The Mysterious Bell – Chapter 504
मीरा ने कैमरा उठाया।
"रख," मैंने कहा।
हम तीनों पलटे।
डॉक्टर निहाल इसरानी सामने खड़े थे। एक छोटा बैटरी-लालटेन उनके हाथ में था, जो अभी जल रहा था, हालाँकि उजाला था। वो लालटेन उन्होंने शायद नाली में देखने के लिए उठाया था, और शायद भूल गए।
वो यहीं, पीछे की दीवार के कोने से आए थे। शायद हमें वहाँ से आते देखा था। शायद उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि कोई इस तरफ़ आएगा।
उनका चेहरा — वो चेहरा, जिसके ऊपर आज इतनी झुर्रियाँ हैं, जिसके चश्मे का एक काँच चटका है और जिसका टेप कान पर लिपटा है — अभी एक और चेहरा बन गया था। वही जवान, घबराया लड़का, जिसे मैंने अभी परत में देखा था, जो बड़े कोट में खड़ा था।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। मेरा हाथ अभी भी फाटक पर था।
और फिर उन्होंने धीरे से, इतना धीरे कि मुझे सुनने में दिक़्क़त हुई, कहा —
"तुमने इसे छुआ।"
मैंने हाथ हटाया। फाटक से हाथ हटाया और अपने हाथ को देखा — उँगलियों पर जंग की पतली पपड़ी थी।
"डॉक्टर साहब, मैं…"
"पचास साल में," उन्होंने कहा, "किसी ने इसे छुआ नहीं। मैंने खुद नहीं छुआ। मेरे कहने के बाद भी कोई नहीं छूता। गली के लोग आज भी कहते हैं कि इस फाटक के पीछे कोई बंद है।"
टिंकू घबराकर पीछे हट गया। "उस्ताद…"
"डॉक्टर साहब," मीरा ने आगे बढ़कर कहा, "हम सिर्फ़…"
डॉक्टर इसरानी ने अपना हाथ उठाया, बिना देखे। मीरा चुप हो गई। वो हमारे सामने, एक अजनबी जैसे, कुछ देर चुपचाप खड़े रहे। उनकी लालटेन अब भी जल रही थी, और उसकी लाल रोशनी उनके पैरों पर पड़ रही थी, जैसे खून।
"तुम्हारे हाथ में क्या था?" उन्होंने पूछा।
"घंटी," मैंने सच कह दिया।
उनका सिर हिला — कुछ देर के लिए, बहुत धीरे। "तो तुम्हें दिखा?"
मैं चुप रहा।
"मैंने पूछा, तुम्हें दिखा?"
"दिखा," मैंने कहा।
"क्या दिखा?"
मैंने एक बार मीरा की तरफ़ देखा। उसने आँखों से कहा — 'कह दे।' टिंकू ने मेरा हाथ दबाया।
"सात लोग," मैंने कहा। "सात अंगूठे। और हकीम साहब का लिखा हुआ। फिर आठवाँ आदमी। सफ़ेद टोपी। उसने अपना अंगूठा अलग लग"…लगाया," मैंने कहा। "सात के बाद। आठवाँ।"
डॉक्टर इसरानी ने कुछ नहीं कहा।
"उसका चेहरा साफ़ नहीं था," मैंने आगे कहा। "धुएँ जैसा। जैसे किसी ने गीली मिट्टी से पोंछ दिया हो। पर टोपी दिखी — सफ़ेद टोपी। और हाथ दिखा। उसने स्याही की डिब्बी से लाल रंग लिया और अंगूठा लगाया। सात लोग पहले लगा चुके थे। वो आठवाँ था।"
मैं रुका। साँस सीधी नहीं चल रही थी। घुटने काँप रहे थे और मेरा हाथ मीरा के हाथ पर था — मुझे याद भी नहीं कब पकड़ा।
"और फिर," मैंने कहा, "किसी ने एक पन्ना खींच लिया। काग़ज़ हवा में नहीं उड़ा। खींचा गया। जैसे कोई किसी की जेब से चुपचाप निकाल लेता है। वो पन्ना ईंट के नीचे गया। और उस ईंट के कोने पर एक छोटी लकीर बन गई — बस इतनी सी।"
"लकीर," डॉक्टर इसरानी ने दोहराया। उनकी आवाज़ फटी हुई थी।
"जी। वैसी ही लकीर जो पीले पन्ने के कोने पर मिटाई हुई मिली थी।"
डॉक्टर साहब ने लालटेन नीचे रख दी। फिर पास में पड़े पत्थर के टुकड़े पर बैठ गए — नहीं बैठे, गिर पड़े। जैसे कोई पुराना पेड़ अचानक अपनी जगह छोड़ दे। उनका चश्मा नाक पर फिसल आया, टेप खिंच गया, पर उन्होंने ठीक नहीं किया।
मीरा आगे बढ़ी। "डॉक्टर साहब, पानी…"
"नहीं।" उन्होंने हाथ उठाया। "बैठ जाओ। तीनों।"
हम बैठ गए। टिंकू मेरे पीछे आ गया और मेरी कमीज़ पकड़कर बैठा — कमीज़ के किनारे को इतनी ज़ोर से पकड़ा कि मेरी गर्दन तक खिंची।
पीछे की दीवार, फाटक, सूखी नाली, और वो पुराना डिब्बा जैसा पत्थर — सब चुप थे। दूर अस्पताल के किसी कमरे में एक खिड़की खुली, फिर बंद हुई।
"मैंने यह फाटक कभी नहीं छुआ," डॉक्टर इसरानी ने कहा।
उन्होंने अपनी हथेलियाँ खोलकर घुटनों पर रखीं। साफ़ दिख रहा था कि उनके हाथ में भी वही जंग की पपड़ी थी — नहीं, यह जंग नहीं थी। यह उम्र थी।
"एक बार छूने की हिम्मत की थी। सोचा था, बस हाथ रख दूँ। और उस रात मुझे ऐसा लगा कि फाटक गरम है। जैसे किसी ने अभी अभी उसे छोड़ा हो। मैं भागकर अंदर आ गया। पचास साल में वो इकलौती रात थी जब मैंने अपने ही अस्पताल के पीछे के हिस्से से डरकर भागना सीखा।"
"फिर आपने किसी को बताया नहीं?" मीरा ने पूछा।
"किसे बताता?" उन्होंने उसकी तरफ़ देखा। "यह गली मेरी है। यह अस्पताल मेरा है। मैं ही इसका मालिक हूँ, मैं ही इसका डॉक्टर, मैं ही इसका चौकीदार। जब मालिक खुद डर जाए, तो किसको कहता है?"
मैंने घंटी जेब से निकाली। वो अब भी गरम थी। गरम, और हल्की — जैसे अंदर से कुछ छूट गया हो।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "वो काग़ज़ क्या था?"
कुछ देर वो चुप रहे। फिर उन्होंने उसी तरह कहा, जैसे कोई बहुत पुरानी किताब पढ़ रहा हो और बीच का पन्ना फटा मिल जाए।
"हकीम अली," उन्होंने कहा। "वो मेरे पिता के जितने थे, पर मेरे पिता नहीं थे। मेरे उस्ताद थे। मैं जब पढ़ने के लिए बाहर गया, तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कहा — पढ़कर लौटना, पर लौटते वक़्त अपना लालच घर पर छोड़कर आना। मैं लौटा, और उन्होंने यह ज़मीन मुझे दी।"
"यह ज़मीन खरीदी नहीं थी?" मीरा ने पूछा।
"कौन खरीदता?" वो हँसे — छोटी, चटकी हुई हँसी। "हकीम साहब के पास सोना नहीं था। पास था एक छोटा सा नाम और बहुत सारा यक़ीन। यह ज़मीन चार मालिकों की थी। चारों घर वाले, चारों गली वाले। हकीम साहब ने सबको बुलाया और कहा — मैं यहाँ दवाखाना खोलूँगा। तुम अपना हिस्सा मत दान करो, बस मुझे बैठने दो। और जिस दिन तुम्हारा कोई भूखा मरेगा, मेरा नाम तुम्हारे सामने उजला नहीं रहेगा।"
"फिर वो काग़ज़?"
"वो इसलिए बना," उन्होंने कहा, "क्योंकि एक आदमी ने कहा था — हकीम जी, आप आज हैं, कल नहीं होंगे। फिर यह ज़मीन आपका लड़का बेच देगा और हम क्या करेंगे? तब हकीम साहब हँसे और बोले — लिखवा लो। और उसी शाम उन्होंने कहा कि सिर्फ़ मेरा नाम काफ़ी नहीं, जिस-जिस ने यह ज़मीन दी है, उसका भी अंगूठा लगेगा। तब एक आदमी ने कहा — ऐसा काग़ज़ तो सात जन्मों तक साथ रहेगा। और हकीम साहब ने कहा — तभी तो बन रहा है।"
मैंने घंटी को दोनों हाथों में लिया। वो मेरी हथेली में धीरे से काँप रही थी — बहुत धीरे, जैसे चिड़िया का दिल।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "उस पर सात नाम थे। मैं सात नहीं पढ़ पाया, पर आठवाँ आदमी साफ़ देखा। सफ़ेद टोपी वाला। और वो अलग पन्ने पर लगा रहा।"
डॉक्टर इसरानी ने अपनी जेब से रूमाल निकाला और मुँह पोंछा। रूमाल साफ़ था, पर उन्होंने उसे तीन बार पलटकर मुँह पर लगाया।
"आठवाँ आदमी," उन्होंने कहा, "मुझे याद है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"उस रात देर से आया था। सब अंगूठे लगा चुके थे, हकीम साहब उठने को हुए थे। तभी दरवाज़े पर कोई खड़ा हुआ। सफ़ेद टोपी। मैंने सोचा कोई नौकर होगा, पानी पीने आया होगा। मैंने उसे गिलास बढ़ाया — उसने नहीं लिया। उसने सिर्फ़ हाथ आगे किया। हकीम साहब ने कुछ पूछा भी नहीं। जैसे वो जानते थे कि वो आएगा। और वो काग़ज़ नहीं, अलग पन्ना था। छोटा, मोड़ा हुआ। उसने उसी पर अंगूठा लगाया।"
"क्यों अलग पन्ना?"
"क्योंकि वो चाहता था कि उसका नाम किसी लिस्ट में न रहे। पर उसका अंगूठा फिर भी उस ज़मीन से जुड़ जाए।" डॉक्टर साहब ने सामने फाटक की तरफ़ देखा। "मैं उस वक़्त समझ नहीं पाया था। उम्र कम थी। मैंने पूछा भी नहीं। मैंने उसे गिलास दिया, उसने लिया भी नहीं, और मैं चुप खड़ा रहा।"
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