The Mysterious Bell – Chapter 516
और यही चीज़ मुझे चाहिए थी।
क्योंकि मुझे पता था — जिस मोहल्ले में एक-एक घर में अस्पताल की पुरानी याद पड़ी है, वो मोहल्ला कोई भी काग़ज़ करा जाने वाले के आगे इतनी आसानी से झुकता नहीं।
माइक मैंने रणवीर की तरफ़ बढ़ाया।
उन्होंने नहीं लिया। उन्होंने अपने साथ खड़े एक आदमी को इशारा किया, जिसने माइक ले लिया। और फिर रणवीर ने दोनों हाथ फैलाकर भीड़ को देखा।
"क्या लड़का है! क्या बात है!"
तालियाँ और ज़ोर से बजीं। जैसे उन्होंने अंकुश की बात को अपनी बात बना लिया हो। और यही कला तो उनकी थी — दूसरे की बात को अपनी बना लेना।
"यही तो मैं कहता हूँ! यही तो भारद्वाज ट्रस्ट कहता है! याद रखिए। संभाल कर रखिए। कोई पुरानी चीज़ फेंकिए मत। क्योंकि जो पुराना है, वही तो हमारी जड़ है!"
भीड़ ने वाह-वाह किया।
और मैं वहीं खड़ा रहा, मुस्कुराता हुआ, जबकि मेरी जेब में एक खाली धागा पड़ा था।
मैं तुमसे कुछ कहूँ?
उस वक़्त एक अजीब सी बात हुई। मैं सोच रहा था कि मुझे गुस्सा आना चाहिए। मुझे चीख़ना चाहिए, मुझे मंच पर ही उनका हाथ पकड़कर कहना चाहिए — तुम चोर हो, तुमने मेरी घंटी चुराई, और भीड़ के सामने घंटी चमकानी चाहिए और कहना चाहिए — देखो, इसकी जेब में मेरी चीज़ है।
पर मैं जानता था यह क्या होता।
यह होता कि दो लोग खींचतान करते, मैं उनकी जेब में हाथ डालने की कोशिश करता, वो मुझे पागल कहकर पीछे हटा देते, भीड़ कहती — देखा, यह लड़का तो सिर्फ़ झगड़ा करता है, और अगले दिन सारे अख़बारों में यही छपता — साइकिल मिस्त्री ने समारोह में हंगामा किया। और रणवीर भारद्वाज को वो चीज़ मिल जाती जो उन्हें सबसे ज़्यादा चाहिए थी — यह साबित करने का मौक़ा कि मैं असंतुलित हूँ, मैं किसी बात का नहीं, मैं हर बात का दुश्मन हूँ, मैं मोहल्ले को बाँधने वाला नहीं, तोड़ने वाला हूँ।
और सबसे बड़ी बात — घंटी।
अगर मैं हंगामा करता और वो घंटी उनकी जेब में मिल भी जाती, तो क्या होता?
तो वो कहते — यह तो मेरी है। मैंने खरीदी है। किसी कबाड़ी से। और मेरे पास कोई काग़ज़ नहीं था, कोई रसीद नहीं थी, कुछ नहीं था। दादा की घंटी के काग़ज़ कहाँ हैं? किसी डायरी में लिखी है कि घंटी हमारी है? किसी रजिस्टर में? क्या?
और मेरे पास सिर्फ़ एक बात थी — कि यह घंटी मेरी है, और उस घंटी में एक तंत्र बोलता है जिसे सिर्फ़ मैं सुन सकता हूँ।
अब तुम बताओ — यह बात किसी अदालत में चलती है? किसी सभा में? किसी अख़बार में?
नहीं चलती।
इसलिए मैं चुप रहा।
और उस चुप्पी में मैंने एक काम किया। मैंने उनका चेहरा देखा।
मैं मंच पर उनके बगल में खड़ा था, और मैं उन्हें ऐसे देख रहा था जैसे दुकान पर ग्राहक की साइकिल देखता हूँ — जहाँ तकलीफ़ कहाँ है, यह पता लगाने के लिए। और मुझे कुछ चीज़ें दिखीं।
पहली चीज़ — उनकी जेब।
उनके सफ़ेद कुर्ते की जेब हल्की थी। मुझे पता था उसमें क्या है, इसलिए मुझे दिख रहा था — कपड़े का एक बहुत हल्का सा भार, बाएँ हाथ की तरफ़। जब वो भीड़ को हाथ हिलाकर सलाम करते, तो उनकी बाईं तरफ़ का कपड़ा उनके शरीर से थोड़ा चिपकता रहता, जैसे किसी भारी चीज़ के नीचे दबा हो।
दूसरी चीज़ — उनकी आवाज़।
वो लगातार बोल रहे थे, पर उनकी आवाज़ में जो पहले एक लय थी, वो अब थोड़ी टूट रही थी। जैसे कोई गाना गाते-गाते हाँफने लगे। और उन्होंने दो बार अपना गला साफ़ किया। रणवीर भारद्वाज अपनी आवाज़ से पहले गला साफ़ नहीं करते थे — मैंने उन्हें चार बार सुना था, कभी नहीं किया।
तीसरी चीज़ — उनकी गर्दन।
उनके गले के नीचे, कॉलर के ठीक ऊपर, एक नस थी जो धड़क रही थी। और वो धड़कन तेज़ थी।
मुझे यह सब देखकर एक बात समझ आई — वो घंटी उनके लिए जीत नहीं थी। वो एक बोझ थी। वो उस घंटी को इसलिए नहीं लिए थे कि उनके पास कोई चीज़ और आ गई। वो उस घंटी को इसलिए लिए थे कि मेरे पास न रहे।
यह फ़र्क़ बहुत बड़ा है। तुम सोच रहे होगे कि क्या फ़र्क़ पड़ता है — लिया है तो लिया है न।
पड़ता है।
क्योंकि जो आदमी किसी चीज़ को लेने के बाद उससे डरने लगे, वो उस चीज़ का मालिक नहीं होता। वो उसका रखवाला होता है। और रखवाले को हर वक़्त डर रहता है कि कोई उसे देख न ले।
रस्म ख़त्म हुई। भीड़ उठने लगी। कुर्सियाँ खिसकने की आवाज़ें आईं। कोई बच्चा रोया। बत्तियाँ अभी जल रही थीं और शाम की हवा में उनकी रोशनी थोड़ी पीली पड़ रही थी।
मैं मंच की सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा।
और तभी रणवीर मेरे साथ-साथ आगे बढ़े, जैसे कोई बड़ा भाई मंच से उतरते वक़्त छोटे भाई के कंधे पर हाथ रखता है। उनका हाथ मेरे कंधे पर आया। भारी हाथ। गरम। उनके सफ़ेद कुर्ते की आस्तीन मेरी गर्दन से छू गई और उसमें से इलायची की वही गंध आई।
और वो मेरे कान के पास झुके।
नीचे भीड़ की खिसकती कुर्सियों की आवाज़, बच्चों की चहचह, माइक से कोई कुछ कह रहा था, दूर किसी ने हॉर्न बजाया।
उस सब के बीच, बहुत धीरे, वो बोले —
"डरने की बात नहीं, अंकुश। शहर तो तुम्हारे जैसे लड़कों का है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"बस एक बात याद रखना।" उनका हाथ मेरे कंधे पर थोड़ा और भारी हुआ। "उंगली कभी किसी पर सीधी मत उठाना। क्योंकि जो उंगली उठाता है, उसके बाक़ी तीन उंगलियाँ अपनी तरफ़ मुड़ी होती हैं।"
वो हँसे। हल्की हँसी। और अपना हाथ हटा लिया।
"मैं तो तुम्हारा शुभचिंतक हूँ, बेटा। याद रखना। हमेशा रहा हूँ।"
और वो चले गए। भीड़ उनके आगे फटती गई, जैसे पानी चाकू के आगे फटता है। कोई उनके पैर छूने झुका, कोई उन्हें नमस्ते करने लगा, कोई उनके साथ चलने लगा।
मैं मंच की सीढ़ी पर खड़ा रह गया।
सीढ़ी का लाल कालीन धूल भरा था। मेरे जूते उस पर रखे हुए थे और जूते जैसे किसी और के लग रहे थे।
मैंने जेब में हाथ डाला।
धागा था। दो खुली गाँठें। और उसके बीच, जहाँ घंटी बँधी थी, एक घेरा — जो अब खाली था।
मैंने उस घेरे को उँगली से टटोला।
कुछ नहीं।
मैंने उँगली घुमाई। कुछ नहीं।
अब सुनो — मैं तुम्हें यह बताना चाहता हूँ कि उस वक़्त मुझे क्या महसूस हुआ। क्योंकि यह बात मैंने किसी को नहीं बताई। न मीरा को, न काजल को, न टिंकू को।
मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे कान बंद हो गए हों।
तुम सोचोगे कि यह अजीब बात है — घंटी जाने से कान कैसे बंद होंगे। पर सच यह है कि पिछले कुछ हफ़्तों में मुझे एक आदत पड़ गई थी। मैं हर वक़्त, बिना जाने, कानों से उस आवाज़ को ढूँढता रहता था। जब गली में कुछ होता, तो मेरा कान पहले घूमता — कोई आवाज़ आएगी क्या। कोई चेतावनी। कोई छोटी सी बात — "यह टूट रहा है" या "यह जुड़ सकता है"।
और अब उस जगह पर सिर्फ़ हवा थी।
गली की आवाज़ें आ रही थीं — शबनम आपा किसी को समोसा दे रही थीं, टिंकू किसी बच्चे से झगड़ रहा था, कोई औरत अपनी चप्पल ढूँढ रही थी। आवाज़ें थीं। बहुत आवाज़ें थीं।
पर उन सब के पीछे जो एक आवाज़ थी — वो नहीं थी।
मैंने अपना हाथ जेब से निकाला।
नीचे पापा खड़े थे।
मैंने उन्हें देखा। उन्होंने मुझे देखा। उनका चश्मा टेप से बँधा था और उनके हाथ में कुछ नहीं था — न औज़ार, न फाइल, न पुर्ज़ा। सिर्फ़ खाली हाथ, जो किसी पुराने आदमी के हाथ जैसे नहीं लग रहे थे, बल्कि किसी ऐसे आदमी के हाथ लग रहे थे जो किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहा हो।
और उन्होंने मुझे देखकर एक बात की जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
उन्होंने अपनी छोटी उँगली थोड़ी उठाई।
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