The Mysterious Bell – Chapter 536
"पर तुमने फेंकी नहीं," मैंने कहा।
"नहीं फेंकी।"
"क्यों?"
उसने अपना सूखा होंठ ज़ुबान से गीला किया। "क्योंकि जब मैंने इसे हाथ में लिया, ये गरम थी। ठंडी नहीं थी। सुबह चार बजे, पानी में फेंकने जा रहा था, उस वक़्त भी गरम थी। मुझे लगा… मुझे लगा अगर मैंने इसे पानी में फेंका, तो ये मेरा पीछा करेगी।"
उसने एक गहरी साँस ली।
"तो मैंने जेब में रख ली। और रात को…" उसकी आवाज़ रुक गई।
"रात को क्या हुआ?"
"रात को मेरे कमरे में बजी।"
कुछ देर किसी ने कुछ नहीं कहा। पीपल के पत्ते भी रुक गए थे, ऐसा लगा।
"मैं सो रहा था। घर में सब सो रहे थे। अचानक एक आवाज़ आई — टन। छोटी। एक बार। मैं उठकर बैठ गया। अंधेरा था। मैंने सोचा सपना होगा। फिर दूसरी बार आई। टन। मैंने बत्ती जलाई। मेरी जेब में, कमीज़ की जेब में, ये घंटी रखी थी। मैंने जेब टटोली। घंटी वहीं थी। पर बजी थी। मेरे कपड़े पर रखी घंटी अपने आप बजी थी।"
"और फिर?" मैंने पूछा।
"फिर मैंने उसे अलमारी में रख दिया। ताले में बंद कर दिया। चाबी तकिये के नीचे रख दी। और सुबह तक — सुबह तक वो तीन बार बजी।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तीन बार। मेरी अलमारी के अंदर से। ताले के अंदर से। मैं चादर ओढ़कर बैठा रहा और सुनता रहा। मैं मरद हूँ, मैं किसी से नहीं डरता, ये मैं खुद को सौ बार बोलता रहा। पर उस रात मुझे समझ आ गया कि मैं आदमियों से नहीं डरता, मैं बस उन चीज़ों से नहीं डरता जिन्हें मैं देख सकता हूँ।"
उसने अपना बँधा हुआ हाथ उठाया।
"और आज सुबह से ये मेरे हाथ में जलती है। रखता हूँ, जलता है। जेब में रखता हूँ, जेब जलती है। ये चीज़ मेरे पास नहीं रहना चाहती। और सच कहूँ तो मैं भी इसे अपने पास नहीं रखना चाहता।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वो झूठ नहीं बोल रहा था। इतना झूठ कोई नहीं बोल सकता — जो झूठ बोलता है, वो आँख में एक दीवार खड़ी कर लेता है। बबलू की आँख में दीवार नहीं थी। उसकी आँख में सिर्फ़ एक आदमी बैठा था जो दो रात से सोया नहीं।
मैंने घंटी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया। फिर रोक लिया।
मैंने पूछा, "एक बात बताओ बबलू भाई।"
"पूछ।"
"साहब के दफ़्तर में एक बक्सा है। नीले कपड़े से ढका हुआ। कोने में रखा है। उस पर धूल है। कोई उसे छूता नहीं। तुमने उसे देखा है?"
और फिर जो हुआ, वो मैं भूल नहीं सकता।
बबलू का चेहरा बदला। नहीं, चेहरा नहीं बदला। उसका रंग उतर गया। जैसे किसी ने उसके चेहरे पर से एक परत खींच ली हो। उसके होंठ खुले रह गए। उसकी आँखें एक पल के लिए उस जगह से हट गईं जहाँ मैं खड़ा था और कहीं और चली गईं — कहीं बहुत दूर, कहीं अंधेरे में।
और फिर उसने एक कदम और पीछे हटकर कहा, "मैंने कुछ नहीं देखा।"
"मैंने पूछा तो सही कि—"
"मैंने कहा मैंने कुछ नहीं देखा!" उसकी आवाज़ पहली बार उस दिन ऊँची हुई, और उस ऊँची आवाज़ में गुस्सा नहीं था। डर था। "तुम सुनते नहीं हो क्या? मुझे मत घसीटो। मैं इस घंटी के चक्कर में आ गया, बस इतना। मैं साहब का आदमी हूँ, पर मैं साहब का खून नहीं पीने वाला। मुझे उस कमरे में मत धकेलो। मैंने वहाँ जो देखा नहीं, जो सुना नहीं, वो मैं अब याद भी नहीं करना चाहता।"
"उस कमरे में क्या—"
"मत पूछो!" उसने लगभग चीख़कर कहा। फिर वो अचानक चुप हो गया, जैसे उसे एहसास हुआ कि वो ज़्यादा बोल गया। उसने अपना बँधा हुआ हाथ सीने से लगाया, दो बार गहरी साँस ली, और फिर बिना कुछ कहे, बिना पीछे देखे, चल पड़ा।
वो चबूतरी से नीचे उतरा, गली के उस पार गया, और सीधा अपने स्कूटर की तरफ़ बढ़ा।
और तभी मुझे एक और चीज़ दिखी।
वो लाठी वाला आदमी वहाँ नहीं था। वो काला बैग वाला आदमी वहाँ नहीं था। और गली के मुँह पर जो सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी — वो भी नहीं थी।
जैसे बबलू अकेला आया था। जैसे उसने अपने सब आदमी भगा दिए थे।
मैंने उसका पीछा नहीं किया। मैंने उस रूमाल वाले हाथ को देखा। मैंने उसके झुके कंधों को देखा। मैंने उस आदमी को देखा जो मोटा था, ताक़तवर था, और आज सुबह पहली बार उसकी चाल में बूढ़ापन था।
मीरा ने धीरे से कहा, "तूने उसे बोलने दिया।"
"हाँ।"
"तूने उसे पकड़ा नहीं।"
"नहीं।"
"क्यों?"
मैंने कहा, "क्योंकि मैंने उसकी आँख देखी। जो आदमी डर जाता है, वो आगे किसी का नुकसान नहीं करने वाला माँगता। वो बस बाहर निकलने का रास्ता माँगता है। अगर मैंने उसे वहीं पकड़ा होता, तो वो उल्टा मुझे फँसाता।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसके चेहरे पर कुछ था जो मुझे पसंद आया — थोड़ा सा रहम, थोड़ा सा ताज्जुब, और बहुत सारा भरोसा।
मैंने आगे बढ़कर घंटी उठाई।
और जैसे ही मेरी हथेली पर आई, वो बजी।
पर उस आवाज़ में कुछ अलग था।
वो पहले जैसी नहीं थी।
पहले जब ये बजती थी, आवाज़ मेरे कान के बिल्कुल अंदर होती थी, जैसे किसी ने मेरी खोपड़ी के अंदर एक छोटी पीतल की सीट रख दी हो और वहीं से बोल रहा हो। साफ़। चमकीली। सीधी।
आज आवाज़ दूर से आ रही थी।
जैसे किसी ने घंटी बजाई हो बहुत दूर, किसी दूसरी गली में, किसी दूसरे मोहल्ले में, किसी दूसरे शहर में — और वो आवाज़ हवा में तैरकर, रास्ते में हल्की पड़कर, मेरे पास पहुँची हो।
टिंकू ने कहा, "उस्ताद, आवाज़…"
"हाँ," मैंने कहा।
"आवाज़ दबी हुई है।"
"हाँ।"
"ऐसा क्यों?"
मैंने घंटी को अपनी हथेली में घुमाया। धूल साफ़ की। पीतल चमक रहा था, पर कुछ था जो पहले नहीं था — घंटी के अंदर का हिस्सा, जहाँ जीभ लटकती है, वो धूप में देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे बहुत दूर जाकर वापस आया हो। जैसे इसने रास्ता काटा हो। जितना रास्ता मंच से चबूतरी तक नहीं होता।
मैंने घंटी को अपने कान के पास लाया।
मीरा ने कहा, "अंकुश, यहाँ सब देख रहे हैं।"
मैंने कहा, "जाने दो। आज ये भी देख लें।"
और तब घंटी ने मुझसे बात की।
पर उसकी आवाज़ वो आवाज़ नहीं थी जो मुझे पता थी। वो रूखी थी, थकी हुई थी, जैसे कोई दूर से चिल्ला रहा हो और बीच में हवा उसकी आवाज़ खा जाती हो।
उसने कहा, "दरवाज़ा दो तरफ़ का है।"
बस।
तीन शब्द।
फिर चुप।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
मेरे हाथ में घंटी थी। मेरे जेब में गरम पीतल का टुकड़ा अब बिल्कुल ठंडा था, बर्फ़ जैसा ठंडा। मेरे पीछे टिंकू कुछ पूछ रहा था, सानिया कुछ कह रही थी, गुड्डू कह रहा था कि उस्ताद का चेहरा क्यों ऐसा है। पर मुझे सब दूर की आवाज़ें लग रही थीं, जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो।
दरवाज़ा दो तरफ़ का है।
मैंने आँखें बंद की और अपने घर को याद किया।
वो पुराना बंद दरवाज़ा, चूल्हे के पीछे। तीन बार पेंट चढ़ा हुआ। ज़ंग लगा कुंडा। माँ ने कहा था आज रात उसे मत खोलना। उस्ताद ने कहा था वो दरवाज़ा तेरे घर का सबसे पुराना दरवाज़ा है। रजिस्ट्री का बूढ़ा कह गया था कि घंटी उसी के पास है जो उस दरवाज़े को जानता है।
और अब घंटी कह रही थी — दरवाज़ा दो तरफ़ का है।
दो तरफ़ का।
मतलब?
मतलब ये कि वो दरवाज़ा सिर्फ़ बंद दीवार नहीं है। वो अंदर भी जाता है और बाहर भी। जो दरवाज़ा दो तरफ़ का होता है, वो एक साथ दो जगहों से जुड़ा होता है। उसका एक हिस्सा घर में है और एक हिस्सा बाहर। अगर मैंने उसे खोला और सोचा कि मैं घर से बाहर जा रहा हूँ, तो हो सकता है मैं असल में बाहर से अंदर जा रहा हूँ।
मतलब वो दरवाज़ा किसी दूसरी जगह पर खुलता है।
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