The Mysterious Bell – Chapter 519
मैंने अपनी आँखें पोंछीं।
और मैंने खुद से कहा — अंकुश यादव, कल तुझे सभा करनी है। और सभा में तुझे वो सब बोलना है जो तेरे पास है। और तेरे पास होश है। तेरे पास दुकान है। तेरे पास मोहल्ला है।
तेरे पास घंटी नहीं है।
पर तेरे पास एक चीज़ है जो उसके पास नहीं है — तेरे पास सवाल है। और उसके पास सिर्फ़ जवाब हैं।
…
सुबह छह बजे पीपल के नीचे पहले उस्ताद आए।
फिर शबनम आपा, अपनी लोहे की चिमटी जेब में डालकर, जैसे किसी जंग की तैयारी हो।
फिर भोला भाई अपनी लंबी पटिया उठाकर लाए और पत्थर के पुल पर रख दी।
फिर बूढ़ा काका, किराने वाला, जिसकी आँखें कमज़ोर थीं और जो अपना पीला काग़ज़ बोरी के नीचे से निकालकर लाए थे, जो उन्होंने चौदह साल से जलाया नहीं था, सिर्फ़ दबाया था।
और फिर वो बुज़ुर्ग आने लगे — बंसी बाबा, हाफ़िज़ बाबा, इब्राहीम चाचा, बृजमोहन बाबा, क़ादिर साहब, बद्रीप्रसाद — जिन्होंने पिछले हफ़्तों में एक-एक करके अपनी पुरानी चुप्पियाँ तोड़ी थीं। वो चबूतरी पर बैठे, वैसे ही जैसे अपनी जगह पर बैठते हैं। कोई किसी से कुछ नहीं बोला। पर उनका बैठना ही एक बात थी।
आठ बजे मीरा आई। उसके पीछे दो लड़के थे जिन्होंने कैमरा तिपाई पर लगाया। एक लड़की एक छोटा माइक लेकर आई और उसे पीपल की डाल पर बाँधने लगी।
नौ बजे टिंकू आया — चश्मा लगाए, लाल कॉपी लिए, और उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू।
सानिया ने एक पीली काग़ज़ की गड्डी उठाई और कहा, "मैंने लोगों के नाम गिन लिए हैं। पंद्रह आएँगे।"
"सिर्फ़ पंद्रह?" मैंने कहा।
"पंद्रह आएँगे," उसने कहा, "पर वो पंद्रह अपने साथ किसी को नहीं लाएँगे, यह तो मैंने नहीं कहा।"
मैं हँसा।
और फिर मैंने देखा — दूर, गली के मुँह पर, एक सफ़ेद कुर्ता खड़ा था।
हाथ पीछे बँधे। खड़ा। हिलता नहीं।
वो नहीं आ रहा था। वो बस देख रहा था। और मुझे लगा कि अगर मैं आज सभा में किसी और की बात पर झूठी ताली बजा दूँ, तो वो वहीं नहीं खड़ा रहेगा — वो आगे बढ़ेगा।
मैंने माइक उठाया।
और उसी वक़्त, जब मैं मुँह खोलने वाला था, मेरे कान में — बहुत दूर से, बहुत हल्की, बहुत टूटी हुई, पर पहचानी हुई आवाज़ आई।
"धीरे।"
एक शब्द।
और फिर चुप।
मैं रुका। मेरी उँगलियाँ माइक पर कस गईं।
और मैंने सभा की तरफ़ देखा — सौ लोग, खड़े, बैठे, कुछ हँसते, कुछ डरे, कुछ वो जो सिर्फ़ देखने आए थे।
मैंने माइक अपने मुँह के पास लाया।
और मैंने कहा, "आज मैं आप सबसे एक सधागा अभी भी मेरी उँगलियों में था।
दो खुली गाँठें। जैसे किसी ने जल्दी में खोली हों, और खोलते वक़्त उसकी उँगलियाँ काँप रही हों। मैंने अंगूठे से उसे सहलाया। कहीं घंटी टूटकर जेब के अंदर ही रह गई हो? मैंने उँगली कोने-कोने में घुमाई। जेब का अस्तर फटा था, उसके अंदर एक छोटा सा छेद था जिसमें पैसा, पुराना नट, एक टूटी चाबी का सिरा और मेरे ही हाथ की ग्रीस जमा रहती थी। आज सब कुछ वहीं था। बस घंटी नहीं थी।
मैंने दूसरी जेब टटोली। खाली। कमीज़ की ऊपर वाली जेब। खाली। पैंट की पिछली जेब। खाली। मैंने अपनी कलाई से पैंट पर थपकी दी, जैसे कोई आदमी अपनी जेबें भूलने से डरता हो।
घंटी गई।
मेरा चेहरा सफ़ेद पड़ गया। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे सिर से चढ़कर सारा गरम खून खींच लिया हो और बस ठंडी खाल छोड़ दी हो। मेरे होंठ सूख गए। मेरी जीभ तालू से चिपक गई।
और मैं भागा नहीं।
मेरे पैर मंच पर जमे रहे। मेरी गर्दन झुकी नहीं। मेरी नज़र नीचे नहीं गई। मैं सीधा खड़ा रहा — वैसे ही जैसे मैं बचपन में पापा के सामने खड़ा होता था जब कुछ तोड़ देता था और चुपचाप इंतज़ार करता था कि वो मुझे डाँटें। पर आज कोई डाँटने वाला नहीं था। आज बस मंच था, भीड़ थी, बत्तियाँ थीं, और मेरे कंधे पर एक आदमी का हाथ था जो मेरा नहीं था।
भीड़ की तालियाँ मुझे दूर से आती लगीं। जैसे कोई पानी के नीचे ताली बजा रहा हो। मंच की बत्तियाँ गरम थीं, पर मुझे ठंड लग रही थी।
मैंने सुना है कि जब इंसान को बहुत बड़ा झटका लगता है, तो पहला पल सबसे अजीब होता है। न दर्द, न गुस्सा, बस एक ठहराव। जैसे कोई रेडियो बजता-बजता अचानक बंद हो जाए और सिर्फ़ उसकी गूँज कमरे में बच जाए।
मेरे साथ वही हुआ।
तुम सोच रहे होगे कि इतनी छोटी सी चीज़ से क्या होगा — एक घंटी। धातु का एक टुकड़ा, दो अंगुल का, जिसमें एक छोटी जीभ है जो हिलती है तो आवाज़ करती है। इससे बड़ी क्या बात।
तो सुन लो आगे।
वो घंटी मेरे दादा की साइकिल की थी। वो घंटी मेरे पापा के हाथ से निकलकर मेरे गले में लटकने वाली चाबी वाले धागे के साथ बँधी थी। वो घंटी मेरे उस तंत्र की जड़ थी जिसने इस गली की आधी टूटी चीज़ें जोड़ी थीं। वो घंटी अंकुश यादव का हथियार थी। और आज — इस मंच पर, इस भीड़ के सामने, इसी आदमी के गले लगते वक़्त — वो मेरी जेब से निकल गई।
मैंने अपना हाथ जेब से बाहर नहीं निकाला। मैंने उसे अंदर ही रखा। धागा उँगलियों में जकड़े हुए।
अगर मैं इस वक़्त अपना हाथ बाहर निकालता और खाली हथेली दिखाता, तो क्या होता?
कुछ नहीं। भीड़ मुझे पागल कहती।
"अरे इस लड़के को क्या हो गया? साहब ने गले लगाया, और ये जेबें टटोल रहा है।"
"घंटी? कौन सी घंटी? इसकी साइकिल की घंटी? अरे भाई, तुम्हारी साइकिल तो कहीं और खड़ी है।"
"ये लड़का सिर से पैर तक पसीना-पसीना क्यों हो गया है?"
और फिर रणवीर भारद्वाज — जो अभी मेरे कंधे पर हाथ रखे खड़े थे — वो अपनी जेब से एक चीज़ निकालकर दिखा सकते थे। वो हँसकर कह सकते थे, "ये क्या है, बेटा? मैंने तो तुम्हें गले लगाया और तुम मेरी जेब टटोलने लगे? क्या तुम समझते हो कि मैं तुम्हारी कोई चीज़ चुराऊँगा?"
और भीड़ हँसती।
और मैं खड़ा रह जाता।
नंगा।
जिस आदमी की जेब से सबसे प्यारी चीज़ चोरी हो जाए, और जिसके पास ये साबित करने का कोई रास्ता न हो कि ये चोरी हुई है — वो आदमी नंगा होता है। वो आदमी घर भर में घूमने वाला घूमने वाला भूत होता है।
मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था।
मेरे कानों में सिर्फ़ एक आवाज़ थी — धागे की, जो अब भी मेरी उँगलियों में था। मैंने उसे उँगलियों में लपेटा। एक चक्कर। दो चक्कर।
और तभी मेरे कंधे पर उनका हाथ थोड़ा और भारी हुआ।
बहुत हल्का।
वैसे ही जैसे कोई पिता अपने बेटे को कहता है — बेटा, सीधे खड़े रहो, कैमरा आ रहा है।
वो मेरे कान के पास झुके।
उनकी साँस की गंध इलायची की थी। उनका कुर्ता अब भी ठंडा था — जैसे वो सुबह से धूप में नहीं खड़े हुए हों, जैसे उन्हें किसी और की गरमी से फ़र्क़ नहीं पड़ता हो।
और उन्होंने कहा, बहुत धीमी आवाज़ में, इतनी धीमी कि सिर्फ़ मैंने सुना, सिर्फ़ मैंने —
"डरने की बात नहीं, अंकुश। शहर तो तुम्हारे जैसे लड़कों का है।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ सामने देखा।
"उम्र तुम्हारी है," वो बोले, "पर हिम्मत हमारी भी है। बस ज़रा सँभलकर चलना पड़ता है। तुम्हारी उम्र में हम सब भूल जाते हैं कि जेब में क्या रखा है।"
वो रुके।
"मैंने तो बस," वो बोले — और मुझे लगा कि उनकी आवाज़ में एक गाँठ है जो सिर्फ़ मैं सुन सकता हूँ — "तुम्हें सिखाया है।"
फिर वो मेरे कान से अपना मुँह हटा लेते हैं।
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