The Mysterious Bell – Chapter 538
और फिर उन्होंने एक काम किया जो उन्होंने बरसों से नहीं किया था। उन्होंने खिड़की का किवाड़ खोल दिया — पूरा, बंद करके नहीं — और बाहर आकर सीढ़ी पर बैठ गए, रिंच अब भी हाथ में।
वो बस बैठे रहे।
और मुझे लगा कि आज हमारे घर में कुछ हिला है। वो चीज़ जो बरसों से जमी हुई थी।
मैं चबूतरी से नीचे उतरा।
मेरे पीछे मीरा उतरी, फिर टिंकू, फिर चारों जासूस, अब सच में मेरे पीछे, जैसे छोटी सी टोली हो मेरे।
और मैंने चलते-चलते घंटी को जेब से बाहर निकाला, हथेली पर रखा और एक बार फिर से उससे बात करने की कोशिश की।
"सुन।"
कोई आवाज़ नहीं।
"मैंने कहा सुन।"
जेब में धागे के दो टुकड़े थे, पीतल का टुकड़ा था, वो गुनगुना गिलास था जो मैंने आँगन से उठाया था — और थी मेरी घंटी।
"तूने कहा था — दरवाज़ा दो तरफ़ का है। कौन सा दरवाज़ा? चूल्हे के पीछे वाला? या कोई और? और दो तरफ़ का मतलब क्या? अंदर और बाहर? या पुराना और नया? बोल न।"
घंटी चुप रही।
पर जैसे ही मैंने उसे वापस जेब में डालने के लिए ऊपर उठाया, उसने एक बार हल्की सी आवाज़ की — टन।
और मुझे लगा जैसे उसका मतलब है — नहीं। तूने सवाल पूछा, जवाब नहीं दिया। जब अंदर से पूछेगा, तब जवाब दूँगी।
मैंने घंटी को जेब में रखा।
मैंने मीरा से कहा, "मुझे एक बार वो अधूरी फाइल दिखानी है।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसमें सात पन्ने हैं और एक गायब है। और मुझे लगता है वो गायब पन्ना किसी दरवाज़े के बारे में है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और फिर कहा, "और तुझे क्या लगता है, वो दरवाज़ा कहाँ है?"
मैंने कहा, "मुझे नहीं पता। पर मुझे इतना पता है कि वो मेरे घर में नहीं है।"
"कैसे पता?"
"क्योंकि मैंने अपने घर का हर दरवाज़ा छुआ है। हर एक। मैंने उन्हें साफ़ किया है, उनके कुंडे बदले हैं, उनके कब्ज़े तेल से चिकने किए हैं। इन सालों में मैंने एक दरवाज़ा कभी नहीं छुआ — वो वाला, जिसे माँ ने मना किया। पर उसे मैंने आँखों से देखा है, और मुझे वो दो तरफ़ का नहीं लगा। मुझे वो सिर्फ़ बंद लगा।"
मीरा ने कहा, "तो फिर दो तरफ़ का कौन सा है?"
मैंने गली की तरफ़ देखा। दूर, पीपल के पार, स्कूल की इमारत दिख रही थी। और उसके पीछे अस्पताल की पीली दीवारें। और उसके पीछे… नहीं, उस दिशा में कुछ नहीं था। सिर्फ़ आसमान।
मैंने कहा, "वो जो दरवाज़ा है, जिसके दोनों तरफ़ लोग रहते हैं।"
मीरा ने कहा, "मतलब दो गलियों वाला दरवाज़ा?"
"या दो खानदानों वाला।"
और तभी मुझे याद आया — पापा ने रात में कहा था कि वो बूढ़ा आया था, लकड़ी के जूतों में। और घंटी ने कहा — दरवाज़ा दो तरफ़ का है।
मैंने टिंकू से कहा, "उस्ताद अली बक्श की दुकान चल।"
"अभी?"
"अभी। पूछना कि उनके भाई इलियास का घर किस गली में है।"
टिंकू दौड़ा। वो दौड़ता हुआ मुझे हमेशा एक छोटा सा पक्षी लगता है, जिसकी टाँग पर पट्टी बँधी हो पर उड़ने की जल्दी हो।
मैंने मीरा से कहा, "तू अस्पताल जा। काजल से कहना कि माँ के पास रहे और पापा को ये बताए कि मैंने आज घंटी उठाई और घंटी ने कुछ कहा।"
"क्या कहा?"
"बता देना। सब।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "वो भी जो बबलू ने कहा? बक्से के बारे में?"
"वो भी। अब छिपाने का वक़्त नहीं है।"
"अंकुश?"
"हाँ।"
"तेरी आवाज़ बदल गई है।"
मैंने कहा, "क्यों?"
"जब से तूने घंटी उठाई है। जैसे तूने कुछ तय कर लिया है।"
मैंने कुछ देर सोचा। फिर मैंने सच बोला।
"मीरा, मैं पिछले कई दिनों से टुकड़े जोड़ रहा था। घंटी, काग़ज़, पन्ने, दरवाज़े, पापा, दादा, हकीम अली, सलीम। सब टुकड़े थे। और आज घंटी ने जो तीन शब्द कहे, उनसे मुझे लगा कि मैं एक ऐसे कमरे में खड़ा हूँ जिसके सारे दरवाज़े खुले हैं और मैं सोच रहा हूँ कि दीवार नहीं है।"
मीरा हँसी।
"ये ज़्यादा फ़िल्मी हो गया," उसने कहा।
"मैं साइकिल मिस्त्री हूँ, मीरा। मेरे पास यही ज़ुबान है।"
और फिर मैंने एक आख़िरी बात कही।
"तू एक काम कर। आज शाम को रमा मैडम के नाम वो पुराना लिफ़ाफ़ा अपनी जेब में नहीं, हाथ में रख।"
मीरा एक पल चुप रही। उसका चेहरा बदल गया।
"तू इसे अब भी याद रखता है।"
"मैं सब याद रखता हूँ। मैं भूल जाता हूँ, पर याद रखता हूँ। दोनों में फ़र्क़ है।"
वो हँसी और उसने अपनी फटी बैग उठाई।
मैं अकेला बचा — अकेला नहीं, बच्चे थे पास, पर बात अंदर की थी।
मैं चलते-चलते रुक गया।
मैंने घंटी को फिर जेब से निकाला, हथेली पर लिया, और उसे अपने मुँह के पास लाया। इतना पास कि लगा जैसे घंटी मेरी साँस सुन रही हो।
मैंने फुसफुसाकर कहा, "एक बात और। दरवाज़ा दो तरफ़ का है — ये तो ठीक। पर उस दरवाज़े पर ताला किसके पास है?"
घंटी ने कोई जवाब नहीं दिया।
पर मुझे लगा कि जवाब वो दे रही है — बस देर से। बहुत देर से। जैसे ये चीज़ें जल्दी में नहीं होतीं।
मैंने घंटी को जेब में रखा।
और उसी पल, पीछे की तरफ़ से, गली के मुँह से, एक आवाज़ आई।
कोई दौड़ रहा था।
मैं मुड़ा।
टिंकू नहीं था। टिंकू दूसरी दिशा में गया था।
ये कोई और था।
और उसकी दौड़ में वो जल्दबाज़ी नहीं थी जो डर में होती है। उसमें वो जल्दी थी जो खुशखबरी लाने वाले में होती है।
मैं रुका।
और मैंने अपने आप से कहा — अंकुश, आज तेरी घंटी तुझे वापस मिल गई है। पर उसकी आवाज़ दूर से आ रही है। और जो आवाज़ दूर से आती है, उसका मतलब ये नहीं होता कि वो कमज़ोर है। इसका मतलब ये होता है कि वो कहीं और से आ रही है।
कहीं और से।
और मुझे वो कहीं ढूँढना है।
दौड़ता हुआ आदमी पास आया।
पर वो जो लाया, वो मैंने सोचा भी नहीं था।
उसने साँस अटकाकर कहा, "भैया… तुम्हारे घर के पीछे वाला दरवाज़ा… वो खुला है।"
मैंने कहा, "क्या मतलब खुला है?"
"खुला है। अंदर से। और अंदर से एक फीकी पीली रोशनी आ रही है।"
मेरे हाथ में घंटी थी, और उस घंटी ने उस वक़्त एक भी शब्द नहीं कहा।
बस हल्की सी बजी।
और उस बजने में एक बात थी जो मैं समझ गया — अब सवाल मत पूछ। चल।
वो दरवाज़ा दो तरफ़ का है। और आज उसका दूसरा तरफ़ मेरी तरफ़ खुल गया है।
॥
मैं दौड़कर गया, और मेरे पीछे मीरा, और उसके पीछे बच्चे।
घर के पीछे वाला दरवाज़ा सच में खुला था। अंदर से आती पीली रोशनी बाहर आँगन की मिट्टी पर पड़ रही थी, और वो रोशनी काँप रही थी, जैसे कोई चीज़ जल्दी में जलाई गई हो और अब बुझने की जल्दी में हो।
मैं दरवाज़े पर रुका।
तुम सोच रहे होगे कि ऐसे वक़्त में आदमी अंदर घुसता है। नहीं। ऐसे वक़्त में आदमी पहले एक पल रुकता है, साँस सुनता है, और अपने ही घर में चोर की तरह खड़ा हो जाता है।
मैंने भीतर झाँका।
अंदर कोई नहीं था।
फर्श पर एक पुराना पीतल का दीया जल रहा था, जिसमें तेल आधा बचा था और बत्ती का सिरा अभी लाल था। दीये के पास मिट्टी का एक छोटा सा सूखा टुकड़ा पड़ा था, जो जूते के तले से आया था।
और दीये के पीछे, दीवार के सहारे, वो रास्ता था जो मैंने बचपन में कभी देखा था और भूल गया था।
हमारे घर की पिछली दीवार के साथ एक पतला भीतरी रास्ता ऊपर आती के दरवाज़े तक जाता है, और उसी रास्ते की दूसरी तरफ़, सीढ़ी के नीचे, एक और छोटा दरवाज़ा है — जो सीधे पीछे की सूखी नाली में खुलता है।
मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकी।
ये वही दरवाज़ा था। दो तरफ़ का दरवाज़ा। एक तरफ़ घर, दूसरी तरफ़ गली के पीछे की वो सूखी नाली, जिससे होकर कोई गली में घुस भी सकता है और बिना किसी को दिखे निकल भी सकता है।
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