The Mysterious Bell – Chapter 547
शबनम आपा ने आँखें बंद कीं।
और फिर धीरे से बोलीं, ऐसे बोलीं जैसे कोई बोझ उतार रही हों —
"वो दिन माँ के आख़िरी हफ़्ते का तीसरा दिन था। मैं अस्पताल गई थी — माँ को देखने। गेट पर पहुँची, तो देखा कि रज़िया खड़ी है।"
रुकीं।
"हाथ में कटोरी थी। हमारी माँ के घर की पुरानी मिट्टी की कटोरी। दूध भरकर लाई थी — ऊपर मलाई जमी हुई। अपनी तरफ़ की दूध वाली नहीं, कोई बाज़ार के दूध वाली नहीं — अपने घर के गाय का दूध। पंद्रह साल पहले जो गाय थी, वो तो अब नहीं है। पर उस दिन वो किसान से ताज़ा दूध लेकर आई थी। कह रही थी कि माँ को दे दूँगी।"
मेरा मुँह सूख गया।
"मैंने क्या किया, ये बता रही हूँ," शबनम आपा ने कहा। "मैं गेट पर पहुँची, और रज़िया ने मुझे देखा, और उसका चेहरा — उसका चेहरा ऐसा हुआ जैसे किसी ने उसके सामने अचानक दरवाज़ा बंद कर दिया हो। वो डर गई थी। मेरे चेहरे से।"
उन्होंने पानी से भरा कटोरा उठाया और बिना देखे उसे चटाई पर रख दिया।
"मैंने उससे कहा — तू मत आ।"
उनकी आवाज़ टूटी।
"मैंने उससे कहा — तू मत आ। तू जब आती है, माँ की तबीयत और बिगड़ती है।"
उनके हाथ कटोरे पर जम गए। मुझे लगा कि अगर वो हाथ हटेंगे तो कटोरा भी उनके साथ ही हिलेगा।
"और मैंने यह नहीं कहा कि मैं क्यों कह रही हूँ," उन्होंने कहा। "मैंने यह भी नहीं कहा कि माँ तीन दिन से बोल नहीं रही थी, डॉक्टर ने हमें हाथ से इशारा करके समझाया था कि अब रात-दो-रात की बात है, और मैं यह सब अकेले सह रही थी, और उसमें से कोई एक शब्द रज़िया को सुनाना मेरे लिए भी आसान नहीं था। मैंने सिर्फ़ यह कहा — तू मत आ।"
वो चुप हुईं।
और उस चुप्पी में बहुत कुछ था।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"और फिर," उन्होंने कहा, "वो चली गई। चुपचाप। कटोरी वापस लेकर। और मैं अंदर गई, हाथ धोकर माँ के पास बैठ गई, और माँ ने मेरी तरफ़ देखा। देखा, बस। कुछ नहीं कहा। पर उस दिन उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था। जैसे वो जानती हो कि मैंने अभी कहीं कोई गलती की है।"
शबनम आपा ने आँखें मलीं।
"उस रात माँ चली गई।"
कुछ देर कुछ नहीं बोला गया।
गुमटी के ऊपर पीला बल्ब झूलता रहा। कोई कुत्ता दूर कहीं भौंका और चुप हो गया।
"और उसके बाद," शबनम आपा ने धीमे से कहा, "मुझे समझ आया। उस रात, जब सब रो रहे थे, मैं खिड़की के पास खड़ी थी और मुझे लगा कि मैंने अपनी बहन को किस बात पर दूर किया था। कोई ज़मीन का झगड़ा नहीं, कोई पैसा नहीं। मैंने उसे दूर किया इसलिए कि मैं डर गई थी कि अगर वो आएगी, माँ उसे देखकर… क्या? मुझे आज भी नहीं पता। मैं सिर्फ़ डर गई थी।"
उनका हाथ उठा और छाती पर जाकर रुका।
"और फिर वो नहीं आई। पंद्रह साल। और मैं समझती रही कि मेरी बहन गुस्से में है। पर वो गुस्से में नहीं थी। वो ज़ख्मी थी। और ज़ख्म मुझे दिखते नहीं थे, क्योंकि मैंने यह सोच रखा था कि ज़ख्म देने वाला बुरा नहीं होता। और मैं नहीं थी, अंकुश। मैं… मैं तो बस बड़ी बहन थी। माँ के पास बैठने वाली। अस्पताल के काग़ज़ात उठाने वाली। सुबह चार बजे उठकर पहला चूल्हा जलाने वाली।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगीं।
"और उस दिन जो मुँह से निकल गया था, वो पत्थर बनकर सीने पर बैठ गया। पत्थर नीचे नहीं उतरा। मैं पंद्रह साल उसे इसी सीने में लेकर चलती रही। कभी सोते हुए हिलता, कभी बर्तन माँजते हुए, कभी चाय बनाते हुए — किसी की तरफ़ देखा और लगा कि वो रज़िया है, और अंदर पत्थर हिल गया। और मैंने बस उसे और दबाया। और मेरी बहन को यह नहीं पता कि मैंने यह पत्थर उठाने की कोशिश भी की थी या नहीं।"
"तो क्या आपने की थी?" मैंने पूछा।
उन्होंने मुँह पोंछा।
"एक बार," कहा। "आठ साल पहले। मैंने काग़ज़ लिया। कलम ली। मैंने लिखा — रज़िया, तू आ। मुँह से बोलने की ज़ुबान नहीं थी, तो लिखकर भेजने की बात सोची।"
"और फिर?"
"और फिर," उन्होंने कहा, "मैंने वो काग़ज़ फाड़ दिया।"
"क्यों?"
"क्योंकि मेरे अंदर एक आवाज़ ने कहा — और अगर उसने जवाब नहीं दिया? और अगर उसने मेरी चिट्ठी फेंक दी? अगर उसने कहा — अब क्या फ़ायदा, तेरी वजह से माँ नहीं मिली? ये डर काग़ज़ भेजने से ज़्यादा बड़ा था। तो मैंने काग़ज़ फाड़कर बावड़ी में फेंक दिया। देखते ही देखते तेज़ हवा में उड़ गया। और मुझे लगा — बच गई।"
वो हँसीं — वो हँसी जो रोने से पहले आती है।
"देख, अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं पूरी गली में सबसे तेज़ ज़ुबान वाली मानी जाती हूँ। कोई कुछ बोले, मेरी गुमटी से ऐसा जवाब मिलता है कि वो तीन दिन याद रखता है। महीने भर पहले दुबे अंकल ने सिर्फ़ यह कहा कि मेरी समोसे की चटनी में नमक कम है, और मैंने ऐसा जवाब दिया कि उन्होंने कसम खा ली कि अब कभी नहीं बोलेंगे। और जब अपनी बहन से पहली बात करने की बारी आई, तो मेरे हाथ काँप गए। और मैंने सोचा — डर के आगे लड़कर मर जाना, तो बेहतर है चुप रह जाना।"
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। पर मुझे लगा जैसे उसका फूल बहुत हल्का दबा।
"आपा," मैंने धीरे से कहा, "मैं आपको एक बात बताऊँ?"
"बोल।"
"मैंने दो दिन पहले उस्ताद से पूछा था कि माफ़ी कब मिलती है? और उन्होंने कहा था — माफ़ी तब नहीं मिलती जब तुम माँगते हो, माफ़ी तब मिलती है जब सामने वाला सुनता है। और सुनने के लिए दरवाज़ा खुलना चाहिए। और दरवाज़ा सिर्फ़ माफ़ी माँगने वाले से नहीं खुलता, सुनने वाले से भी खुलता है।"
"तो?"
"तो यह जोड़ है, आपा," मैंने कहा, "यह दुख का जोड़ नहीं है। यह बोलने का जोड़ है। और जब तक कोई एक भी तरफ़ से पहली बात नहीं करेगा, दोनों अपनी-अपनी चुप्पी में मरते रहेंगे। आप ही सोचिए — रज़िया आपा आज आईं। अपनी मर्ज़ी से। आठ रसीदें लेकर। कोई सोने के गहने लेकर नहीं आई, कोई शिकायत लेकर नहीं आई। सिर्फ़ काग़ज़ लेकर आई जिनसे आपका बचाव हो।"
शबनम आपा ने मुँह फेरा।
"और मेरे लिए," उन्होंने कहा, "माफ़ी माँगना ज़मीन खोदने जैसा है।"
मैं हँसा।
"तो खुदिए, आपा।"
"क्यों हँस रहा है?"
"क्योंकि ज़मीन खोदने में भी फ़ायदा है। कुछ तो निकलता है। कभी पानी, कभी कीड़े, कभी पुराना बर्तन, कभी कोई काग़ज़। खाली हाथ नहीं लौटते।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगीं।
फिर उनके मुँह से एक आवाज़ निकली जो लंबे वक़्त बाद निकली — वो घुटी हुई हँसी जो औरतें तब हँसती हैं जब कोई उन्हें बहुत बड़ी बात कह दे और वो उसे बर्दाश्त नहीं कर पातीं।
"तू भी ना," उन्होंने कहा। "इस उम्र में तुझे ये सब कौन सिखाता है?"
"कोई नहीं," मैंने कहा। "जब मेरे पास कोई नहीं होता, तो मैं खुद को सिखाता हूँ। और अब," मैं उठा, "आपको एक बात कहनी है?"
"हाँ?"
"कल सुबह नौ बजे। नहीं, नौ बजे बहुत देर है। सात बजे।"
"कहाँ?"
"अस्पताल के गेट पर।"
"क्यों?"
"क्योंकि रज़िया आपा पंद्रह साल पहले उस गेट से लौटी थीं। अब उन्हें उस गेट पर आपके साथ वापस खड़ा होना चाहिए।"
उनका चेहरा पलट गया।
"अंकुश।"
"आपा।"
"ये तो बहुत बड़ी माँग है।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "पर आपा — आधा दरवाज़ा खुल गया है। और आधा दरवाज़ा वो नहीं जो बहुत कम है। आधा दरवाज़ा वो है जिसमें आदमी फँस जाता है।"
शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा।
बस पानी में भीगा हाथ माथे पर रख लिया।
और मैंने देखा — उनका हाथ काँप रहा था।
मैंने कुर्सी खींचकर रख दी, चटाई पर पैर ठीक किया, और उनकी तरफ़ से हटकर पीपल की तरफ़ मुड़ गया।
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