The Mysterious Bell – Chapter 537
किसी दूसरी जगह पर।
"उस्ताद!" टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ी। "उस्ताद, तुम ठीक हो?"
मैंने आँखें खोलीं। दोपहर की धूप चबूतरी पर आ गई थी। पीपल का साया जगह बदल रहा था। और मेरी हथेली में मेरी घंटी थी।
"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा। "बस… एक सवाल और पैदा हो गया।"
मीरा ने कहा, "घंटी ने क्या कहा?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मैंने देखा उसके हाथ में कैमरा था, पर वो नीचा था। उसने रिकॉर्ड नहीं किया था। उसने मुझे सुनने के लिए, मेरे साथ होने के लिए रुका था। मैंने सोचा — इससे अच्छा कोई नहीं, जो कैमरा उठाया हुआ हो और फिर भी नीचा रख दे।
मैंने कहा, "घंटी ने कहा, दरवाज़ा दो तरफ़ का है।"
मीरा का चेहरा सख़्त हो गया।
"मतलब?"
"मतलब ये कि वो दरवाज़ा जिसे माँ ने पिछली रात खोलने से मना किया… वो सिर्फ़ हमारे घर का दरवाज़ा नहीं है।"
हम सब चबूतरी पर बैठ गए। मैं, मीरा, टिंकू और चारों जासूस। सानिया मेरे बाजू में बैठी और उसने अपनी लाल कवर वाली कॉपी निकाली। "बोलो उस्ताद," उसने कहा, "मैं लिखती हूँ। मेरी कॉपी में सब तारीख़ के साथ रहता है।"
मैंने बच्चों की तरफ़ देखा।
"तुम लोग घर जाओ।"
"नहीं," सानिया ने कहा।
"सानिया—"
"उस्ताद, आप नहीं जानते, लेकिन कल मंच के पीछे मैंने वो घंटी इसकी जेब से गिरते देखी थी। और मैंने किसी को नहीं बताया था, क्योंकि सबको लगता है हम बच्चे हैं और हमें सिर्फ़ पतंग और टॉफ़ी समझ आती है। पर आज आपने खुद हमसे पूछा। इसलिए अब मैं जाने वाली नहीं।"
चिंटू ने कहा, "मैं भी नहीं जाऊँगा।"
गुड्डू ने कहा, "मैं तो आज सुबह से यहीं था।"
रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा फिर सीधा किया और कहा, "मैं चश्मे के बिना हूँ, इसे ठीक कराना है। पर बाद में।"
और मैं हँस पड़ा। सच में हँसा, पहली बार आज हल्का महसूस हुआ। चारों बच्चे मेरे बगल में बैठे थे, जैसे चार गार्ड। बिना तनख्वाह के गार्ड।
मैंने कहा, "ठीक है। पर एक शर्त है। जो मैं अब बताऊँगा, वो तुम लोग किसी को नहीं बताओगे। एक भी आदमी को नहीं।"
सानिया ने अपना हाथ आगे किया। "कसम।"
चारों ने हाथ रखे। मैंने भी रखा। और फिर मैंने वो सारी बात कही जो पिछले कुछ दिनों में टुकड़ों में जुड़ी थी।
मैंने कहा, "पिछली रात एक बूढ़ा हमारे घर आया था। लकड़ी के जूतों में। उसने खुद को रजिस्ट्री का आदमी बताया। उसने पापा से कहा कि सच अब इकट्ठा होने लगा है। और उसने ये भी कहा कि दरवाज़ा…" मैंने घंटी को हथेली में हिलाया, "…दरवाज़ा उसके हाथ में है।"
टिंकू ने कहा, "मतलब वो बूढ़ा ही वो है जो घंटी रखता है?"
"या वो उसका पहरेदार है," मीरा ने कहा।
"या वो उसका पहला मालिक है," मैंने कहा।
सब चुप हो गए।
मैंने कहा, "जब मैंने बबलू से बक्से के बारे में पूछा, तो उसका रंग उतर गया। ये सिर्फ़ घंटी का डर नहीं था। ये किसी और चीज़ का डर था। जो उसने देखा और जिसे वो अपने पूरे जीवन में भूलना चाहता है।"
मीरा ने कहा, "बक्सा।"
"हाँ।"
"वही नीले कपड़े वाला बक्सा। जिसे साहब के दफ़्तार में कोई नहीं छूता।"
"वही।"
मीरा ने अपनी फटी बैग से एक काग़ज़ निकाला। "मैंने इस पर तीन दिन लिखा है। तीन दिन में कोई तीन बातें साफ़ हो गईं। पहली — घंटी वाकई हमारी है। दूसरी — साहब घंटी को हमारे हाथ से छीनकर फेंकना चाहता था। और तीसरी — साहब के कमरे में जो बक्सा है, वो उसके पास सबसे पुरानी चीज़ है। बबलू इससे डरता है।"
मैंने कहा, "तो अब एक बात साफ़ है। साहब ने घंटी इसलिए नहीं चुराई कि वो चीज़ उसे दुश्मन की लगी। उसने इसलिए चुराई कि वो जानता है ये क्या है।"
टिंकू का मुँह खुला रह गया। "मतलब उसने घंटी को पहचान लिया था?"
"वो पहले से जानता था," मीरा ने कहा। "और उसने सीधा नहीं किया। उसने घूमकर किया। उसने बबलू को इस्तेमाल किया। क्यों? क्योंकि साहब खुद घंटी को हाथ नहीं लगाना चाहता था।"
ये बात मेरे अंदर एक ठंडी सुई जैसी चुभी।
साहब खुद नहीं छूना चाहता था।
जैसे किसी को छूने में डर हो।
मैंने घंटी को उठाया और उसे धूप में देखा। पीतल पर रोशनी पड़ रही थी और वो पीला-सुनहरा हो रहा था। मुझे पहली बार लगा कि ये चीज़ जितनी साधारण दिखती है, उतनी है नहीं।
सानिया ने अचानक कहा, "उस्ताद, वो जो बबलू ने कहा — साहब ने घंटी दी और कहा बड़े तालाब में फेंक आना। अगर वो इसे फेंक देता तो?"
मैंने कहा, "तो घंटी पानी में चली जाती।"
"फिर?"
"फिर मैं उसे कभी नहीं ढूँढ पाता।"
"फिर?"
मैं कुछ नहीं बोला। पर मुझे सब पता था। अगर घंटी पानी में जाती, तो मोहल्ले का वो धागा जो घंटी से जुड़ा था, कहीं न कहीं से टूट जाता। और जिस दिन वो धागा टूटता, उस दिन मैं सिर्फ़ एक साइकिल मरम्मत करने वाला लड़का बनकर रह जाता।
और घंटी — एक पुरानी बेज़ान घंटी।
मैंने दो बार गहरी साँस ली।
फिर मैंने कहा, "मीरा, तुझे याद है, रणवीर ने उस दिन दुकान पर आकर क्या कहा था?"
"बहुत कुछ कहा था।"
"उसने कहा था — जो अधूरी चीज़ें हैं, वो वापस कर देनी चाहिए।"
"हाँ।"
"उसने घंटी नहीं लौटाई। उसने धागे लौटाए। दो धागे। खाली।"
मीरा की आँखें एक पल को बंद हुईं और फिर खुलीं। "वो हमें बता रहा था कि अधूरी चीज़ों की सूची में घंटी भी है।"
"हाँ।"
"और वो हमें ये भी बता रहा था कि वो जानता है कि घंटी अधूरी है।"
"हाँ।"
मैंने घंटी को उठाया और उंगलियों में घुमाया।
और तभी मुझे कुछ दिखा।
घंटी के अंदर के धातु पर, एक जगह, एक छोटी सी खुरच थी। जिस तरह की खुरच पीतल पर बहुत पुराने औज़ार से बनती है। रजिस्ट्री दफ़्तार में जिस काग़ज़ पर तीन समानांतर सुई-लकीरें मिली थीं — नहीं, ये वैसी नहीं थी। ये दो लकीरें थीं, एक-दूसरे के ऊपर।
मुझे वो पीतल का चौकोर लॉकेट याद आया जो बबलू की चेन में लटकता था और हिलने पर टिक-टिक करता था।
बबलू की चेन वहाँ नहीं थी।
कहाँ गई?
उसने सब उतार दिया था।
मैंने जेब से वो गरम पीतल का टुकड़ा निकाला। वो अब ठंडा था। मैंने उसे घंटी के पास लाया।
और मुझे लगा, जैसे हवा में कोई हल्की सी सरसराहट हुई।
फिर चुप।
टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद।"
"हाँ।"
"तुम्हारा हाथ काँप रहा है।"
मैंने हाथ देखा। सच में काँप रहा था।
मैंने कहा, "ठंड है।"
"धूप में?"
"अंदर की ठंड," मैंने कहा और मुस्कुराया।
और फिर मैंने चारों बच्चों की तरफ़ देखा और एक बात कही जो मुझे कहनी ही थी।
"आज से तुम लोग कुछ भी नहीं ढूँढोगे। तुम सिर्फ़ देखोगे। जो देखो, सानिया की लाल कवर वाली कॉपी में लिखोगे। कोई भी किसी भी चीज़ को अकेले नहीं छुएगा। समझे?"
"समझे," चारों ने एक साथ कहा।
"और घंटी? इस घंटी को कभी मेरे पास से दूर नहीं जाने देना। अगर मैं भूल जाऊँ, तुम याद दिलाओ। और अगर मैं किसी को दे दूँ…" मैंने एक पल रुककर कहा, "…तो सीधा मेरी हथेली पर आकर मारना।"
सानिया ने कहा, "पर उस्ताद, मैं तुम्हें मार नहीं सकती।"
"मारने की ज़रूरत नहीं। बस मेरे हाथ पर झटका देना। जैसे ये आदमी मेरे हाथ में है, है नहीं, ऐसा कहना।"
वो हँसी। और उसके हँसने से मुझे लगा कि आज का दिन पूरी तरह बेकार नहीं गया।
मैं उठा।
मैंने घंटी को अपनी जेब में रखा — अब खाली धागे में नहीं, अपनी कमीज़ की जेब में, बटन बंद करके, हाथ ऊपर से दबाकर। फिर मैंने आँगन की तरफ़ देखा। गली की तरफ़।
पापा अब भी खिड़की के पास खड़े थे।
उन्होंने सब देखा था।
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