से सुई गिराई हो।
"झूठ।"
एक शब्द।
बस।
शबनम आपा का हाथ हवा में रुक गया। चिमटी उनके हाथ से नहीं गिरी, पर उनकी पकड़ ढीली हो गई।
गली में सन्नाटा और गहरा हो गया। किसी ने साँस लेने की आवाज़ की तरह मुँह खोला और बंद कर दिया।
मैं आगे आया। चबूतरी से नीचे उतरा और उनके सामने खड़ा हो गया। मेरे हाथ में घंटी थी, इसलिए मुझे पता था कि आज मैं एक भी झूठ नहीं बोल सकता। मगर सच बोलने में जो तकलीफ़ होती है, वो झूठ बोलने में नहीं होती।
"आपा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ जितनी नरम हो सकती थी, उतनी नरम थी, "आपने माफ़ नहीं किया।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"आपने बस ये किया कि झगड़े को बंद करने के लिए एक बहाना बना लिया। जैसे कोई दरवाज़े पर ताला लगाकर कहे कि कमरा खाली है। कमरा खाली नहीं है, आपा। अंदर सामान भरा पड़ा है, सिर्फ़ ताला लग गया है।"
"अंकुश —" नसीमा बाई ने धीरे से कहा, जैसे मुझे रोक रही हों।
पर मैं रुका नहीं।
"और इस तंत्र में ऐसी माफ़ी नहीं गिनी जाती। न गिनी जाएगी। माफ़ी वो होती है जिसमें आप कोई चीज़ खो देते हैं। आपने आज कुछ नहीं खोया, आपा। आपने बस पुरानी गठरी को दूसरी तरफ़ कर दिया।"
शबनम आपा का चेहरा लाल हुआ।
"तू छोकरा है," उन्होंने कहा, और आवाज़ काँप रही थी। "तेरी उम्र क्या है? चौबीस? पच्चीस? और मुझे बताएगा कि मेरे अंदर क्या है? तू क्या जानता है मेरे बारे में? तूने मेरी रातें देखी हैं? तूने वो साल देखे हैं? तू उस औरत के सामने खड़ा है जिसने पंद्रह साल एक ही चूल्हे पर खड़े होकर काट दिए — अकेले। बता, तू क्या जानता है?"
मैंने एक पल इंतज़ार किया।
फिर मैंने धीरे से कहा, "नहीं। मैं नहीं जानता, आपा।"
वो रुक गईं, जैसे उम्मीद नहीं थी कि मैं ये कहूँगा।
"मैं आपके अंदर नहीं झाँकूँगा। मुझे हक़ भी नहीं है।"
मैंने घंटी को हल्का सा ऊपर किया।
"आपके अंदर क्या है, वो सिर्फ़ आप बता सकती हैं। और आज मैं यही कहने आया हूँ कि जब तक आप नहीं बताएँगी, आपकी बहन रोज़ इस गली में आकर रोएगी, और रोज़ ये गली उसे देखेगी, और रोज़ किसी को कुछ कहना होगा, पर कोई कुछ कहेगा नहीं। ये तीनों चीज़ें एक साथ चलती रहेंगी। पंद्रह साल से चल रही हैं। आप इन्हें एक सुबह के सन्नाटे से नहीं मार सकतीं।"
रज़िया ने तब तक कुछ नहीं कहा था। वो खड़ी थी।
और तभी टिंकू से रहा नहीं गया।
"उस्ताद," वो पीछे से बोला, आवाज़ में बच्चों वाली सच्ची नाराज़गी, "इनको चाय की छड़ी लग गई है!"
सानिया ने झट से उसका मुँह दबा दिया। गुड्डू से हँसी फूट गई और उसने जल्दी से मुँह हाथ से ढका। चिंटू की रिम हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिरी और घूमने लगी और उसकी खनखनाहट ने पूरे सन्नाटे को एक अजीब सी गरमाहट दे दी।
सानिया ने टिंकू के कान में कुछ फुसफुसाया, और टिंकू ने जवाब में ज़ोर से कहा, "मतलब मैं ग़लत नहीं कह रहा!"
उसी वक़्त उस्ताद ने अपनी लाठी ज़मीन पर एक बार ठोंकी।
बस एक बार।
और हँसी रुक गई, जैसे किसी ने दीया बुझा दिया हो।
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा। पर उनका ठोंकना ये कह रहा था कि ये हँसी का वक़्त नहीं है, और मुझे लगा कि अगर आज गली में कोई एक इंसान समझदार है, तो वो उस्ताद हैं, और मैं नहीं।
और तब रज़िया ने आगे कदम रखा।
उन्होंने किसी से कुछ नहीं पूछा। उन्होंने न मेरी तरफ़ देखा, न उस्ताद की तरफ़, न गली के लोगों की तरफ़।
वो चबूतरी के सामने, पत्थर पर, घुटनों के बल बैठ गईं।
शबनम आपा ने पहली बार उनकी तरफ़ सीधा देखा। और उनके हाथ में जो चिमटी थी, वो हल्की सी काँपी।
"माफ़ी तो माँगनी है," रज़िया ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, सूखी, जैसे रात भर रोने के बाद आवाज़ में पानी न बचा हो। "पर शबनम, माफ़ी माँगने से पहले तू मुझे एक बात बता।"
शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा।
"वो कौन सा दिन था?"
सन्नाटा।
"जिस दिन तूने मुझसे कहा था — अब तू मत आ।"
रज़िया ने अपने कंधों पर पड़ा सफ़ेद कपड़ा पकड़कर कस लिया।
"मुझे लफ़्ज़ याद हैं। लफ़्ज़ ऐसे याद हैं जैसे कल की बात हो। तेरा सामने खड़ा होना याद है। तेरे हाथ में कुछ था — मैंने दूध की कटोरी लाई थी, तूने वो नहीं ली, तूने हाथ भी नहीं बढ़ाया, तूने बस मुँह फेरा और वो शब्द कहे। तेरे मुँह से निकले, ये भी याद है।"
वो रुकीं। किसी ने साँस नहीं ली।
"पर वो दिन — कौन सा दिन था? तारीख़, महीना, साल — वो मुझे याद नहीं। मैंने बरसों सोचा, गिना, काग़ज़ पर लिखा, मगर वो दिन मेरे हाथ नहीं आया। तू बता। तुझे याद होगा। तूने ही तो कहा था। कौन सा दिन था?"
शबनम आपा जम गईं।
उनका मुँह खुला रह गया। उन्होंने होंठ हिलाए, कुछ नहीं निकला। मैंने देखा कि उनके हाथ में चिमटी धीरे-धीरे झुक रही है, जैसे उसका वज़न बढ़ गया हो।
गली में एक भी आवाज़ नहीं।
फिर शबनम आपा ने बहुत धीरे, बहुत ज़्यादा धीरे, मुँह से कुछ कहा जो सुनाई नहीं दिया।
"क्या?" रज़िया ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार चढ़ी। "क्या कहा तूने?"
शबनम आपा ने कोई जवाब नहीं दिया।
उन्होंने चिमटी उठाई — एक झटके में, जैसे कोई औज़ार उठाता है, और गुमटी की तरफ़ चल दीं।
तीन कदम चलकर वो रुकीं। पलटीं नहीं। सामने देखती हुई कहा —
"आज चूल्हा जलाना है।"
उनकी आवाज़ सपाट थी।
"और चूल्हे के सामने ऐसी बातें नहीं होतीं।"
वो आगे बढ़ीं।
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