The Mysterious Bell – Chapter 548
गुमटी से लगी गली में पीछे वाली तरफ़ एक छोटी सी जगह थी जहाँ बर्तन सुखाने की जगह थी और पीछे से जाने का रास्ता था। उस रास्ते में एक सीढ़ी थी, जो ऊपर गुमटी की छत पर जाती थी।
और उस सीढ़ी के किनारे पर।
अंधेरे में।
रज़िया बैठी थीं।
साड़ी का पल्लू उन्होंने मुँह पर लपेट रखा था और हिल रही थीं। हिल रही थीं, बिना आवाज़। जैसे कोई बहुत ज़ोर से रो रहा हो पर हाथों से मुँह दबा रखा हो।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
पलटकर गुमटी की तरफ़ देखा।
शबनम आपा खड़ी थीं, और उनकी आँखें उसी अंधेरे में जा रही थीं।
वो रज़िया को देख रही थीं।
फिर वो मेरी तरफ़ देखकर कुछ कहने लगीं, फिर रुक गईं और मुँह फेरकर अंदर चली गईं।
मैं चुपचाप वहाँ से हटा।
पीपल के नीचे आकर मैंने देखा — उस्ताद अली बक्श की दुकान की तरफ़ से रोशनी आ रही थी।
उनकी दुकान रात में बंद रहती थी। अभी तक तो कभी दुकान नहीं खुली थी इस वक़्त। पर उनका शटर आधा उठा हुआ था और उसके अंदर से पीली रोशनी की पतली आवाज़ आ रही थी। पुरानी सिलाई मशीन की टिक-टिक भी नहीं थी — बस चुप्पी, और पीली रोशनी।
उस्ताद ने दरवाज़े से सिर निकालकर मुझे देखा।
फिर मीरा की तरफ़ देखा — जो पीपल की दूसरी तरफ़ खड़ी थी, कैमरा लटकाए, हाथ में कलम।
"मीरा," उन्होंने धीमे से कहा। "इधर आ।"
वो गई।
उस्ताद ने जेब से एक छोटी पर्ची निकाली और उनकी तरफ़ बढ़ाई।
मीरा ने पढ़ी। उसका चेहरा पल में बदला।
"उस्ताद," उसने कहा, "यह…"
"यह बात अभी छापने की नहीं है," उन्होंने कहा।
"पर उस्ताद, यह तो…"
"मीरा।" उनकी आवाज़ वो आवाज़ थी जो वो तभी निकालते थे जब वो चाहते थे कि बात किसी की खोपड़ी में सीधी जाए। "यह बात पहले घर के अंदर पकनी चाहिए। ऐसे ही बाहर निकाल दिया तो रोटी की तरह फूल जाएगी फिर फट जाएगी।"
मीरा ने पर्ची को अपने बैग में रखा। उसकी आँखें चमक रही थीं — पर उस चमक में वो हड़बड़ी नहीं थी जो पहले हुआ करती थी। उसमें कुछ और था।
धैर्य। वो धैर्य जो इंसान को तब मिलता है जब वो एक बार जल चुका होता है और दूसरी बार सोचता है।
"उस्ताद," मैंने कहा, "ये पर्ची क्या है?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "जो शबनम ने आज सबके सामने कहा, उसका एक कोना।"
"कहाँ से आया?"
"मेरी मशीन के नीचे," उन्होंने धीमे से कहा। "दोपहर में किसी ने डाल दिया था। किसने, नहीं पता। पर जब किसी को यह सच दबाना होता है, तो वो सच किसी की जेब में बैठता है, किसी की मशीन के नीचे। और अब मेरी मशीन के नीचे आया है, तो मेरे ही हाथ से जाएगा।"
उन्होंने दरवाज़ा थोड़ा और खोला।
"आज रात मेरी पास आना," उन्होंने कहा। "अभी नहीं। सुबह से पहले। मशीन को एक बात कहनी है।"
"क्या?"
"माँ की पेटी की चाबी," उन्होंने कहा। "इलियास के पास है। और मैंने पचास साल से कहा है कि वो चाबी नहीं माँगूँगा। अब माँगनी पड़ेगी।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"उस्ताद।"
"बेटा," उन्होंने कहा, "कभी-कभी बंद दरवाज़ा इसलिए नहीं खुलता कि चाबी नहीं है। बंद दरवाज़ा इसलिए खुलता है कि पहली बार आदमी खुद जाकर कहता है — मुझे खोलनी है।"
वो दरवाज़ा बंद करने लगे, फिर रुके।
"और हाँ," उन्होंने जोड़ा, "शबनम को अभी कुछ मत कह। जो उसने आज कहा, वो पचास साल के सन्नाटे में एक चमक थी। चमक के बाद अंधेरा और घना लगता है। उसे अपने अंदर फैलने दे।"
दरवाज़ा बंद हो गया।
रोशनी बुझी।
मैं पीपल के नीचे लौटा।
टिंकू रसीदों के साथ वहीं बैठा था, आँखें मल रहा था। सानिया ने अपनी लाल कवर वाली कॉपी खोली थी और गुड्डू उसके कंधे पर मुँह डाले सो गया था। रफ़ीक़ अभी भी जाग रहा था, आँखें चौड़ी किए हुए, टूटा चश्मा नाक पर।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा। "कुछ निकला?"
मैंने उसके सामने चौकी पर बैठकर कहा —
"अभी किया तो क्या," मैंने कहा, "पर कुछ तो निकलेगा।"
"मतलब?"
"मतलब — सुबह। सुबह देखते हैं।"
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी निकाली।
पीतल का फूल मेरी हथेली पर ठंडा था। पर उसमें कुछ और था — बहुत हल्का, बहुत धीमा।
और फिर — मैंने उसे नहीं हिलाया, किसी ने नहीं छुआ, फिर भी वो बजी।
एक हल्की, छोटी "टिंग"।
एक बार।
फिर दूसरी बार।
फिर तीसरी बार।
तीन दफ़ा बजी।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसका मुँह खुला रह गया।
और घंटी की आवाज़ आई — इस बार साफ़, थोड़ी देर से, ऐसी जैसे कोई किसी बंद कमरे से बोल रहा हो —
"सुनने वाले का दरवाज़ा आधा खुल गया।"
फिर थोड़ी देर चुप।
मैं जानता था वो अभी खत्म नहीं हुई।
फिर आवाज़ आई —
"पर वो अभी भी ज़ंजीर पर है।"
और फिर —
"और यह ज़ंजीर तुझे नहीं खोलनी।"
मेरा हाथ घंटी पर जम गया।
"यह ज़ंजीर शबनम को खोलनी पड़ेगी।"
छोटी सी देर।
फिर आख़िरी बार हल्की गूँज और चुप्पी।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
उसने मुँह बंद किया।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा। "अब क्या?"
मैंने घंटी को जेब में रखा।
पीपल की दूसरी तरफ़ देखा — जहाँ उस्ताद की दुकान थी, जहाँ अब भी अंदर से चुप्पी के बावजूद मुझे मशीन की टिक-टिक सुनाई दे रही थी, जैसे वो मुझसे पूछ रही हो, "कब आएगा।"
फिर गुमटी की पिछली सीढ़ी की तरफ़ देखा। रज़िया वहीं थीं, अब भी पल्लू से मुँह छुपाए, बस उनका रोना धीमा हो चुका था और वो थकान में झुक गई थीं।
और गुमटी की उस पीली खिड़की से — जहाँ शबनम आपा पर्दे के पीछे खड़ी थीं — वो अभी भी देख रही थीं।
मैं उठा।
अंधेरा था, पर मुझे लगा कि कुछ दिख रहा है। जो दिख रहा था, वो पीपल नहीं था। वो दरवाज़ा नहीं था। वो कुछ और था —
— रज़िया की सीढ़ी की तरफ़ जाती हुईं उस्ताद अली बक्श की परछाईं।
वो केवल दस कदम चलीं, रुकीं। उन्होंने रज़िया की तरफ़ देखा — कोई एक पल। फिर उन्होंने अपने गले से एक कपड़ा निकाला। सफ़ेद, पुराना, मोड़ा हुआ।
और उन्होंने रज़िया के कंधों पर रख दिया।
कुछ नहीं कहा। बस रख दिया।
और फिर लौट गईं — सीधी, चुपचाप, गुमटी के पीछे की गली में खो गईं।
रज़िया ने सिर उठाया।
उन्होंने उस सफ़ेद कपड़े को छुआ, बस एक बार। फिर उन्होंने उसे अपने कंधों पर और कस लिया।
और मैंने घंटी जेब में दबा दी।
क्योंकि अब मुझे पता था कि आज रात घंटी नहीं बजेगी। आज रात बजने का काम शबनम आपा का है। और उसके बजने का नहीं, बोलने का है। और उस बोलने के लिए, जो कुछ है, वो मैं नहीं कर सकता। मैं सिर्फ़ इंतज़ार कर सकता हूँ।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखकर फिर से पूछा —
"उस्ताद।"
"हूँ।"
"सच में, उस्ताद — कल क्या होगा?"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा।
"कल," मैंने कहा, "सुबह सात बजे, अस्पताल के गेट पर, दो बहनें खड़ी होंगी।"
"और उसके बाद?"
"उसके बाद," मैंने कहा, "उसके बाद हम देखेंगे कि दरवाज़ा खुलता है या फिर से बंद।"
और उस रात, बहुत देर तक, गुमटी की पिछली सीढ़ी पर रज़िया बैठी रहीं — सफ़ेद कपड़ा कंधों पर, आँखें आसमान पर।
और गुमटी की पीली खिड़की पर एक पर्दा था, जो एक बार हिला।
बस एक बार।
पर वो एक बार काफ़ी था।
॥
सुबह छह बजे मैं पीपल के नीचे पहुँच गया था।
आसमान पूरा नहीं खुला था। पीपल की जड़ों में अंधेरा बैठा हुआ था और चबूतरी पर ओस की पतली परत थी। मैंने हाथ रखा तो पत्थर ठंडा था, जैसे रात भर किसी का इंतज़ार करता रहा हो और कोई न आया हो।
मैं रात भर सोया नहीं। कमरे में लेटा, छत देखता रहा, और बार-बार वही सोचता रहा जो मुझे सोचने से रोका गया था।
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