The Mysterious Bell – Chapter 506
वो फिर बैठ गए। इस बार धीरे से। उनकी पीठ अब पहले जितनी सीधी नहीं थी।
"अब तुम बताओ," उन्होंने कहा। "उस परत में और कुछ दिखा?"
मैंने आँखें बंद कीं। जंग की गंध अब भी मेरी उँगलियों में थी। और मुझे वो कोना फिर दिखा — ईंट, छोटी लकीर, और एक हाथ जो पन्ने को नीचे दबा रहा था।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "वो पन्ना ईंट के नीचे गया। और जो ईंट थी, वो किसी दीवार की नहीं थी। वो अलग पड़ी थी — ज़मीन पर। जैसे किसी ने उसे जान-बूझकर फाटक के पास रखा हो, ताकि कोई कभी न देखे।"
डॉक्टर इसरानी ने लालटेन उठाई और फाटक के नीचे रोशनी डाली।
हम सबने देखा।
फाटक के बाएँ पाए के नीचे, ज़मीन में बैठी, आधी दबी, एक पुरानी ईंट थी। उसका रंग औरों से गाढ़ा था। और उसके एक कोने पर, चूने की पपड़ी के नीचे, एक छोटी सी लकीर जैसी चीज़़ दिख रही थी।
"अरे," टिंकू ने फुसफुसाया। "उस्ताद। वो…"
"हाँ," मैंने कहा।
मैंने घंटी जेब में उठाई और उसे एक बार बजाया। छोटी, धीमी आवाज़। किसी ने मेरे कान के पास, बहुत करीब, बस तीन शब्द कहे।
"नीचे है।"
टिंकू ने फौरन झुकना चाहा। मैंने उसका कंधा पकड़ा।
"नहीं। रात में नहीं। सुबह। जब सूरज निकले, तब। जो चीज़ पचास साल सूरज नहीं देख पाई, उसे रात में मत निकाल।"
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चश्मे का चटका काँच लालटेन की रोशनी में चमका।
"मैंने यह ईंट कभी नहीं देखी," उन्होंने कहा। "इतने साल, इतनी बार इस फाटक से गुज़रा, कभी नहीं देखी।"
"क्योंकि आप नीचे देखते ही नहीं थे," मीरा ने कहा। "आपँ आँखें फाटक पर रखते थे। और फाटक ने आपकी आँखें पकड़ रखी थीं।"
डॉक्टर इसरानी ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गए। और उस रुकावट में कुछ ऐसा था जो बता रहा था कि यह बात उनके अंदर पहुँच गई।
फिर उन्होंने लालटेन बुझाई।
मैंने कहा, "डॉक्टर साहब, आज रात बारह बजे अस्पताल की सीढ़ी बंद हो रही है। आपको पता है?"
कुछ देर अंधेरे में सिर्फ़ उनकी साँस सुनाई दी।
"पता है," उन्होंने कहा। "मैंने उस काग़ज़ पर हस्ताक्षर नहीं किए। पर मैंने उसे रोका भी नहीं। मैंने सोचा, रात रुक जाएगी। रास्ता खुद बन जाएगा। बूढ़ा आदमी हूँ, अंकुश। अब भी वही सोचता हूँ — रास्ता खुद बन जाएगा।"
"नहीं बनता," मैंने कहा। "मैंने पचास बार देखा है। रास्ता खुद नहीं बनता। कोई बनाता है।"
फिर वो अंधेरे में हँसे — बहुत थोड़ी देर के लिए।
"तेरे पापा भी ऐसा ही बोलते थे," उन्होंने कहा। "पहले पहले। बाद में नहीं बोले।"
हम चुपचाप अस्पताल की पिछली दीवार के सहारे लौटे। मीरा चलती हुई धीरे-धीरे कुछ लिख रही थी — पेंसिल, छोटी कॉपी, बिना रोशनी के। उसकी आँखें काग़ज़ पर नहीं, रास्ते पर थीं।
टिंकू मेरे साथ चल रहा था। रास्ते में उसने एक बार पूछा, "उस्ताद, अगर वो ईंट के नीचे आठवाँ पन्ना निकला, तो क्या वो सबका सामने खुलेगा?"
"हाँ।"
"और उस पर नाम भी होगा?"
"हो सकता है।"
टिंकू कुछ कदम चुप चला। फिर बोला, "मुझे डर लग रहा है।"
"मुझे भी," मैंने कहा। "पर डर के साथ चलना पड़ता है। सिर्फ़ इस बात का ध्यान रखना कि डर तेरे आगे न चलने पाए।"
वो हँसा — छोटी सी हँसी, जो उसकी उम्र से बड़ी लगी।
जब हम अस्पताल के नीचे वाले बरामदे में पहुँचे तो काजल दरवाज़े पर खड़ी थी। उसके हाथ में दवा की थैली थी और चेहरे पर वो भाव जो बहनों के चेहरे पर तब आता है जब वो बहुत देर तक किसी का इंतज़ार कर चुकी हों और अब गुस्सा दिखाना है।
"कहाँ थे?" उसने कहा।
"फाटक पर।"
"कौन सा फाटक?"
"पीछे वाला। जिसे कोई नहीं छूता।"
काजल ने दवा की थैली मेरे हाथ में थमाई और मेरा हाथ देखा — जंग से मैला।
"तुमने छुआ?"
"छुआ।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने बहुत धीरे से कहा, "तुम पापा जैसे हो रहे हो। वो भी ऐसे ही हैं। जब कुछ बहुत ज़रूरी होता है, तो चुप रहते हैं।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैं अंदर गया, माँ के पलंग के पास गया। वो सो रही थीं — दवा से, थकान से, या उस बीमारी से जो अब उनके शरीर का हिस्सा बन गई है। उनकी साँस धीमी थी, और उनका एक हाथ चादर के बाहर पड़ा था।
मैंने वो हाथ चादर के नीचे कर दिया। फिर पास में रखी कुर्सी पर बैठ गया — वही कुर्सी, जिसे मैंने टिंकू के साथ रात भर जोड़ा था। उसका पहिया अब चुपचाप घूमता था।
मैंने जेब से घंटी निकाली और उसे हथेली में रखकर देखा।
"सुन," मैंने धीरे से कहा। "आठवाँ आदमी। वो कौन था?"
घंटी चुप रही।
"वो ज़िंदा है?"
और इस बार, हथेली में, बहुत धीमी सी, एक आवाज़ आई — इतनी धीमी कि मुझे लगा मैंने सुना नहीं, सोचा है।
"जो पन्ना छुपाता है, वो खुद भी छुपा रहता है।"
मैंने आँखें मूँद लीं।
"और डॉक्टर साहब के पापा — मतलब हकीम साहब — ने उस आदमी का अंगूठा क्यों लिया?"
घंटी इस बार कुछ देर चुप रही। फिर बोली — और उसकी आवाज़ में पहली बार ऐसा लगा जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपनी ही पुरानी बात याद करके थक गया हो।
"क्योंकि उसने कहा था कि मैं सबका भला करता हूँ।"
मेरी रीढ़ में ठंडी सुई सी चुभी।
"मतलब… वो कोई मददगार था? कोई समाजसेवी?"
घंटी ने जवाब नहीं दिया।
पर उस चुप्पी में एक बात थी जो मुझे समझ आ गई — और वो बात मुझे अंदर तक डरा गई। क्योंकि अगर आठवाँ आदमी भी उसी तरह शुरू हुआ था — मदद करने वाला, भला करने वाला, सबका भाई — तो फिर यह जंग सिर्फ़ एक ठेकेदार से नहीं है। यह जंग उस चीज़ से है जो भले की शक्ल में आती है और धीरे-धीरे तुम्हारी ज़मीन, तुम्हारे काग़ज़, तुम्हारे अंगूठे, और आख़िर में तुम्हारा नाम ले लेती है।
सुबह सभा है।
सुबह वो ईंट निकलेगी।
सुबह हकीम अली का वो आधा पन्ना, जो आठवें आदमी की पहचान छिपाए बैठा है, सबके सामने खुलेगा।
और मुझे लग रहा था — नहीं, मुझे पक्का पता था — कि जब वो पन्ना खुलेगा, तो सभा में खड़े किसी आदमी का चेहरा ऐसा हो जाएगा जैसे हकीम साहब की परत में था। धुएँ जैसा। जिसे दूर से देखो तो लगे कोई है, और पास जाओ तो कुछ न हो।
मैंने माँ के पलंग की तरफ़ देखा। उनकी साँस अब भी धीमी चल रही थी — बस चल रही थी। और मुझे पता था कि कल की सभा में अगर एक भी चीज़ गलत हुई, तो यह साँस उसी धीमी रफ़्तार में चलती रहेगी, और मैं इसे तेज़ नहीं कर पाऊँगा।
मैंने घंटी जेब में रखी और काजल की तरफ़ देखा, जो दरवाज़े पर खड़ी मुझे देख रही थी।
"काजल," मैंने कहा, "सुबह छह बजे पीपल के नीचे सबको बुला। माँ के पास तू रुक। और पापा को… पापा को मेरे साथ आना है।"
"तुम उनसे क्या कहोगे?"
मैं थोड़ी देर चुप रहा।
"वो बात जो सत्ताईस साल से कहनी थी," मैंने कहा। "पर पहले वो ईंट। क्योंकि अगर वो पन्ना सामने आ गया, तो पापा को अपनी बात खुद नहीं कहनी पड़ेगी। उनकी जगह वो काग़ज़ बोलेगा।"
काजल ने कुछ नहीं कहा। वो आई, मेरे बगल में बैठ गई, और हम दोनों देर तक माँ की साँसें गिनते रहे — जैसे कोई हिसाब हो, जिसमें अंक नहीं, बस धड़कनें जोड़नी हों।
और दूर, गली के मुँह पर, किसी सफ़ेद गाड़ी की खिड़की धीरे से खिसकी। हमने उसे नहीं देखा।
पर पीपल के नीचे जलती उस छोटी आग वाले बूढ़े ने देखा — और उसने अपनी लाठी उठाकर उस तरफ़ इशारा किया, जैसे कोई गिनती कर रहा हो।
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