The Mysterious Bell551 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 551

7 min read November 5, 2026

सब देखते रहे। रज़िया घुटनों के बल बैठी रहीं, ज़मीन पर। मेरे पीछे टिंकू ने कुछ कहना चाहा, सानिया ने उसका कंधा दबा दिया। मीरा ने पेन उठाया था, पर लिखा कुछ नहीं, और उसका हाथ हवा में ही रुका रहा। उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई पुरानी बात याद आ गई हो जिसे वो बंद आँखों से ही सह लेना चाहते हों।

और मैंने — मैंने वो किया जो शायद नहीं करना चाहिए था। पर मैं झूठ नहीं बोल सकता था, और सच ये था कि मुझे उस जवाब में कुछ सुनाई दिया था।

मैंने पीछे से आवाज़ दी।

"ठीक है, आपा। चूल्हा जलाइए।"

शबनम आपा रुक गईं।

उनका हाथ गुमटी के पल्ले पर था। वो एक पल वैसे ही खड़ी रहीं, पीठ मेरी तरफ़।

और फिर, बिना पलटे, उन्होंने वो कहा जो किसी ने उम्मीद नहीं की थी।

"ये चूल्हा उस दिन से जला हुआ नहीं।"

उनकी आवाज़ टूटी।

"जिस दिन माँ गई थी।"

फिर वो गुमटी के अंदर चली गईं, और पर्दा हिला, और फिर सब कुछ चुप।

मैं वहीं खड़ा रहा। हाथ में घंटी ठंडी थी — पत्थर जैसी ठंडी। कोई अंक नहीं, कोई हल्की गुनगुनाहट नहीं, कुछ भी नहीं।

पर उस एक वाक्य में पूरी गली को समझ आ गया था कि आज तक जो कुछ हुआ, वो झगड़ा नहीं था।

वो एक चूल्हा था, जो उस दिन बुझ गया था — और पंद्रह साल से किसी ने उसे फूँक मारकर जलाने की कोशिश नहीं की थी।

रज़िया ने धीरे से सिर उठाया। उनके चेहरे पर आँसू नहीं थे। थकान थी, और उस थकान में एक छोटी सी चीज़ थी — जैसे किसी ने बरसों बाद उनके सामने दरवाज़े पर एक हल्की सी दरार छोड़ दी हो।

मैंने घंटी जेब में रखी।

और मैंने गली की तरफ़ देखा — पचास आदमी, औरतें, बच्चे, सब खड़े थे, जैसे किसी ने पूरे मोहल्ले को एक सुबह के लिए रोक दिया हो।

स्टोव पर केतली उबल रही थी।

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

"जा," मैंने कहा। "चाय बना।"

"उस्ताद, गुमटी का चूल्हा —"

"गुमटी का चूल्हा चल रहा है," मैंने कहा। "मेरी केतली भी चलेगी।"

॥

दिन कैसे गुज़रा, ये मुझे भी ठीक से याद नहीं। सुबह वो चाय पीकर सब अपने-अपने काम पर चले गए — कोई दुकान पर, कोई स्कूल, कोई उसी पुरानी आदत के मुताबिक़। गली में जो वाक्य सुबह गूँज रहा था — "ये चूल्हा उस दिन से जला हुआ नहीं" — दोपहर तक वो सिर्फ़ फुसफुसाहट बन गया, और शाम तक लोग उसे भूलने लगे, जैसे गली ने सुना ही न हो।

पर मैं नहीं भूला।

उस दिन शटर नहीं उठा। दुकान बंद रही। मैं पीपल की चबूतरी पर बैठा रहा और घंटी मेरी जेब में पड़ी थी — ठंडी, चुप, जैसे कोई थककर सो गया हो। मैंने उसे दो-तीन बार उँगली से छुआ, पर वो कुछ नहीं बोली। न कोई अंक, न कोई गुनगुनाहट। बस एक चुप्पी, जो मुझे अंदर से खटकती रही।

शाम को काजल अस्पताल से लौटी, दवा के दो पत्ते लेकर। कुछ नहीं बोली, बस माँ के पास बैठ गई।

और रात आ गई।

ग्यारह बजे की गली में एक भी चिराग नहीं जलता। दूर-दूर तक सिर्फ़ एक बल्ब — शबनम आपा की गुमटी के पीछे, बर्तन धोने वाली जगह पर, जो पीला-पीला झुका हुआ जलता है।

मैं पीपल के नीचे था। चबूतरी पर अकेला। ऊपर पत्तों में हवा बह रही थी, और बीच-बीच में एक पत्ता टूटकर गिरता, जैसे कोई बहुत धीरे से कदम रख रहा हो।

तभी मैंने देखा — गुमटी की तरफ़ से एक परछाईं आई।

रज़िया।

वो अपने कंधों पर वही सफ़ेद कपड़ा रखे हुए थी, जो उस्ताद ने शाम को रखा था। हाथ में बैग था — वही फटा पुराना बैग। वो धीरे-धीरे चली, जैसे कदम उठाने में हिम्मत लग रही हो, और गुमटी के पीछे पहुँचकर एक पल रुक गई।

शबनम आपा उसे नहीं देख रही थीं। वो पीठ मुझसे करके बैठी थीं, टब के पास, दोनों हाथ पानी में, और बर्तन धो रही थीं। पानी की आवाज़ — छप, छप, छप — सिर्फ़ वही सुनाई दे रही थी।

रज़िया ने बैग खोला।

उसमें से कुछ निकाला — कपड़े में लिपटा, मुलायम, गहरे मरून रंग का। उन्होंने उसे खोला। रेशम था, पर पुराना — किनारों पर सुनहरी ज़री घिस चुकी थी, बीच के छोटे-छोटे फूल अब भी ज़रा-सा चमकते थे, जैसे बरसों से अंधेरे में पड़े हों और अब हवा लगी हो।

माँ की चुनरी।

मैंने उसे पहचाना — नहीं, सच कहूँ तो मैंने नहीं पहचाना। मैंने सिर्फ़ ये देखा कि रज़िया के हाथ उसे पकड़कर काँप रहे थे, जैसे वो कोई चीज़ उठा रही हों जिसका वज़न उनके बस में न हो।

रज़िया ने वो चुनरी गुमटी के पास पड़े लकड़ी के एक छोटे स्टूल पर रख दी।

एक भी शब्द नहीं बोली।

बस रखी और पीछे हटकर खड़ी हो गई।

शबनम आपा के हाथ पानी में रुक गए।

उन्होंने सिर नहीं उठाया। बस पानी में हाथ डाले, वैसे ही बैठी रहीं, और मैंने देखा कि उनकी पीठ एक पल के लिए सख़्त हो गई — जैसे किसी ने उनके कंधों पर हाथ रख दिया हो।

फिर वो धीरे-धीरे उठीं।

उन्होंने टब के किनारे पर पड़ा तौलिया उठाया। हाथ पोंछे। उँगलियों के बीच से पानी टपकता रहा, और वो बस वैसे ही खड़ी रहीं, आधी मुड़ी हुई, आधी सीधी।

फिर उन्होंने कहा — और उनकी आवाज़ वो नहीं थी जो दोपहर तक गली में गूँज रही थी। ये आवाज़ धीमी थी, रूखी, पुराने कपड़े जैसी।

"माँ की चुनरी पर तेरे हाथ लगे।"

वो रुकीं।

"और मुझे पता तक न चला।"

रज़िया ने उनकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर आँसू नहीं थे, पर आँखें भरी हुई थीं, जैसे सुबह से वो खुद को रोके हुए थीं।

"तूने मुझे बुलाया ही नहीं," रज़िया ने कहा। "तो मैं कैसे आती?"

शबनम आपा ने तौलिया टब के किनारे रखा। उनके हाथ अब खाली थे, और खाली हाथ ज़्यादा काँपते हैं — ये मैंने आज देखा।

"मैंने बुलाया था," शबनम आपा ने कहा। "कितनी बार बुलाया। पर बुलाने के लिए ज़बान चाहिए, और मेरी ज़बान…" वो रुकीं। "मेरी ज़बान ने तेरे साथ वैसा बोला था कि उसके बाद वो बुला ही नहीं सकती थी।"

रज़िया ने एक कदम आगे बढ़ाया।

"तो अब बोल," उन्होंने कहा। "अब तेरी ज़बान क्या कहती है?"

शबनम आपा ने उनकी तरफ़ देखा, फिर ज़मीन पर, फिर उस चुनरी पर, जो स्टूल पर पड़ी थी — और उनका चेहरा एकदम से ऐसा हुआ जैसे किसी ने उनके अंदर का सारा दरवाज़ा खोल दिया हो, बिना दस्तक।

"उस दिन," शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ फूट पड़ी। "अस्पताल में। माँ के सिरहाने बैठकर मैंने तुझे देखा था।"

वो रुकीं। उन्होंने होंठ भींचे, कुछ सोचा, फिर कहा —

"तेरे हाथ में दवा की पर्ची थी। तू दरवाज़े पर खड़ी थी, पर्ची लिए, और माँ की तरफ़ देख रही थी। और मैं — मैं माँ के पास बैठी थी, तीन रात से, बिना नहाए, बिना सोए। तूने जब वो पर्ची दिखाई, तो मेरे अंदर कुछ ऐसा जला कि मैं खुद को रोक नहीं पाई।"

उन्होंने रज़िया की तरफ़ देखा।

"मैंने कहा था — तू माँ की जान बचाने आई है, या दिखाने आई है? अब तू मत आ।"

रज़िया ने आँखें बंद कर लीं।

"तूने मुझे माँ से मिलने से रोक दिया," उन्होंने बहुत धीरे कहा। "मैं रोज़ आती थी। गेट तक। बाहर से। अंदर नहीं घुसती थी — क्योंकि मुझे लगता था कि अगर मैं तेरे और मेरे बीच की लड़ाई में माँ को खींच लाई, तो माँ और कमज़ोर हो जाएगी। वो पहले से ही इतनी कमज़ोर थी कि…" उनका गला रुंध गया। "कि एक चुनरी उसके हाथ से नहीं उठती थी।"

शबनम आपा एक कदम पीछे हटीं, जैसे किसी ने उनके सीने पर धक्का दे दिया हो।

"तू आती थी?"

"हर रोज़।"

"रोज़?"

"हर रोज़। दोपहर बारह बजे। जब डॉक्टर इसरानी घर जाते थे। तब मैं बाहर वाले बरामदे की खिड़की से माँ को देखती थी, और चली जाती थी। तेरी नज़र में नहीं आती थी, क्योंकि मैं जान-बूझकर उस तरफ़ खड़ी होती थी जहाँ से तेरी नज़र नहीं पड़ती।"

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