The Mysterious Bell – Chapter 503
तभी मैंने पहला आदमी देखा। वो फाटक के बाहर से आया — चालीस-पचास साल का, कंधों पर लकड़ी का बोझ, हाथों में बुरादे के दाग़। बढ़ई। उसने मेज़ के सामने खड़े होकर अपना अंगूठा उठाया। हकीम अली ने लाल कटोरी से स्याही लेकर उस पर लगाई, और उसने नीचे के पहले खाने में धीरे से दबा दिया।
"नाम?" डॉक्टर निहाल ने कलम उठाते हुए पूछा।
"बताओ नहीं," हकीम अली ने कहा। "जो अंगूठा लगा रहा है, उसका नाम वो खुद ही अपने बच्चों को बताएगा। यहाँ नाम नहीं, अंगूठा बोलेगा।"
दूसरा आया — मोटा, लाल कुर्ता, हाथ में तराज़ू की चाबी। किराने वाला। तीसरा — पतला, तांगे वाले की टोपी। चौथा — दर्ज़ी, कान पर पेंसिल, कंधे पर नापने का फीता। पाँचवा — हलवाई, हाथ में कड़छी के पुराने जले निशान।
एक-एक करके अंगूठे लगे। मैं गिन रहा था। एक, दो, तीन, चार, पाँच…
छठा आया — बूढ़ा, टोपी आँखों तक, छड़ी के सहारे। उसने अंगूठा लगाया और हकीम अली के कंधे पर हाथ रखा। दोनों ने एक-दूसरे को देखा, बिना कुछ कहे।
और फिर सातवाँ आया।
मैंने उसे बाहर से आते देखा — फाटक के पास, खुली धूप में। कद मझोला, कंधे थोड़े झुके, मैली खाकी कमीज़, और गले में एक पतला धागा जिसमें कुछ छोटा-सा लटक रहा था। दूर से पता नहीं चला क्या। वो चलते वक़्त अपना दायाँ हाथ जेब में रखता था और बायाँ हिलाता था, जैसे एक हाथ से ही चल रहा हो।
मेरा सीना कस गया।
मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था। पर मैंने उसे पहचान लिया। पहचान की भी ज़रूरत नहीं थी। जिस तरह वो मेज़ के सामने रुका, जिस तरह उसने अपना अंगूठा उठाया, जिस तरह उसने हकीम अली की आँखों में देखा — मुझे लगा जैसे मैं आईने में खड़ा हूँ, बस आईना पचास साल पुराना है।
दादा। जगदीश यादव।
उन्होंने अंगूठा लगाया। उतनी ही देर में, जितनी देर में मैं एक कदम चलता हूँ।
डॉक्टर निहाल ने काग़ज़ की तरफ़ देखा और कुछ कहा। हकीम अली ने काग़ज़ को उठाकर हवा में सुखाया, फिर उसे मेज़ पर रखा — ऊपर से नीचे।
और तभी आठवाँ आदमी आया।
वो पहले से ही वहीं था। शायद मेज़ के पीछे खड़ा था, या फाटक के पीछे। मैंने उसे नहीं देखा था, ऐसे जैसे आदमी को कोई न देखे।
सफ़ेद टोपी। जवान। सफ़ेद कुर्ता। हाथ में कुछ नहीं। चेहरा… चेहरा नहीं था।
मैंने आँखें सिकोड़ीं। मैंने अपनी सारी ताक़त उस चेहरे पर लगा दी। पर चेहरा धुएँ जैसा था — जैसे किसी ने काग़ज़ पर पेंसिल से कुछ बनाया हो और फिर उँगली से धुँधला कर दिया हो। आँखें दिखीं, फिर नहीं दिखीं। नाक दिखी, फिर नहीं दिखी। मेरे कानों में एक भनभनाहट शुरू हुई, जैसे कोई पुराना रेडियो खुला छूट गया हो।
वो आगे आया। हकीम अली ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ कहा, पर मुझे आवाज़ नहीं सुनाई — सिर्फ़ होंठ हिले।
वो हाथ बढ़ाकर उसी लाल कटोरी में गया। उसका अंगूठा स्याही में डूबा, और उसने उसे नीचे दबाया… पर जिस खाने में सात अंगूठे थे, वहाँ नहीं। उसने अपना अंगूठा पीले काग़ज़ के आख़िरी कोने पर लगाया, अलग से।
और उसी वक़्त मैंने उसकी उँगली में कुछ देखा।
काली अंगूठी।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मुझे लगा मेरी रीढ़ से कोई ठंडी सुई ऊपर गई हो। यही काली अंगूठी। यही। जो सफ़ेद गाड़ी की खिड़की से दिखती है। जो रज़ा सलीम की उँगली पर है। जिसे उस्ताद ने सलीम अहमद के मुंशी की बताया था। जो कल तक इतिहास में थी और आज… आज भी यहाँ है।
मैं उस आदमी की तरफ़ बढ़ना चाहता था। उसकी टोपी खींचनी चाहता था। पर मैं हिल नहीं सकता था। परत में हम देख सकते हैं, बदल नहीं सकते। यही सबसे बड़ी सज़ा है — देखना और कुछ न कर पाना।
फिर वो आठवाँ अपनी जगह से हटा, और उसके हाथ ने कुछ किया।
मैंने देखा — उसने पीले काग़ज़ के नीचे से एक और पन्ना खींचा। पतला, मुड़ा हुआ, उसी रंग का। वो पन्ना अलग क्यों था, मुझे नहीं पता। पर था।
फिर वो मुड़ा, दो क़दम आगे आया — फाटक की तरफ़। फाटक के नीचे, ईंटों के ढेर के पास, वही ईंट रखी थी, वही टेढ़ी। उसने ईंट उठाई, नीचे की मिट्टी खुरची, वो पन्ना वहाँ रखा, और ईंट उसके ऊपर रख दी। फिर अपने जूते से ईंट को दो बार दबाया।
मैंने सब देखा।
और तभी मुझे लगा कि वो आज़ाद नहीं है। वो किसी के इशारे पर चल रहा है। उसकी पीठ में एक तनाव था — जैसे कोई पीछे खड़ा हो और उसकी रस्सी खींच रहा हो।
वो लौटा, मेज़ के पास आया, और अपनी जेब से कुछ निकाला — कोई छोटी धातु की चीज़। उसने उसे पीले काग़ज़ के बाएँ कोने पर रख दिया, और उस चीज़ से काग़ज़ पर एक छोटी सीधी लकीर खींच दी।
मैं गौर से देखता रहा। मेरी साँस रुक गई थी।
लकीर बन गई। छोटी, हल्की, किसी नाखून या चाकू की नोक से खींची गई, बिल्कुल बाएँ कोने पर।
वही लकीर। जो उस पीले पन्ने पर थी, जो कल रात मेरे पैरों पर गिरा था। जिसे उस्ताद ने मिटाया हुआ बताया था, पर मिटा हुआ नहीं था।
तो यह…
तो वो लकीर किसी की ग़लती नहीं थी। वो निशान था। एक कोने का निशान, जिससे कोई बाद में पहचान सके कि असली काग़ज़ कौन सा है।
मेरे मन में सवाल उठा — आठवाँ पन्ना किसने छिपाया? और क्यों? और उस पन्ने पर क्या था जो मुख्य काग़ज़ पर नहीं था?
मैंने आठवें आदमी को आख़िरी बार देखना चाहा। उसने अपनी टोपी सीधी की। उसका चेहरा अब भी धुएँ जैसा था। इतना ही दिखा कि उसकी दाढ़ी नई कटी थी।
और फिर सब कुछ चटक गया।
जैसे कोई पुराना दर्पण सामने से हटा दिया गया हो। मैं वापस उसी जगह था — फाटक के सामने, शाम की उतरती धूप में, मेरी उँगलियाँ अब भी जंग पर टिकी थीं।
पर मेरे शरीर ने काम करना बंद कर दिया था।
मेरे घुटने मुड़ गए। मेरे कानों में अभी भी भनभनाहट थी। मेरी आँखों के सामने कुछ देर तक केवल पीले और लाल धब्बे घूमते रहे।
मैं गिरता, तभी मेरा हाथ किसी के हाथ में आ गया।
मीरा का हाथ। उसकी उँगलियों में कैमरा था, पर उसने उसे नीचे करके मेरी कलाई पकड़ ली। उसने कुछ कहा, पर मुझे आवाज़ दूर से आती सुनाई दी — जैसे कुएँ के अंदर से।
"अंकुश! अंकुश, आँखें खोल!"
मैंने आँखें खोलीं। मुझे पता भी नहीं था कि मैंने आँखें बंद की थीं।
टिंकू मेरे आगे झुका हुआ था, हाथ में माचिस की डिब्बी कसे हुए। उसका चेहरा सफ़ेद था। "उस्ताद, आपने आँखें खोलीं? बोलिए, आप ठीक हैं? उस्ताद?"
मैंने साँस ली। हवा अंदर गई और बाहर आई। जंग की बदबू फिर से मेरी नाक में आई। यानी मैं लौट आया हूँ।
"सात," मैंने फुसफुसाया। "सात अंगूठे। और आठवाँ… आठवाँ सफ़ेद टोपी में।"
"क्या?" मीरा ने मेरी तरफ़ झुककर कहा। "अंकुश, क्या बोल रहा है?"
"और वो ईंट," मैंने कहा। "वही टेढ़ी ईंट। उसके नीचे…" मैंने अपनी ज़ुबान से होंठ गीले किए। "उसके नीचे एक पन्ना है। आठवाँ पन्ना। वहीं है, मीरा। वहीं रखा है, पचास साल से।"
मीरा ने वही ईंट देखी। वो वहीं थी — टेढ़ी, काई लगी, उखड़ी।
"तो फिर उठा," उसने कहा।
"अभी नहीं," मैंने कहा। "अभी कुछ नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि जिसने वो पन्ना वहाँ छिपाया, वो अभी भी… मतलब… उसकी उँगली में वही काली अंगूठी थी, मीरा। वही अंगूठी।"
मीरा की आँखें बड़ी हुईं। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
और ठीक उसी वक़्त पीछे से किसी की चप्पल की आवाज़ आई।
धीमी। बूढ़ी। सूखी नाली की मिट्टी पर जूते यूँ टिक-टिक करते हैं, जैसे कोई हर क़दम नापकर रख रहा हो।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno