The Mysterious Bell – Chapter 502
सूखी नाली आई। वो नाली जो बरसात में पानी से भर जाती है और बाक़ी महीनों में सूखी पड़ी रहती है। उसके किनारे-किनारे चलने पर जूतों के नीचे सूखी पत्तियाँ चटकती हैं। मैं आगे, टिंकू बीच में, मीरा पीछे। टिंकू हर दो कदम पर पीछे मुड़कर देख रहा था। उसका दुप्पट्टा — माँ का गुलाबी दुपट्टा — उसके गले में उलझा हुआ था और एक सिरा ज़मीन पर घिसट रहा था।
"टिंकू, दुपट्टा उतार। बच्चों के गेट पर अगर कोई बड़ा आया और उसने तुझे ऐसे देखा, तो पहले दुपट्टा पूछेगा, गली बाद में।"
उसने दुपट्टा उतारकर बगल में दबा लिया। "उस्ताद, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"फाटक छूने से क्या होगा?"
मैंने आगे देखा। दीवार का आख़िरी मोड़ आ रहा था, जिसके बाद पीछे का प्लॉट शुरू होता था।
"पुरानी परत, टिंकू। सत्तर अंक का खेल। जब मैं किसी चीज़ को छूता हूँ, तो उसका आख़िरी सच्चा लम्हा मेरे सामने खुल जाता है। जैसे कोई पुराना रेडियो अपने आप बज पड़े — एक ही गाना, एक ही बार।"
"तो फिर फाटक पर आख़िरी सच्चा लम्हा क्या होगा?"
"पता नहीं," मैंने सच कह दिया। "शायद कोई रोया होगा। शायद कोई लिखा होगा। शायद आज से पचास साल पहले कोई इस फाटक को खोलकर अपनी पूरी ज़िंदगी बंद कर गया हो।"
टिंकू ने एक लंबी साँस ली। "उस्ताद, मेरे पास एक तारीख़ वाली माचिस की डिब्बी है, एक चप्पल है, और ग्रीस की डिब्बी है। तीनों काम आएँगे।"
"आज चप्पल नहीं, टिंकू। आज हम सिर्फ़ देखेंगे।"
"देखना भी तो काम है," उसने कहा, और मुझे हँसी आ गई। बच्चा कभी-कभी मुझसे ज़्यादा समझदार निकलता है।
मोड़ के बाद पीछे का प्लॉट खुला। यहाँ से दीवार एकदम पीली दिखती है — उतरी रंग में ईंटों के लाल दाग़। दीवार के साथ-साथ सूखी नाली गई है, ऊपर उखड़ी लोहे की चादरें झूल रही हैं — जिन्हें मनोज के आदमियों ने कल रात उखाड़कर नीचे गिरा दिया था। उससे आगे, बदहाल बाउंड्री के पास, वो फाटक खड़ा था।
तुम सोच रहे होगे कि फाटक में क्या ख़ास है। फाटक तो फाटक होता है। जंग लगा लोहा, दो पल्ले, एक कुंडा जो पचास साल से बंद है।
पर जब मैंने उस फाटक को देखा, तो मेरे पैर अपने आप रुक गए।
वो बहुत बड़ा नहीं था। हाथी दांत जितना… नहीं, ग़लत कहा। दो आदमी एक साथ निकल सकें, इतना। लेकिन उसकी जंग इतनी मोटी थी कि पता नहीं चलता था कि रंग काला है या भूरा। ऊपर एक लोहे की पट्टी थी, जिस पर शायद कभी कुछ लिखा गया था — अब सिर्फ़ खुरचन बची थी। नीचे ईंटों का एक ढेर पड़ा था, जिसमें एक ईंट अलग से टेढ़ी रखी थी। उस ईंट के किनारे पर काई थी, और काई के नीचे शायद कुछ निशान। पता नहीं।
फाटक के आर-पार तीन क़दम पर अस्पताल की पिछली दीवार थी। पीली। उखड़ी हुई। और उस फाटक से एक भी कदम आगे ज़मीन नीची होती थी, जहाँ बरसों से कोई नहीं गया।
"यहाँ से गुज़रने के लिए कोई रास्ता नहीं," मीरा ने कहा। "ये तो बस…"
"ये रास्ता नहीं है।" मैंने उसे देखा। "ये गवाह है।"
टिंकू ने बिना कहे अपनी माचिस की डिब्बी जेब से निकाली और मुठ्ठी में दबा ली। मैंने घंटी निकाली। मेरी जेब में वो अब भी धीरे-धीरे गरम थी जैसे जेब में कोई छोटा जानवर बैठा हो।
"ठीक है," मैंने कहा। "जो होगा, वो मैं देखूँगा। तुम दोनों पीछे खड़े रहना। मीरा, कैमरा बंद रख। अगर कुछ चमके, तो भी मत खोलना। अगर मैं गिरूँ, तो उठाना, पर मेरे सामने आकर मत पूछना कि क्या देखा। मैं अपने आप बताऊँगा।"
"अगर तू अपने आप नहीं बताया तो?"
"तो समझ लेना कि जो देखा, वो बताने लायक़ नहीं है।"
मीरा ने कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गई।
मैंने घंटी हिलाई।
धीरे से बजी। फिर वो आवाज़ आई — छोटी, रूखी, जैसे किसी बूढ़े ने मुँह फेरकर कहा हो।
"सत्तर जाएँगे।"
मेरी जेब में एक सौ अठारह थे। सत्तर जाने के बाद अड़तालीस बचेंगे।
"ठीक है," मैंने कहा।
"देख। बोल मत।"
"नहीं बोलूँगा।"
घंटी फिर बजी — इस बार जैसे किसी ने गहरी साँस ली हो।
"परत खुलेगी।"
मैंने अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाया। फाटक का लोहा ठंडा था — बर्फ़ जैसा नहीं, बल्कि उस ठंडे पानी जैसा जो गर्मी में किसी पुराने कुएँ से निकलता है। मेरी उँगलियाँ जंग पर टिकीं, और जंग की वो खुरदुरी सतह मुझे ऐसे लगी जैसे किसी की सूखी ज़ुबान।
और फिर… सब बदल गया।
पहले आवाज़ें चली गईं। पीछे से आती मीरा की घड़ी की टिक-टिक, टिंकू की साँस, दूर किसी ट्रक का हॉर्न — सब एक झटके में ग़ायब।
फिर एक नई आवाज़ आई।
दोपहर… नहीं, सुबह। सुबह की आवाज़ें — गौरेया, दूर मंदिर की घंटी, और उधर से किसी मस्जिद से अज़ान। दोनों एक साथ। धूप बहुत तेज़ थी — कच्ची, नई, जैसे अभी-अभी निकली हो।
मैं खड़ा था, पर खड़ा भी नहीं था। मुझे लगा जैसे मैं किसी पुराने कमरे में दाख़िल हुआ हूँ जिसकी खिड़कियाँ सालों से बंद पड़ी थीं। खुशबू आई — नई स्याही की, गीली मिट्टी की, तेल की, और हल्की-सी धूप में सूखती घास की।
सामने फाटक खुला था। वो ही फाटक। जंग नहीं थी उस पर। वो लोहे का नहीं लग रहा था — वो पीतल जैसा चमक रहा था सुबह की धूप में। दो पल्ले खुले थे और बीच में से रास्ता साफ़ था, जो सीधे अस्पताल के पिछले आँगन में जाता था।
आँगन में एक लकड़ी की लंबी मेज़ रखी थी। उस पर कपड़ा बिछा था — सफ़ेद, पर उतना साफ़ नहीं। उस पर एक मोटा रजिस्टर, एक कलमदान, एक कटोरी में कुछ लाल-सा, और एक मोटा पीला काग़ज़।
मेज़ के पीछे एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। सफ़ेद दाढ़ी, हुक जैसी नाक, आँखों पर सोने के फ्रेम का चश्मा, कंधे पर हरी शॉल, और हाथ में पुरानी कलम। उसकी उँगलियाँ पतली थीं और नाखून साफ़ थे।
मैंने उसे पहचान लिया — मन से नहीं, पेट से। मेरे पेट में कुछ ऐसा घूमा जैसे कोई चीज़ सालों बाद अपनी जगह पर लौट रही हो।
हकीम अली।
उसके बगल में एक जवान लड़का खड़ा था। दुबला-पतला, कद में मुझसे थोड़ा लंबा, आँखों पर मोटा गोल चश्मा, और शरीर पर सफ़ेद कोट जो उसके नाप से दो साइज़ बड़ा था — जैसे उसने किसी और का कोट पहना हो। उसके हाथ काँप रहे थे।
डॉक्टर निहाल इसरानी। जवान।
मैंने उन्हें देखा और मेरी साँस अटक गई। आज जो डॉक्टर इसरानी मरीज़ देखते हैं और अपना चश्मा कान पर टेप से बाँधते हैं, वो यही लड़का है। यही घबराया हुआ, दुबला लड़का।
हकीम अली ने कलम उठाई और पीले काग़ज़ पर लिखना शुरू किया। लिखते वक़्त वो धीरे-धीरे बोल भी रहे थे — जैसे अपने लिखे को हवा में भी रख रहे हों।
"यह ज़मीन… अस्पताल की।" कलम रुकी। "यह ज़मीन आज से अस्पताल की है, न कि मेरी।"
डॉक्टर निहाल ने हाथ बढ़ाया, पर कुछ कहा नहीं।
"लिख रहा हूँ," हकीम अली ने कहा। "गरीब का इलाज यहाँ कभी बंद नहीं होगा। न सुबह बंद होगा, न शाम। न बारिश में, न लॉकडाउन में, न बीमारी में, न उससे बड़ी किसी बीमारी में।"
उन्होंने कलम रखी और डॉक्टर निहाल की तरफ़ देखा।
"अगर कोई इसे बंद करे, निहाल, तो यह ज़मीन उसकी नहीं होगी। हमारे बच्चों की भी नहीं होगी। किसी की नहीं होगी। यह ज़मीन सिर्फ़ उनकी होगी जो यहाँ इलाज कराने आएँ। समझ रहे हो?"
डॉक्टर निहाल ने सिर हिलाया। उनकी आँखें भरी हुई थीं, और उन्होंने साफ़ किया — "और काग़ज़?"
"काग़ज़ भी उन्हीं का है," हकीम अली ने कहा। "काग़ज़ वो चीज़ होती है जो हम बाद में छोड़ जाते हैं, निहाल। हम नहीं रहेंगे, काग़ज़ रहेगा। इसीलिए इसे सात लोगों के हाथ से गुज़ारना है। सात… वो सात जो यहाँ के हैं। न कोई बाहर का, न कोई बड़ा आदमी। बस वो जो यहाँ खड़े हों।"
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