The Mysterious Bell – Chapter 505
"और उसका चेहरा?"
"पता नहीं।" उन्होंने सिर हिलाया। "आज तुम पूछो तो मैं सोचता हूँ — दिखा था क्या मुझे चेहरा? पर याद आता है बस टोपी। सफ़ेद टोपी, और हाथ में एक अंगूठी जैसा कुछ, जो उसने उँगली से नीचे सरका दिया था।"
मेरा पेट अंदर से ठंडा हो गया। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने आँखें सिकोड़ीं।
"अंगूठी," मीरा ने कहा। "काली अंगूठी?"
डॉक्टर इसरानी ठिठक गए। "तुमने कहा काली?"
"डॉक्टर साहब, हमने यहाँ कई बार एक सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी को देखा है। बाएँ हाथ में कुछ बँधा है। और उसी हाथ की उँगली में काली अंगूठी थी — वो हमको साफ़ नहीं दिखी, पर काग़ज़ ऐसे पकड़ रहा था जैसे अंगूठी से दबाकर रखनी हो।"
डॉक्टर साहब ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, उसे रूमाल में पोंछा, और बिना चश्मे के सामने देखने लगे। बिना चश्मे के उनकी आँखें बड़ी हो गई थीं — और छोटी भी, जैसे अंदर कुछ पीछे हट गया हो।
"पचास साल," उन्होंने कहा। "पचास साल मैंने सोचा कि उस रात मैंने सपना देखा था। कभी कभी ऐसा लगता — सात अंगूठे, कोई और आया, छोटा पन्ना, सब मन का खेल। क्योंकि सुबह उस पन्ने का कोई नाम-निशान नहीं था। हकीम साहब ने भी कुछ नहीं कहा। बस उस काग़ज़ को तह करके अपनी जेब में रखा और मेरे सिर पर हाथ फेरकर बोले — निहाल, अब इसे चूल्हे में मत डालना।"
"चूल्हे में?" मैंने कहा।
"हाँ।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "यह मत सोचना कि मैंने यह नाम अभी जोड़ा है। हकीम साहब ने यही शब्द कहे थे। और मुझे उस वक़्त मज़ाक लगा। मैंने कहा — उस्ताद, दफ़्तर में चूल्हा कहाँ है? वो हँसे और कहा — जिस घर में चूल्हा जलता है, वहाँ रखकर आना। काग़ज़ आग से डरता है, इसलिए चूल्हे के पास रखना। आग से नहीं, आग के पास। डर से ज़्यादा करीब।"
टिंकू ने मेरी कमीज़ और ज़ोर से पकड़ी। मुझे पता था वो क्या सोच रहा था। हम सब एक ही बात सोच रहे थे — चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा।
"डॉक्टर साहब," मैंने धीरे से कहा, "उस पन्ने का क्या हुआ?"
"कौन जाने।" उन्होंने कंधे उठाए। "हकीम साहब उन चार महीने में कभी उस काग़ज़ की बात नहीं करते रहे। फिर वो बीमार पड़े और चले गए। उनके जाने के बाद मैंने एक बार दफ़्तार के सारे काग़ज़ उलटे। वो काग़ज़ मिला। सात नाम, सात अंगूठे। पर आठवाँ पन्ना नहीं मिला।"
"आपने किसी को बताया?"
"मैंने यह चाहा," उन्होंने कहा, "कि मैं इस बात को बताने लायक बनूँ। हर साल सोचता — इस बार सभा में कहूँगा। हर बार कुछ टूट जाता। एक साल बारिश में दीवार गिरी, दूसरे साल किसी ने छत उखाड़ दी, तीसरे साल मेरी बीवी बीमार पड़ी।" वो रुके। "और हर साल कोई नया काग़ज़ आकर मेज़ पर बैठ जाता, जिसमें यह ज़मीन किसी और के नाम लिखी दिखती। और हर साल मैं चुप रह जाता।"
मीरा ने कुछ लिखना चाहा, पर उसने बैग बंद रखा। उसने सिर्फ़ पूछा, "आज क्यों बता रहे हैं?"
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। बिना चश्मे के, और मुझे लगा कि वो मुझे नहीं, मेरे पीछे किसी और को देख रहे हैं।
"क्योंकि आज यह लड़का इस फाटक को छूकर खड़ा है," उन्होंने कहा, "और जो चीज़ मैं पचास साल से नहीं कर पाया, यह बिना डरे कर गया। क्या मैं उससे छुपाऊँगा?"
फिर उन्होंने घुटनों पर हाथ रखा और सीधे हो गए, जैसे कोई ज़मीन से उठ रहा हो।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मुझे तुमसे एक बात कहनी है। और तुम उसे सुनकर मुझसे नफ़रत करो तो कोई बात नहीं। पर सुन लो, क्योंकि कल तुम्हारी सभा में मैं यह नहीं दोहरा पाऊँगा।"
मैंने घंटी जेब में रखी। मेरी उँगलियाँ जंग से मैली हो गई थीं।
"बोलिए।"
"तेरे पापा ने भी यह फाटक छुआ था।"
मेरे मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली।
"सत्ताईस साल पहले," डॉक्टर साहब ने कहा। "रात के तीन बजे थे। मैं ऊपर अपने कमरे में बैठा था — तब मैं ऊपर ही रहता था। नीचे किसी के रोने की आवाज़ आई। मैंने सोचा किसी का मरीज़ होगा। मैं नीचे आया और बाहर निकला।"
"और?" मेरी आवाज़ फटी हुई निकली।
"वो यहीं खड़ा था। इसी फाटक पर, इसी जगह। दोनों हाथ फाटक पर रखे हुए। वो रो नहीं रहा था। बस एक तरह की आवाज़ उसके गले से निकल रही थी — जैसे कोई बहुत देर तक साँस रोके बैठा हो और अब छोड़ दे। मैंने उसे नाम से पुकारा। 'शंकर।' वो मुड़ा और उसने मुझे देखा।"
डॉक्टर इसरानी ने साँस ली।
"उस रात उसने मुझसे कोई बात नहीं की। सिर्फ़ इतना कहा कि डॉक्टर साहब, आप अंदर चले जाइए। मैंने कहा, तुम चलो। वो नहीं चला। मैं अंदर आ गया। और सुबह जब मैं नीचे आया तो फाटक पर कोई नहीं था। बस उसकी जगह ज़मीन पर पानी की एक तरह की लकीर थी — मुझे तब लगा कि बारिश हुई। बारिश नहीं हुई थी।"
"आपने कभी उससे पूछा नहीं?"
"मैंने पूछने की कोशिश की।" उन्होंने अपना सिर हिलाया — बहुत धीरे, जैसे गर्दन में दर्द हो। "एक हफ़्ते बाद वो दुकान पर था। मैंने कहा — शंकर, वो रात… और वो औज़ार रखकर उठ गया और अंदर चला गया। उसने मुझसे आँख नहीं मिलाई। एक बाद नहीं — उस दिन के बाद कभी नहीं मिलाई।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर वो चुप थी।
"वो मेरे पास दवा लेने नहीं आता था," डॉक्टर साहब कह रहे थे, "काजल आती थी। तुम आते थे। तुम्हारी माँ आती थी। पर वो — वो गली के मोड़ से लौट जाता था। कभी कभी मैं उसे दूर खड़ा देखता था, मेरी तरफ़ देखता, और फिर जैसे अपनी ही नज़र से शर्माकर मुड़ जाता था। मैंने सोचा, किसी बात पर झगड़ा हो गया। मैंने सोचा, वो मुझे नीचा समझता है। मैंने सोचा, मुझसे कोई भूल हुई है।"
"और सच क्या था?"
"सच यह था," उन्होंने कहा, "कि उस आदमी ने मेरे अस्पताल की ज़मीन के काग़ज़ पर अपना अंगूठा लगाया था। और उसे लगता था कि मैं जानता हूँ। और मैं नहीं जानता था। और यही सबसे बड़ी बात है — उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि मैं उसे दोस्त की तरह देख रहा हूँ, और वो खुद को दोस्त कहने लायक नहीं समझ रहा था।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
नहीं, मैं उठा नहीं। मेरे पैर खुद हिले और मैं खड़ा हो गया, और मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए, और एक पल के लिए मुझे अपने पापा से गुस्सा आया — ऐसा गुस्सा जो पेट से निकलकर गले तक आता है और वहाँ अटक जाता है।
वो सत्ताईस साल से यह ढो रहे थे।
सत्ताईस साल से वो हर सुबह उठते थे, औज़ार पोंछते थे, मेरी माँ के लिए चूल्हा जलाते थे, मेरी फीस के लिए साइकिल ठीक करते थे, और हर शाम गली के मोड़ से लौट जाते थे — क्योंकि उन्हें लगता था कि कहीं कोई उन्हें दोस्त की तरह न देख ले।
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा। "आपका हाथ काँप रहा है।"
"पता है," मैंने कहा।
मीरा उठी और मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। उसने मेरे हाथ नहीं पकड़े। उसने सिर्फ़ इतना कहा, "अंकुश, तुम गुस्सा हो रहे हो। ठीक है। पर सुन लो — उस रात पापा ने तुम्हें नहीं बचाया था। उस रात उन्होंने अपने आप को बचाने की कोशिश नहीं की। वो सिर्फ़ इस फाटक पर आकर खड़े हुए। क्यों आए, यह तुमने सोचा?"
मैंने सोचा। और मुझे कुछ समझ नहीं आया।
"क्योंकि यह फाटक उस ज़मीन से जुड़ा है," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "और उस ज़मीन पर उसका अंगूठा था। वो आया था — माफ़ी माँगने। और उस रात मैंने वो माफ़ी नहीं सुनी, क्योंकि वो बोला ही नहीं। और मैंने पूछा भी नहीं। हम दोनों ने मिलकर सत्ताईस साल की चुप्पी बना दी। और मैं तुमसे यह कह रहा हूँ — इसमें आधा हिस्सा मेरा है।"
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