The Mysterious Bell – Chapter 544
दूसरी रसीद खोली। और पुरानी। किनारों से और ज़्यादा पीली। स्याही लगभग मिट चुकी थी, बस "नूर" पढ़ा जाता था और बाकी धुँधला।
"ये दूसरी बार की है," रज़िया ने कहा। "जब उन्हें रात भर अस्पताल में रखा गया था। सुबह छह बजे मैं गई थी। पहले दिन की रसीद अलग है, दूसरे दिन की अलग।"
मैंने तीसरी निकाली।
चौथी।
पाँचवीं।
हर रसीद पर वही अस्पताल। वही मोहर, बस कभी साफ़, कभी धुँधली, कभी आधी कटी हुई।
और हर रसीद पर — एक शीशी की रकम। कभी दो। कभी गोलियों का हिसाब। कभी इंजेक्शन।
और हर बार नीचे — रज़िया।
हर बार।
मैंने पाँचवीं रसीद को हाथ में उठाया और देखा — किनारे पर एक छोटी पेंसिल से लिखी लकीर थी, जैसे किसी ने बाद में कुछ जोड़ा हो। मैंने करीब किया।
"माँ के लिए, बहन को न बताना।"
मैंने रसीद नीचे रख दी।
मेरे अंदर कुछ हिला। मैंने उसे दबा दिया, क्योंकि ये वक़्त रोने का नहीं था। ये वक़्त समझने का था।
"रज़िया," मैंने कहा। "ये सब तुमने कब से जमा किया?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर सूखी।
"पंद्रह साल से," उसने कहा। "जब भी दवा लेने जाती, रसीद जेब में डाल देती। कभी फेंकी नहीं। मुझे पता था कि एक दिन मुझे इनकी ज़रूरत पड़ेगी — किसी से लड़ने के लिए नहीं, किसी को दिखाने के लिए जिसे सच दिखाना हो।"
"किसको?"
"जिसे भी दिखाना पड़े," उसने कहा। "मैंने सोचा था, अगर एक दिन शबनम पूछे कि मैं गई क्यों नहीं, तो मैं ये रसीदें उसके सामने रख दूँगी और कहूँगी — देख, मैं गई थी। हर बार गई थी।"
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"रज़िया।"
हम सब पलटे।
शबनम आपा वहीं खड़ी थीं — गुमटी की सीढ़ी के पास, जहाँ से वो थोड़ी दूर ही थीं, पर ऐसी दूर जैसे कोई और मोहल्ले में खड़ा हो। उनका हाथ चाय के बर्तन पर था, पर बर्तन वो पकड़ नहीं रही थीं। हाथ सिर्फ़ वहाँ टिका था।
उनकी आवाज़ भारी थी। धीमी।
"ये माँ की दवाइयाँ हैं," उन्होंने कहा।
रज़िया ने सिर हिलाया।
"पर मैंने ये पैसा हर बार अपनी जेब से दिया था," शबनम आपा ने कहा। उनका हाथ बर्तन से खिसक गया। "हर बार। मैंने कहा था तुझे — मैं दे दूँगी। तू घर में रह, बच्चों को संभाल। मैं हिसाब रख लूँगी।"
"तूने दिया होगा," रज़िया ने कहा। उसकी आवाज़ टूट रही थी। "पर अस्पताल वाले ने हर बार पहले मेरा पैसा लिया।"
शबनम आपा एक कदम आगे बढ़ीं।
"क्यों?"
"क्योंकि मैं काउंटर पर खड़ी होती थी," रज़िया ने कहा। "तू घर पर होती थी। तू रोज़ सुबह पाँच बजे उठती थी और रात को देर तक जागती थी। तू इतनी थक जाती थी कि तेरे हाथ काँपते थे, फिर भी तू कहती थी — मैं ठीक हूँ। तो मैंने सोचा कि जब भी मौक़ा मिले, मैं पहले पैसे रख दूँगी। और काग़ज़ मेरे नाम पर कटते थे, ताकि तुझे पता न चले कि तेरे पैसे कम पड़ रहे हैं।"
शबनम आपा का मुँह खुला रह गया। वो कुछ कहना चाहती थीं, पर आवाज़ नहीं निकली।
"माँ के आख़िरी हफ़्ते में," रज़िया ने धीमे से कहा, "मैं रोज़ शाम आती थी। पाँच बजे। तेरे घर के सामने खड़ी हो जाती थी। देखती थी कि तेरे परदे पर तेरा साया आता है, फिर रुक जाता है। और तू दरवाज़ा बंद करके रोती थी। मुझे दूर से सुनाई देता था। तेरी आवाज़ मैं कभी नहीं भूली।"
मैंने देखा शबनम आपा का कंधा हिल गया।
"तो मैं चुपचाप लौट जाती थी," रज़िया ने कहा। "क्योंकि अगर मैं दरवाज़ा खटखटाती, तो तेरी आवाज़ रुक जाती। और तेरी आवाज़ रुकना मतलब तेरी ताक़त रुकना। और तेरी ताक़त रुकना मतलब माँ का इलाज रुकना। तो मैं चुपचाप लौट जाती थी। हर रोज़। उन पंद्रह दिनों में चौदह बार।"
शबनम आपा ने कोई जवाब नहीं दिया।
उन्होंने बस मुँह फेर लिया।
और मेरी तरफ़ देखे बिना, किसी से कुछ कहे बिना, वो गुमटी के पीछे चली गईं।
उनके जाने के बाद कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
गली में शाम की आख़िरी रोशनी खत्म हो रही थी। पीपल की छाया लंबी हो रही थी और उस्ताद अली बक्श की दुकान से आज सिलाई मशीन की आवाज़ नहीं आ रही थी।
टिंकू मेरे पास आकर खड़ा हो गया।
"उस्ताद," उसने धीमे से कहा। "ये रसीदें… ये हम कहीं रख दें?"
मैंने सोचा।
"नहीं," मैंने कहा। "यहीं रखते हैं। सबके सामने।"
मैंने उठकर उस पत्थर की चबूतरी की तरफ़ इशारा किया जो पीपल के नीचे थी — वही जहाँ बुज़ुर्ग बैठते हैं, वही जहाँ बच्चे क्रिकेट खेलते हैं, वही जहाँ बबलू पान चबाकर बैठता था और पीक के दाग छोड़ता था।
"वहाँ रखो," मैंने कहा। "एक-एक करके। सीधी लाइन में।"
टिंकू ने रसीदें उठायीं।
सानिया ने उसकी मदद की। गुड्डू ने पत्थर पर जगह साफ़ की — अपनी जेब से रूमाल निकालकर, जो मैंने उसे कभी इस्तेमाल करते नहीं देखा था। रफ़ीक़ ने चश्मा एक आँख पर से दूसरी पर खिसका लिया, जैसे पढ़ने में मदद मिलेगी। चिंटू ने रसीदों को पत्थर पर बिछाया और उनके कोनों पर छोटे पत्थर के टुकड़े रख दिए, ताकि हवा में न उड़ें।
मैंने एक-एक रसीद देखी।
आठ थीं। आठ रसीदें। पंद्रह साल की, कुछ बारह साल की, कुछ दस साल की।
हर एक पर वही अस्पताल। हर एक पर वही मोहर। हर एक पर रज़िया का हस्ताक्षर।
और हर एक पर — माँ का नाम।
सुशीला यादव।
पत्थर पर पड़ी ये रसीदें… मैं नहीं जानता कि तुमने इसे कैसे देखा होता, पर मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने पूरी गली को एक साथ साँस लेते देखा। सब खड़े थे — उस्ताद अपनी दुकान के दरवाज़े पर, शबनम आपा की सहायक गुमटी से बाहर आकर खड़ी हो गई थी, बंसी बाबा चबूतरी के कोने से उठकर पीपल के पास आ गए थे, हाफ़िज़ बाबा अपनी अत्तर की दुकान से निकलकर, हाथ में तस्बीह लिए, और भी कई चेहरे जो रोज़ आते-जाते रहते हैं पर आज एक साथ एक जगह रुक गए थे।
और उनका एक ही सवाल था — ये क्या है?
कुछ देर पहले तक, ये लोग अपने-अपने काम में थे। और अब, एक साधारण-सी शाम को, एक पत्थर पर पड़ी आठ पुरानी रसीदें पूरी गली का सबसे बड़ा सच बन गई थीं।
रज़िया भी उठकर पत्थर के पास आ गई।
वो रसीदों को देख रही थी, पर अपने हाथ पीछे बाँधे हुए थी — जैसे कोई अपनी ही चीज़ को सामने पाकर झिझक रहा हो।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तुमने ये सब रखा," मैंने कहा। "कोई काग़ज़ पुराना, कोई नया, कोई मुड़ा, कोई फटा। पर तुमने फेंका नहीं।"
"नहीं," उसने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे पता था," उसने कहा, "कि मैं इस घर से निकली थी, पर मैं अपने हिसाब से नहीं निकली थी। मुझे किसी ने निकाला था। और जिसने निकाला, वो मेरे ही घर का कोई था।"
उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा।
"और तेरे घर का भी," उसने कहा।
मेरी जेब में घंटी ने हल्की-सी आवाज़ की — बहुत हल्की, जैसे नींद में कुछ कहा हो।
मैंने इंतज़ार किया।
फिर आई।
"माफ़ी माँगने वाले के साथ सुनने वाले का दरवाज़ा भी खुलना चाहिए। वरना सच भी झूठ लगता है।"
मैंने होंठ सिकोड़कर सिर हिलाया।
"समझ गया," मैंने धीमे से कहा। "अभी नहीं।"
रज़िया ने कुछ कहना चाहा, पर तभी गुमटी के पीछे से आवाज़ आई — चीज़ों के गिरने की आवाज़। कोई बर्तन गिरा, कोई कटोरा, कुछ और।
सब पीछे मुड़े।
शबनम आपा गुमटी के पीछे से बाहर आ रही थीं — उनका दुपट्टा सिर से खिसककर कंधे पर आ गया था, उनके हाथों में चाय की केतली का ढक्कन था जिसे उन्हें पता भी नहीं था कि पकड़े हुए हैं, और उनकी आँखें।
उनकी आँखें मैंने पहले कभी ऐसी नहीं देखीं।
न लाल, न गुस्से में, न तेज़।
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