The Mysterious Bell – Chapter 518
"किसकी?"
वो वहीं मुझे देखने लगा। "उसकी भी।"
मैं वहीं रह गया।
और मुझे समझ आया कि बच्चा क्या कह रहा था। वो कह रहा था — तुमने रणवीर से भी कहा, अपनी पुरानी याद लाओ। तुमने उससे भी कहा।
और यह वाकई बहुत बड़ी बात थी, क्योंकि मैंने उससे कहते वक़्त सोचा भी नहीं था। मैं तो सिर्फ़ उसे फँसाने के लिए कहा था, भीड़ के सामने, ताकि वो ना कह सके।
पर अब सोचने पर मुझे लगा — क्या पता यही उसका सबसे बड़ा जाल था। कि उसके पास अस्पताल से जुड़ी कोई याद नहीं है।
क्योंकि जिस आदमी ने अस्पताल को मिटाने का फ़ैसला किया हो, उसने अपनी सारी यादें पहले ही मिटा दी होंगी।
या फिर… वो अगले रविवार कुछ लेकर आएगा।
और अगर वो लेकर आया, तो वो चीज़ क्या होगी?
और अगर नहीं आया, तो पूरी गली देखेगी कि रणवीर भारद्वाज के पास अपने ही शहर के अस्पताल से जुड़ी एक याद भी नहीं है — तो वो किसका भला होने का दावा करते हैं?
यही। यही चीज़ मैं चाहता था। पर वो सिर्फ़ तभी काम करेगी जब सभा हो। और सभा हो कल और अगले रविवार — दोनों।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"उठ," मैंने कहा। "कुछ काम है।"
"अभी? रात में?"
"रात में ही।" मैं उठा। "क्योंकि जो लोग दिन में ढूँढने आते हैं, वो रात में नहीं मिलते।"
…
हम गली के पीछे वाली गली में गए — वहाँ जहाँ उस्ताद अली बक्श की दुकान है। उस वक़्त दुकान बंद थी, पर उसकी खिड़की से पीली रोशनी आ रही थी।
मैंने खिड़की पर दो दस्तकें दीं।
दरवाज़ा खुला। उस्ताद चिराग़ लिए खड़े थे — कोई और चिराग़, बिजली वाला, न जाने किस ज़माने का — जिससे उनका चेहरा दो हिस्सों में बँटा दिख रहा था, आधा पीला और आधा अंधेरा।
"आ जाओ," उन्होंने कहा, जैसे मुझे इंतज़ार ही था।
हम अंदर गए। उन्होंने चिराग़ मेज़ पर रखा और अपनी कुर्सी खींचकर बैठे। सिलाई मशीन चुप थी। सारी दुकान चुप थी।
"बोलो," उन्होंने कहा।
मैंने कहा, "घंटी गई।"
उनका चेहरा नहीं बदला। वो बस मुझे देखते रहे, जैसे इस उत्तर की प्रतीक्षा में पहले से बैठे थे।
"कैसे?"
"गले लगाते वक़्त निकाल ली।"
उन्होंने सिर हिलाया।
"और तुमने?"
"कुछ नहीं किया।"
"अच्छा किया।"
यह सुनकर मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे भीतर की एक डोरी ढीली कर दी हो।
"अच्छा किया?" मैंने कहा।
"अच्छा किया," उन्होंने दोहराया। "अगर तुमने वहीं शोर मचाया होता, तो क्या होता, बताऊँ? तुम्हारे हाथ पकड़े जाते, दो आदमी तुम्हें पीछे खींच ले जाते, भीड़ कहती यह लड़का पागल है, और अगली सुबह तुम्हें सिर्फ़ एक चीज़ के लिए जाना जाता — हंगामे के लिए। तुम्हारी बात किसी को याद नहीं रहती। पागल की बात लोग भूल जाते हैं। वो सिर्फ़ उसका चेहरा याद रखते हैं।"
उन्होंने चिराग़ की लौ की तरफ़ देखा।
"अब सुनो।" उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "घंटी चली गई, यह बात ठीक है। पर एक बात जो तुम्हें आज समझनी है — घंटी कभी ताक़त नहीं थी। ताक़त तुम्हारे कान में थी। और कान में है। बस आवाज़ नहीं आ रही। पूछो — आवाज़ क्यों नहीं आ रही?"
मैंने पूछा, "आवाज़ क्यों नहीं आ रही?"
"क्योंकि घंटी दूर है। और घंटी जब दूर होती है, वो सिर्फ़ तब बोलती है जब हवा उसकी तरफ़ हो।" उन्होंने अपनी उँगली उठाई। "अभी हवा तुम्हारी तरफ़ नहीं है।"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।
"उस्ताद," मैंने कहा। "कल सभा में…"
"हाँ।"
"मैं चाहता हूँ कि कल कोई भी अकेला न बोले। जो बोले, वो पहले किसी और का हाथ पकड़े।"
वो मुझे देखने लगे।
फिर उन्होंने धीरे से सिर हिलाया।
"यह तुमने अच्छी बात कही," उन्होंने कहा। "यह बात पचास साल में किसी ने नहीं कही।"
…
रात दस बजे मैं घर पहुँचा।
दरवाज़े पर माँ बैसाखी के सहारे खड़ी थीं। उनके सिर पर दुपट्टा था और हाथ में छोटा सा दीया, जो हवा से बुझने को था।
"भूख लगी होगी," उन्होंने कहा।
"हाँ।"
"पर पहले बैठ।"
मैं बैठ गया। आँगन में चटाई बिछी थी। माँ ने पास आकर मेरा सिर देखा — कुछ नहीं बोलीं, बस देखा, जैसे किसी औज़ार को देखा जाता है कि टूटा है या नहीं — और फिर उन्होंने मेरे आगे थाली रख दी।
रोटी, दाल, और एक कटोरी में दही। मैंने खाना शुरू किया।
माँ बैसाखी टिकाकर मेरे सामने बैठ गईं। कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, "काजल बता रही थी कि सारे काग़ज़ एक जगह हो रहे हैं।"
मैंने सिर हिलाया।
"तो सुन," उन्होंने कहा। "मैं तुमसे कुछ नहीं पूछूँगी कि आज मंच पर क्या हुआ। मैंने सुना है पर मैं नहीं पूछूँगी, क्योंकि तुम बताना चाहोगे तो खुद बता दोगे। पर एक बात कहूँगी।"
मैंने रोटी नीचे रखी।
"अब तक हम चीज़ें छिपाते आए — तुम, मैं, तुम्हारे पापा, हम सब। इसी छिपाने में हमारा घर बनता रहा और टूटता रहा। अब जब कल वो सभा हो, तो एक बात ध्यान रखना।" उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "किसी की बात जो तुम्हें झूठी लगे, उस पर ताली मत बजाना। क्योंकि ताली बजाने वाले बहुत होते हैं। खड़े होने वाले कम।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
और मैंने कहा, "माँ।"
"हाँ।"
"आज मैंने किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगाया। कुछ लोगों को अच्छा लगा। कुछ को नहीं। पर मुझे लगा कि अगर मैं बोलता तो वो मुझे उस चीज़ से फँसा देता जो मेरे पास नहीं थी।"
माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा और फिर उन्होंने मेरी थाली की तरफ़ देखा और कहा, "रोटी ठंडी हो रही है।"
मैंने रोटी उठाई।
और फिर माँ ने कुछ ऐसा कहा जो मुझे नींव की तरह लगा।
"आज तुमने एक चीज़ नहीं की," उन्होंने कहा। "तुमने उसे यह नहीं बताया कि उसने तुम्हारी क्या चीज़ ली है। और इसका मतलब है — उसके पास तुम्हारी घंटी है, पर तुम्हारी बेचैनी नहीं। वो उसे लेकर बैठा है और सोच रहा है कि तुम कब पागल होकर आओगे। और जब तुम नहीं आए, तो वो खुद सो नहीं पाएगा।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तू ठीक कर रहा है," उन्होंने कहा, और मेरी थाली में दूसरी रोटी रख दी।
…
उस रात बारह बजे, जब सारी गली सो रही थी, मैंने दुकान का पिछला कमरा खोला।
चारपाई थी। औज़ारों का ट्रंक था। गुनगुनाता पुराना बल्ब था।
मैंने अपनी जेब से वो धागा निकाला और उसे अपनी हथेली पर रखा।
दो खुली गाँठें। और बीच में खाली घेरा।
मैंने उसे अपनी उँगली पर लपेटा। कसा।
और फिर मैंने वो किया जो किसी दुकानदार ने कभी नहीं किया होगा।
मैंने खाली हथेली अपने कान के पास ले जाकर धीरे से कहा, "सुन रही है?"
कुछ नहीं।
मैं हँसा। खुद पर। बैठे-बैठे।
और फिर मैंने दीवार पर टँगे पुराने कैलेंडर की तरफ़ देखा — उसमें अगले रविवार पर एक लाल गोला बना था, जो मैंने ही किसी और काम को याद रखने के लिए बनाया था। मैंने उस पर पेंसिल से दो शब्द लिखे।
"यादें — सभी।"
और फिर मैं चारपाई पर लेटा।
बल्ब गुनगुनाता रहा।
और मुझे ऐसा लगा जैसे कमरे के बाहर, गली के मुँह पर, बहुत दूर, कोई बहुत हल्की घंटी बजी हो।
एक बार।
सिर्फ़ एक बार।
मैं उठकर बैठ गया और सुनने लगा। मेरा सारा शरीर सुनने लगा — हाथ, पैर, गर्दन, आँखें।
कुछ नहीं।
सिर्फ़ बल्ब की गुनगुनाहट।
पर उस एक पल में मैंने खुद को एक बात कहते पकड़ा, बहुत धीरे, बिना आवाज़ —
"आ गई ना।"
और अगले पल मेरी आँखें भर आईं। क्योंकि आवाज़ नहीं थी, पर उस एक पल में मैंने वो सब कुछ याद कर लिया जो उस घंटी के साथ जुड़ा था — दादा की साइकिल, मेला, कबाड़ी बूढ़ा, पहली बार कान में बोली वो आवाज़, शबनम आपा की चिमटी, गिरधारी और मोहन के हाथ, परदे के पीछे से आती बंसी बाबा की खाँसी। सब।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno