The Mysterious Bell – Chapter 543
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे हथेली पर रखकर देखा।
उस पर पीतल का रंग था, और बीच में खुदा हुआ फूल। वो फूल आज अजीब तरह से चमक रहा था — जैसे उसे पसीना आया हो।
"बोल," मैंने धीरे से कहा। "कुछ बोल।"
घंटी चुप रही।
"अच्छा," मैंने कहा। "सारा दिन चुप, और अब भी चुप। ठीक है। पर मैं तुझे बता दूँ — वो कुर्सी मैंने अपनी मर्ज़ी से रखी है। और मुझे लगता है, तेरे हिसाब में ये भी कहीं गिना जाएगा।"
घंटी ने कोई जवाब नहीं दिया।
पर उस पर वो फूल एक बार हल्का-सा गरम हुआ, और मुझे लगा कि ये उसका तरीका है कहने का — चुप रह, अंकुश। आज बोलने का दिन नहीं है। आज सुनने का दिन है।
तभी रज़िया ने अपना कप नीचे रखा।
"शबनम," उसने कहा। "मैं यहाँ सिर्फ़ बरसी के लिए नहीं आई।"
शबनम आपा ने उसकी तरफ़ देखा।
"मैं एक और बात के लिए आई हूँ," रज़िया ने कहा। "और वो बात मैं तुझसे अकेले में नहीं कह सकती, क्योंकि वो मेरी अकेली की नहीं है।"
"क्या बात?"
रज़िया ने अपनी गोद में पड़ा अपना फटा पुराना बैग उठाया।
वो बैग जर्जर था — किनारों से तार निकल रहे थे, एक तरफ़ का कपड़ा अलग हो चुका था, और पकड़ की सिलाई कई जगह से खुली थी। उसने उसे उठाकर कुर्सी पर रखा, क्योंकि उसकी गोद छोटी थी और बैग बड़ा।
और जब उसने बैग रखा, तो उसका मुँह खुला रह गया।
उसके अंदर कपड़े थे, एक स्टील का छोटा डिब्बा था, दवा के दो पत्ते थे, एक मोटा कपड़े का बंडल था।
और उन सबके नीचे, एक काग़ज़ का कोना बाहर निकला हुआ था।
मैंने उसे देखा।
कोने पर एक गोल मोहर लगी थी।
पुरानी मोहर। फीकी पड़ी, धुँधली, आधी घिसी हुई — पर गोल। और उस गोलाई के अंदर, बहुत छोटे अक्षरों में, कुछ लिखा था जो मैं दूर से नहीं पढ़ सकता था। पर मुझे उस मोहर का आकार पहचाना जैसे पहचानते हैं — घर की दीवार पर पड़ी उस दरार को जो बचपन से देखी हो।
वो मोहर नए काग़ज़ों की नहीं थी। वो पुराने काग़ज़ों की थी। उन काग़ज़ों की जिनकी स्याही अब सफ़ेद पड़ चुकी है और जिन्हें अस्पताल की दीवारों ने अपने अंदर छिपा रखा है।
मेरे हाथ में घंटी ठंडी थी।
बर्फ़ जैसी ठंडी।
क्योंकि इस बार उसे बोलने की ज़रूरत ही नहीं थी। मैं खुद समझ गया था।
मैंने अपनी नज़र उस कोने पर टिका दी और कुछ नहीं कहा।
और रज़िया ने, जैसे मेरी नज़र महसूस की, अपना बैग थोड़ा खींचकर उसका मुँह बंद कर दिया।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा। "तू शंकर यादव का बेटा है, है ना?"
"हाँ।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पुराना डर था, जो सलाहियत के साथ आता है।
"तो तेरे पास कुछ ऐसा होगा जो मेरे पास नहीं है," उसने कहा। "और जब मैं इसे खोलूँगी, तो मैं चाहती हूँ कि तू मेरे सामने बैठा हो।"
मैंने सिर हिलाया।
शबनम आपा ने हम दोनों को देखा, फिर बैग को देखा, फिर रज़िया के चेहरे को देखा।
"ये क्या है, रज़िया?" उन्होंने पूछा।
रज़िया ने बैग के ऊपर अपना हाथ रख दिया।
"ये मेरा नहीं है," उसने कहा। "ये उस आदमी का है जिसने मुझे पंद्रह साल तक दरवाज़े से लौटने की आदत डाल दी।"
और गली में शाम की आख़िरी रोशनी उसके चेहरे से खिसक गई।
मैंने अपनी जेब में घंटी दबाई और मन में कहा — ठीक है। आज तेरा दिन नहीं था।
कल होगा।
पर तब तक, मुझे ये जानना है कि रज़िया अपने बैग में क्या लेकर आई है — और वो मोहर उसी पुराने अस्पताल की है, या किसी और दरवाज़े की।
॥
मैंने जेब में घंटी दबाई और कुर्सी से उठने ही वाला था कि सानिया की आवाज़ आई।
"भैया, ये बैग हम ले जा रहे हैं।"
मैंने पलटकर देखा। चारों — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — एक-दूसरे के पीछे खड़े थे, जैसे कोई सेना परेड में खड़ी हो। सानिया के हाथ में उसकी लाल कवर वाली कॉपी थी, गुड्डू के हाथ में पेंसिल का टुकड़ा, रफ़ीक़ ने अपना एक काँच वाला चश्मा आँख पर चढ़ा रखा था, और चिंटू — चिंटू दोनों हाथ जेब में डाले, सीना फुलाकर खड़ा था, जैसे वो सबसे बड़ा जासूस हो।
"कहाँ ले जा रहे हो?" मैंने पूछा।
"दुकान के पीछे," सानिया ने कहा। "अंधेरा है वहाँ। बैग खोलेंगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि बैग में कुछ है," चिंटू ने कहा। "मैंने देखा। कोना बाहर निकला हुआ है।"
मैंने रज़िया की तरफ़ देखा। रज़िया ने अपना हाथ बैग पर रखा हुआ था, पर उसकी पकड़ ढीली थी — जैसे वो खुद जानती हो कि ये बैग अब उसके पास नहीं रह सकता।
शबनम आपा ने कुछ कहना चाहा, पर चुप रहीं।
"देखो," मैंने बच्चों से कहा। "ये बैग उस औरत का है। हम अभी इस पर हाथ नहीं लगाएँगे।"
"पर भैया—" सानिया शुरू हुई।
"सानिया।"
वो रुक गई।
"कसम याद है?" मैंने पूछा।
उसने होंठ सिकोड़े। "कुछ नहीं छूना। सिर्फ़ देखना।"
"तो?"
"पर भैया, ये तो—"
तभी रज़िया ने बैग उठाया।
"रहने दे," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी। "मैं खोल देती हूँ।"
उसने बैग को कुर्सी से उठाकर अपनी गोद में रखा, फिर उसका मुँह पूरा खोल दिया।
और मैंने देखा — पहले कपड़े, फिर स्टील का डिब्बा, फिर दवा के दो पत्ते, फिर मोटा कपड़े का बंडल।
और उन सबके नीचे।
रसीदें।
नहीं, रसीदें नहीं — रसीदों का बंडल। मोटा बंडल। इतना मोटा कि जब रज़िया ने उसे बाहर निकाला, तो वो एक बड़ी पुरानी किताब जैसा लगा, जिसके पन्ने नहीं, काग़ज़ के टुकड़े हों।
काग़ज़ के टुकड़े। पीले पड़े। किनारों से मुड़े हुए। कुछ पर धब्बे, कुछ पर तह, कुछ पर स्याही फैली हुई।
और हर एक के ऊपर — वही मोहर।
वही गोल, फीकी, पुरानी मोहर।
मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया। घंटी ठंडी थी, पर उस पर वो फूल अब फिर हल्का-सा गरम हो रहा था।
इस बार मैं उसकी आवाज़ का इंतज़ार नहीं कर रहा था।
मैं खुद देख रहा था।
रज़िया ने बंडल को अपनी गोद में रखकर उसकी सबसे ऊपर वाली रसीद खोली।
और उसी वक़्त चारों बच्चे एक साथ आगे बढ़ गए — चींटियों की तरह, एक-दूसरे के पीछे, बिना आवाज़, बिना हाथ लगाए, बस गर्दन आगे करके।
सानिया ने तुरंत अपनी लाल कवर वाली कॉपी खोली।
"क्या लिखूँ?" उसने पूछा।
"अभी कुछ नहीं," मैंने कहा।
"तो टाइटल क्या दूँ?"
"सानिया।"
"ठीक है, ठीक है।" उसने पेंसिल नीचे रख दी।
मैंने रज़िया के पास कुर्सी खींची और बैठ गया।
"दिखाओ," मैंने कहा।
रज़िया ने रसीदें एक-एक करके मेरी तरफ़ सरकाईं।
पहली रसीद — एक छोटा चौकोर पन्ना, किनारे से आधा फटा, ऊपर हाथ से लिखा हुआ। "नूर अस्पताल" — यही नाम था उसके ऊपर। नीचे तारीख़ — पंद्रह साल पुरानी, काग़ज़ पर उभरी हुई स्याही से, जैसे लिखने वाले ने कलम तीन बार डुबोई हो।
"ये माँ की पहली दवा है," रज़िया ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "जब उन्हें पहली बार अस्पताल ले जाया गया था।"
मैंने रसीद को करीब किया।
नाम — सुशीला यादव।
रकम — पूरे शब्दों में नहीं लिखी, पर एक दो अंक थे, हाथ से, टेढ़े।
दवा का नाम — "शीशी, दो। गोली, दस।"
और नीचे।
हस्ताक्षर।
वो हस्ताक्षर मेरे माँ के नहीं थे।
वो हस्ताक्षर रज़िया के थे। मैंने उसे पहचाना — जैसे पहचानते हैं जब किसी की लिखाई एक बार देख ली हो और वो दिमाग के किसी कोने में बैठ जाए।
"ये तुमने काटी?" मैंने पूछा।
"मैंने नहीं काटी," रज़िया ने कहा। "मैंने पैसे दिए। काटने वाले ने मेरा नाम डाल दिया, क्योंकि काग़ज़ मेरे हाथ में था और काउंटर पर मैं खड़ी थी।"
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