The Mysterious Bell – Chapter 517
बस छोटी उँगली। छोटी सी हरकत। एक इंच भी नहीं। और फिर उन्होंने हाथ नीचे कर लिया, कमीज़ के नीचे, जैसे कुछ किया ही न हो।
पर मैंने देख लिया।
मेरे पापा मुझसे यह कह रहे थे — मैं देख रहा हूँ। मैं यहाँ हूँ। मैं जानता हूँ कि कुछ गड़बड़ हुई है।
और अंदर से मेरी आँखें जल आईं।
मैंने मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया और भीड़ की तरफ़ देखने लगा। जैसे कहीं कुछ बहुत ज़रूरी देख रहा हूँ।
और तभी मीरा आई।
वो सीढ़ी के पास आई, कैमरा कंधे पर, माइक हाथ में, और उसने मुझे घूरकर देखा — वो घूरना जो सिर्फ़ मीरा को आता है, जिसमें प्रश्न भी होता है और गुस्सा भी और चिंता भी, तीनों एक साथ, एक नज़र में।
"क्या है?" मैंने कहा।
"तुम बता।" उसने कहा। "तुम्हारा चेहरा ऐसा क्यों है?"
"कैसा?"
"जैसे किसी ने तुम्हारी साइकिल की चेन उतार ली हो।"
मैं मुस्कुराया। "चेन होती तो।"
"अंकुश।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो तीन कदम दूर थी, कैमरा अभी भी चालू था, और उसकी आँखें मुझसे कुछ माँग रही थीं।
मैंने बहुत धीरे कहा, "घंटी नहीं है।"
उसकी उँगली रिकॉर्ड पर थी। वो नहीं हिली। पर उसका जबड़ा थोड़ा कस गया।
"क्या मतलब?"
"गले लगाते वक़्त निकाल ली। जेब से। धागा खोलकर वापस धागा डाल दिया।"
मीरा ने एक पल मेरे कंधे को देखा। फिर मेरी जेब को। फिर उसने अपना कैमरा नीचे किया और उसका ढक्कन लगाया।
"तो तुमने कुछ बोला क्यों नहीं?"
"क्योंकि बोलता तो तुम्हारे पास यह फुटेज होती — एक लड़का मंच पर चीख़ रहा है कि मेरी घंटी चोरी हो गई।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "और सच कहूँ, मीरा, तुम खुद क्या करतीं?"
वो चुप रही।
"तुमने मुझे देखा था," मैंने कहा। "जब मैंने इशारा किया। तुमने उसे पकड़ा। तुमने रुकना नहीं चुना। तुमने सिर्फ़ इंतज़ार किया। और मैंने वही किया जो तुमने सोचा होगा कि मुझे करना चाहिए — बोला, पर शांति से।"
उसने माइक अपने बैग में रख दिया।
"और शांति से बोलकर तुमने क्या जीता?"
"अगले रविवार की सभा।"
वो एक पल रुकी।
"क्या?"
"अगले रविवार। दस बजे। पीपल के नीचे। और जो मैंने कहा — अस्पताल की पुरानी याद। मीरा, अगर पचास लोग अपनी पुरानी याद लेकर आते हैं, तो हमारे पास पचास काग़ज़ होंगे। पचास कहानियाँ। पचास लोग जो कहेंगे — यह अस्पताल हमारा है।"
उसने मुँह खोला, फिर बंद किया। फिर उसने अपना हाथ अपने माथे पर रखा और रगड़ा।
"तुम घंटी खोकर यह जीत रहे हो?"
"मैं कुछ नहीं खो रहा," मैंने कहा, "मैं सिर्फ़ उस चीज़ के बिना चल रहा हूँ जो मेरे पास थी। और वो चीज़ मेरी जेब में थी, मेरे सिर में नहीं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ बदला। वो समझ नहीं रही थी — पर वो देख रही थी।
"तुम्हें पता है," उसने कहा, "तुम घंटी खोकर भी अब तक… पहले जैसे ही हो?"
"मैं वैसा ही हूँ," मैंने कहा। "बस कानों से थोड़ा अंधा हूँ।"
वो हँसी। बहुत छोटी हँसी। एक साँस जितनी।
और फिर वो सीधी हो गई और उसकी आवाज़ वही पुरानी मीरा वाली हो गई — तेज़।
"अगले रविवार। ठीक है। मैं चैनल पर डाल दूँगी। पूरे शहर को।"
"नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर तुम डालोगी, तो यह मेरी बात नहीं रहेगी। यह सभा नहीं रहेगी। यह सिर्फ़ खबर रहेगी। और खबर से लोग आते हैं, पर खबर से लोग साथ नहीं आते। मुझे साथ चाहिए।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। एक लंबी नज़र। और फिर उसने अपना सिर हिलाया — ठीक है, तुम्हारी मर्ज़ी।
और जब वो मुड़कर जाने लगी, तो मैंने कहा, "मीरा।"
वो रुकी।
"तुम्हारे पास जो काग़ज़ हैं — शालिनी की रिपोर्ट, भवानी का बयान, रमा का लिफ़ाफ़ा। उनमें से कोई भी आज नहीं, अगले रविवार तक नहीं छपेगा।"
उसने मुड़कर देखा। "और कल की सभा?"
"वो कल है। वो अस्पताल के लिए है। यह अलग है।"
वो कुछ देर मुझे देखती रही, और फिर उसने कहा, "तुम ठीक हो?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर मैं ठीक होने की तैयारी में हूँ।"
वो चली गई।
और मैं वहीं खड़ा रह गया, सीढ़ी के कालीन पर, खाली जेब, और एक बोझ जो पहले से कुछ ज़्यादा था।
…
मंच के पीछे से जब मैं बाहर आया, तो मैदान के कोने में एक चीज़ दिखी।
रणवीर की सफ़ेद गाड़ी।
वो अभी नहीं गए थे।
वो गाड़ी के पास खड़े थे और उनके सामने एक आदमी झुका हुआ था, जिसके हाथ में एक काग़ज़ था। मैंने दूरी से सिर्फ़ इतना देखा कि रणवीर ने वो काग़ज़ लिया, पढ़ा, और गाड़ी में बैठ गए।
और गाड़ी का दरवाज़ा बंद होने से पहले, उनकी नज़र मेरी तरफ़ आई।
मैदान भरा हुआ था — सौ लोग, कुर्सियाँ, तंबू, बच्चे, बत्तियाँ। इतने लोगों के बीच उनकी नज़र सीधे मुझ पर आई, जैसे किसी ने उन्हें बता दिया हो — देखिए, वो वहाँ है।
और उन्होंने मुझे देखकर कुछ किया।
उन्होंने अपना हाथ उठाया।
बस इतना — एक हाथ। एक हल्का सा इशारा, जैसे कोई किसी को नमस्ते कह रहा हो। पर उनकी उँगलियाँ एक तरह से मुड़ी हुई थीं, और उनका अंगूठा थोड़ा अलग था।
और मुझे तुरंत समझ आ गया — वो मुझे दिखा रहे थे कि उनके पास कोई चीज़ है। वो मुझे याद दिला रहे थे।
गाड़ी चल पड़ी। पीछे की लाल बत्ती अंधेरे में दो लाल आँखों जैसी दूर तक दिखती रही।
…
जब मैं गली पहुँचा, तो आठ बज चुके थे।
पीपल के नीचे बत्ती जल रही थी। तपेरी का बुढ़िया अब भी बैठी थी। उसके चूल्हे से धुआँ उठ रहा था और उसकी पीली रोशनी में पीपल की पत्तियाँ चमक रही थीं, जैसे पेड़ पर कोई पुराना सिक्का टँगा हो।
मेरी दुकान का शटर बंद था।
पर उसके सामने, बेंच पर, कोई बैठा था।
टिंकू।
वो वहीं बैठा था, अपने घुटने पर रखी लाल कॉपी में कुछ लिख रहा था, और उसके पास एक पीली काग़ज़ की पुड़िया थी जिसे उसने नहीं खोला था।
"तू घर नहीं गया?" मैंने पूछा।
वो सिर उठाए बिना बोला, "माँ जानती है। मैंने बोल दिया — उस्ताद के साथ हूँ।"
"क्या लिख रहा है?"
"सूची।" उसने कॉपी उठाई। "कौन-कौन आएगा अगले रविवार। मैंने देख लिया आज कौन-कौन सा मुँह बदला था।"
मैंने उसके पास बैठकर कॉपी देखी।
उस पर नाम थे। हाथ की लिखाई — टेढ़ी, बड़ी, कहीं-कहीं पेंसिल से दोबारा पक्का किया हुआ। भोला भाई। शबनम आपा। रफ़ीक़ की अम्मी। नसीमा बाई। और फिर एक नाम — बूढ़ी मैडम।
"यह कौन?"
"स्कूल की खिड़की वाली।" उसने कहा। "जो कल कप टूटने पर दिखी थीं। मैंने देखा — आज वो भी तंबू के पीछे खड़ी थीं।"
मैंने उसे देखा।
"तू किसी की नज़र में नहीं आया?"
उसने अपना चश्मा ठीक किया — वो काला एक काँच वाला, जो उसने मुझसे माँगकर लिया था — और बोला, "गुप्तचर के पाँच नियम होते हैं। नंगे पैर चलो, बात मत करो, धीरे साँस लो, और —"
"और?"
"और पकड़े जाओ तो पतंग ढूँढने लगो।"
मैं हँसा।
वो भी हँसा। और फिर उसकी हँसी रुक गई और उसने कहा, "उस्ताद।"
"हाँ।"
"घंटी नहीं है ना?"
मेरे हाथ रुक गए।
"मैंने देखा," उसने कहा। "मंच पर। जब वो लड़के ने तुम्हें गले लगाया। तुम्हारा हाथ जेब पर गया और तुम्हारा चेहरा बदल गया।"
बच्चे कभी-कभी बहुत बड़ी बात देख लेते हैं, और उन्हें देखने के लिए किसी तमाशे की ज़रूरत नहीं होती। बस वो सही जगह पर सही वक़्त पर देख लेते हैं, इसलिए कि सब उन्हें उम्र से छोटा समझकर कुछ भी करते-कराते रहते हैं।
मैंने कुछ जवाब नहीं दिया।
"पर तुम ताज्जुब की बात है," टिंकू बोला, "तुम अब भी उसी तरह बोल रहे थे जैसे उससे पहले। मैंने सुना तुम्हें। तुमने कहा — अपनी पुरानी याद लाओ। मुझे लगा कि तुम किसी और की बात कर रहे हो।"
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