The Mysterious Bell – Chapter 507
सुबह चार बजे अस्पताल का बरामदा ऐसा लगता है जैसे किसी ने पूरी इमारत को उतार कर एक कोने में रख दिया हो। बेंचें खाली, पंखा बंद, और दूर कहीं एक बूढ़ा खाँस रहा है — वही खाँसी, जो रात भर चलती है और सुबह होते-होते किसी की साँस बन जाती है।
मैंने कुर्सी का पहिया धीरे से घुमाया। चरचराया नहीं। टिंकू की मेहनत बेकार नहीं गई थी।
काजल माँ के पलंग के पास वाली स्टूल पर सिर झुकाए बैठी थी। उसकी नर्सिंग की किताब गोद में खुली थी, पर आँखें बंद थीं। माँ की साँसें अब भी वही धीमी गिनती चल रही थीं — जैसे कोई बूढ़ा घड़ीसाज़ बहुत थका हुआ घड़ी में पेंडुलम डाल रहा हो, और उसे भी पता हो कि घड़ी अब सही नहीं चलेगी, बस बंद भी नहीं होनी चाहिए।
"काजल।"
वो चौंकी।
"मैं जाग रही हूँ," उसने झट से कहा, जैसे स्कूल में मास्टर ने नाम पुकारा हो।
"माँ के पास रुक। मैं घर जा रहा हूँ। छह बजे पीपल के नीचे सबको बुलाना है — वो तेरा काम है। और पापा को लाना है।"
"तू खुद क्यों नहीं बुलाता?"
"क्योंकि मैं उनसे पहले अकेले में बात करना चाहता हूँ," मैंने कहा। "और अकेले में बात करने के लिए ज़रूरी है कि तू बाहर हो।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो भाव था जो पिछले कुछ दिनों से आ रहा था — डर नहीं, थकान। जैसे वो भी अब सिर्फ़ सच के साथ चलना चाहती थी, चाहे वो सच कैसा भी हो।
"पापा कुछ बोलेंगे नहीं," उसने कहा।
"बोलेंगे," मैंने कहा। "बस उन्हें लगता है कि चुप रहना भी एक तरह का बोलना है।"
घर पहुँचा तो पौ फट रही थी। गली में सिर्फ़ कुत्ते जागे थे और शबनम आपा की गुमटी पर चूल्हा जल रहा था। चाय की भाप उठ रही थी, और वो भाप देखकर मुझे अचानक बहुत भूख लगी — दो दिन से ठीक से खाया नहीं था।
घर का दरवाज़ा खुला था। आँगन में पानी छिड़का हुआ था — माँ के अस्पताल में होने पर भी कोई हर सुबह आँगन में पानी छिड़कता है, यह बात मुझे हमेशा अजीब लगती है। बस यही नहीं, कोई गमला भी बदलता है, कोई कपड़े भी सुखाता है। घर खुद भी ज़िंदा रहना चाहता है, चाहे लोग अस्पताल में पड़े हों।
पापा छत पर थे।
मैं ऊपर गया। सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त मुझे लगा कि हर सीढ़ी एक सवाल है और मैं उस पर पैर रख रहा हूँ।
पापा पानी की टंकी के पास, पुरानी ईंट पर बैठे थे — वही ईंट, जिस पर उन्होंने मुझे बैठने को कहा था। हाथ में एक पुरानी रिंच थी और वो उसे उसी तरह पोंछ रहे थे, जैसे कोई गिलास पोंछता है। हालाँकि रिंच में पोंछने जैसी कोई चमक नहीं बची थी।
"पापा।"
"हूँ।"
"अस्पताल के पीछे वाला लोहे का फाटक।"
उनका हाथ रुक गया। सिर्फ़ हाथ नहीं, पूरा शरीर रुका — साँस तक रुकी। फिर बहुत धीरे, जैसे कोई खुद से उम्मीद कर रहा हो कि आवाज़ न काँपे, उन्होंने कहा, "मैंने कुछ नहीं छुआ।"
"मैंने कुछ पूछा भी नहीं कि छुआ क्या।"
वो चुप हो गए।
रिंच उनके हाथ में काँपने लगी। मैंने देखा, वो काँपी नहीं — काँपने लगी। दो अलग बातें हैं। एक तब काँपता है जब डर लगता है, दूसरा तब जब कोई चीज़ अंदर से ज़ोर लगा रही हो, जैसे हाथ से बात निकलने को बेताब हो।
उन्होंने उसे दूसरे हाथ से दबा लिया, जैसे कोई चिड़िया पकड़ी हो।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तू उस फाटक को भूल जा।"
"भूल नहीं सकता, पापा। डॉक्टर साहब ने खुद बताया कि तुमने सत्ताईस साल पहले रात तीन बजे वो फाटक छुआ था। और माफ़ी कभी नहीं कह पाए। ये बात मुझे किसी और ने नहीं बताई। उन्होंने बताई।"
"इसरानी बोल गए?" उनकी आवाज़ में कुछ टूटा। "वो… वो बोल गए?"
"वो बोले नहीं, पापा। उन्होंने हाँ कह दी। और हाँ कहना भी बोलना ही है।"
पापा ने रिंच ज़मीन पर रख दी। फिर दोनों हाथ गोद में रख लिए — जैसे हाथ ही उनके सबसे बड़े दुश्मन हों।
मैं उनके पास बैठ गया। धूप अब सुर्ख़ हो रही थी, और नीचे पीपल की डाल पतंगों की डोर से बँधी हुई लग रही थी।
"पापा," मैंने कहा, "मैं आधे सच का आदमी हो गया हूँ।"
वो मेरी तरफ़ देखने के लिए मुड़े — पहली बार उस सुबह।
"मुझे आधा सच दिया गया, तो मैंने आधी बात समझी। फिर आधा सच और आया, तो मैंने दूसरी आधी बात समझी। अब सब मिलाकर भी कुछ नहीं बन रहा, पापा। मैं थक गया हूँ।"
"मैं झूठ नहीं बोल रहा," उन्होंने कहा।
"पता है। तुम चुप हो। पर पापा, चुप्पी भी एक तरह का झूठ होती है। वो छुपाती नहीं है, वो बस बोलती नहीं। और जो नहीं बोलता, उसके लिए दूसरे कोई भी कहानी बना लेते हैं। मैंने भी बना ली। मैं सत्ताईस साल से एक कहानी में जी रहा था — कि मेरे पापा ईमानदार हैं।"
पापा ने आँखें बंद कर लीं।
"और अब?" उन्होंने पूछा।
"अब मुझे पता है कि मेरे पापा ईमानदार हैं, पर डरे हुए हैं। और ईमानदार डरा हुआ आदमी सबसे ज़्यादा टूटता है, क्योंकि वो झूठ बोल भी नहीं पाता और सच भी नहीं कह पाता।"
पापा की आँखों से पानी निकला — बहुत कम, बस इतना कि चश्मे के काँच पर एक लकीर बन गई। उन्होंने उसे पोंछा नहीं।
"तू जानता है," उन्होंने धीरे से कहा, "मैं उस रात फाटक पर क्यों गया था?"
"नहीं जानता।"
"मैं उस रात तेरे दादा की साइकिल की घंटी लेकर गया था।" उनकी आवाज़ फुसफुसाहट बन गई। "मैंने सोचा था कि हकीम साहब को दिखा दूँगा, और वो कह देंगे कि ये चीज़ तुम्हारी है, ये बेच नहीं सकते। मुझे उस रात भरोसा चाहिए था। बस एक आदमी का भरोसा।"
मैं चुप बैठा रहा।
"और उस रात," पापा ने कहा, "हकीम साहब नहीं थे वहाँ। कुर्सी पर और कोई बैठा था।"
"कौन?"
वो चुप हो गए। फिर बोले, "वही सवाल मैं सत्ताईस साल से खुद से पूछ रहा हूँ। और वो जवाब भी सत्ताईस साल से मुझे नहीं देता।"
छह बजे मैं पीपल के नीचे पहुँचा, और वहाँ पहुँचकर मुझे लगा कि मेरा घर खाली नहीं है — मेरा घर पूरी गली है।
उस्ताद अली बक्श अपनी मशीन वाली कुर्सी पर बैठे थे, चश्मा कान पर, हाथ में कैंची। शबनम आपा ने बड़ा भगोना चाय का रख दिया था और पास में कटोरी, जिसमें पैसे डाले जाते हैं। दुबे अंकल अपनी कुर्सी लेकर आए थे — वो अपनी कुर्सी इसलिए लाते हैं, कहते हैं, अपनी चीज़ पर बैठकर आदमी कम झूठ बोलता है। बच्चे चबूतरी पर बैठे थे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू, और टिंकू सबसे आगे, दुपट्टा उतारकर मोड़ता हुआ।
पापा नहीं आए।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने मुझे देखा और बस कैंची चटकाई।
"अब?" उस्ताद ने कहा।
"अब कुछ नहीं," मैंने कहा। "ईंट ज़मीन में है। काग़ज़ उसके नीचे है। और पापा घर पर हैं। जब तक वो नहीं आते, मैं उसे नहीं खोदूँगा।"
दुबे अंकल ने कुर्सी में हिलते हुए कहा, "बेटा, पुलिस की आदत है — जो चीज़ ज़्यादा देर ज़मीन में रहती है, वो पुलिस की हो जाती है।"
"आज सभा नहीं होगी," मैंने कहा। "कल सुबह दस बजे होगी। उस वक़्त ईंट निकलेगी, पन्ना खुलेगा, और पापा भी वहाँ होंगे।"
"और अगर न आए?" सानिया ने पूछा।
"तो मैं उनकी कुर्सी रख दूँगा," मैंने कहा। "खाली कुर्सी भी बोलती है।"
बच्चे हँसे। शबनम आपा ने चाय की केतली उठाई और बोलीं, "तू एक काम कर — पापा को खबर मत भेज। खबर से आदमी नहीं आता, बहाना भेजता है। तू खुद जा और सीधा बता कि तेरा बेटा इंतज़ार कर रहा है। बाप नहीं आए तो गली आएगी, और गली आई तो बाप को आना पड़ेगा।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"आपा," मैंने कहा, "आप गली की सबसे अच्छी इंसान हो।"
"बकवास बंद कर," उन्होंने चिमटी उठाई। "चाय ठंडी हो रही है।"
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