The Mysterious Bell – Chapter 488
दुबे अंकल ने कुछ नहीं कहा। बस अपनी नीली आस्तीन ठीक की और अपनी कॉपी खोली। उनकी कुर्सी पीछे, थाने के बाहर खाली पड़ी थी, और वो यहाँ खड़े थे — बिना लाठी, बिना वर्दी, सिर्फ़ उस पुरानी नीली शर्ट में। जब वो ऐसे चुप हो जाते हैं, तो समझ लो कि जवाब पीछे है और सवाल आगे।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"रुको!"
बबलू।
उसका मुँह लाल था। पान का दाग़ होंठ के कोने पर, और आँखें ऐसी, जैसे किसी ने उसे नींद से उठा दिया हो।
"ये काग़ज़ मेरी दुकान से चोरी हुआ है!" उसने चीखकर कहा, और उँगली मेरे हाथ की तरफ़ बढ़ा दी। "ये मेरी दुकान का माल है! मैं इसकी शिकायत करूँगा! सब गवाह हैं!"
गली में एक शांति आ गई। वो शांति जो किसी झूठ के बाद आती है — जब सबको पता होता है कि ये झूठ है, पर कोई पहला पत्थर नहीं उठाना चाहता।
और फिर वो आवाज़ आई जो मुझे रोज़ सुबह सुनाई देती है।
क्लिक।
मीरा ने कैमरा ऊपर कर लिया। उसकी लाल बत्ती जल गई, छोटी सी, ठंडी सी, पर उस रोशनी में बबलू का चेहरा कुछ और हो गया।
"फिर से बोलिए," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सिर्फ़ उसके पास है। "कैमरा चालू है। पूरा मोहल्ला सुनेगा। ये काग़ज़ किस दुकान का है? नाम, नंबर, रजिस्ट्री, सब बताइए।"
बबलू का मुँह खुला रह गया।
और तभी शबनम आपा आगे आईं। उनके हाथ में वो लोहे की चिमटी थी, जो आज शाम चूल्हे पर रखी थी, और उसका सिरा अभी भी गरम था — मैं दूर से देख सकता था कि उससे हल्की भाप उठ रही है।
वो चिमटी हवा में घूमी, बिल्कुल धीरे, बिना जल्दी, और बबलू की सोने की चेन के ठीक पास आकर रुकी। इतने पास कि चेन का चौकोर लॉकेट हल्का सा हिल गया और टिक-टिक करने लगा।
"बबलू," शबनम आपा ने कहा, बिल्कुल मीठी आवाज़ में। "ये चिमटी आज बहुत काम कर रही है। रोटी भी पलट रही है, काग़ज़ भी पलट रही है। कहीं आज तेरी चेन पर भी आज़माइश हो जाए, तो बुरा मत मानना।"
बबलू एक कदम पीछे हटा। फिर दूसरा। उसका हाथ अपने आप चेन पर चला गया, जैसे कोई बच्चा अपना खिलौना छुपाता है।
कुछ बच्चे हँसे। बहुत धीरे। पर सबने सुना।
"बस," दुबे अंकल ने कहा। उन्होंने कॉपी पर हाथ रखा। "मैंने कहा था — नाम लिखूँगा, आरोप नहीं। जो बोलेगा, वो अपने नाम से बोलेगा, और अपनी बात पर खड़ा रहेगा। बबलू, तुमने कहा काग़ज़ तुम्हारी दुकान का है। कौन सी दुकान?"
बबलू ने गला साफ़ किया। "मेरी… मेरी दुकान…"
"कौन सी दुकान, भाई?" मैंने कहा। मैंने पन्ना जेब में नहीं डाला। मैंने उसे खुला ही हाथ में रखा, ताकि सब देख सकें कि उसमें क्या लिखा है। "तेरी दुकान कौन सी है? वो गुमटी जहाँ तू बैठकर पान चबाता है? या उन्नीस नंबर? जो पिछले महीने साहब के नाम रजिस्ट्री हो गई? या वो दुकान जिसका शटर तूने खुद बंद करवाया?"
बबलू का चेहरा एक पल के लिए खाली हो गया। सच में खाली। जैसे किसी ने उसके चेहरे से सारे भाव पोंछ दिए हों।
"मैं… मैंने ऐसा नहीं कहा…" वो बड़बड़ाया।
"तूने अभी कहा," सानिया ने पीछे से आवाज़ लगाई। "सबने सुना! मेरे पास लिखा भी है!"
"चुप कर," बबलू ने कहा, पर उसकी आवाज़ में पहले जैसी धौंस नहीं थी।
मैंने एक साँस ली और पन्ना ऊपर उठाया।
"देखो," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ जितनी धीमी कर सकता था, कर दी। "ये पन्ना अभी हवा में उड़ते काग़ज़ों में से गिरा। गोविंद भाई कह रहे हैं कि ये उनके बंडल में नहीं था। मतलब किसी ने इसे बंडल के अंदर रखा। जान-बूझकर। वक़्त से पहले।"
गली में फिर वो शांति।
"किसने रखा?" मीरा ने पूछा, और कैमरा गोविंद भाई की तरफ़ घुमा दिया।
और तभी गोविंद भाई घुटनों के बल बैठ गए।
नहीं, बैठे नहीं। गिरे। जैसे किसी ने उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो। उनके घुटने उस धूल में धँसे, जहाँ अभी काग़ज़ पड़े थे, और उनका एक हाथ उस आधे काग़ज़ पर था जो उन्होंने उठाने की कोशिश में पकड़ लिया था।
"गोविंद भाई!" मैं उनकी तरफ़ बढ़ा।
"मत पूछो," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुरानी अलमारी का दरवाज़ा खुल रहा हो, जो बरसों से बंद था। "मत पूछो, बेटा।"
"पूछना पड़ेगा," दुबे अंकल ने कहा। उन्होंने कॉपी खोली और पेन उठाया।
गोविंद भाई ने अपना चश्मा उतारा। टेप टूट चुकी थी। उन्होंने उसे धोती पर रखा और अपनी आँखें मलीं, जैसे बहुत दिनों बाद दिन की रोशनी देख रहे हों।
"मैंने सिर्फ़ काग़ज़ पकड़ाया था," उन्होंने कहा। "बस पकड़ाया। हाथ आगे किया, काग़ज़ दिया, हाथ पीछे किया। इसमें मेरा कोई मतलब नहीं था।"
"अंगूठा?" दुबे अंकल ने पूछा।
"अंगूठा मेरा नहीं है।"
मीरा ने कैमरा थोड़ा और आगे किया। "गोविंद भाई, आपने सुबह अपने दफ़्तर में अंकुश से कहा था कि अंगूठा आपका है। सोलह साल की उम्र में लगाया था। अब कह रहे हैं कि नहीं है?"
गोविंद भाई ने अपना सिर उठाया। और उनकी आँखों में जो था, वो शर्म नहीं थी। वो डर था। बहुत पुराना, बहुत ठंडा डर, जो सिर्फ़ एक ही तरह से बड़ा होता है — चुप्पी से।
"वो अंगूठा मेरा है," उन्होंने कहा, हर शब्द अलग-अलग रखकर, जैसे कोई टूटे दाँत जोड़ रहा हो। "मैंने सोलह साल की उम्र में लगाया था, ये सच है। मैंने शंकर यादव का अंगूठा भी लिया, ये भी सच है। पर जो अंगूठा इस पन्ने पर है — वो मेरा नहीं है। वो किसी और का है। और उसका नाम…"
वो रुक गए।
"…उसका नाम मैं नहीं ले सकता।"
"क्यों नहीं ले सकते?" मीरा ने पूछा।
गोविंद भाई ने कोई जवाब नहीं दिया। बस अपने होंठ भींच लिए, जैसे किसी ने उनके मुँह पर ताला लगा दिया हो।
मैं उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया। मेरी जीन्स की घुटन की जगह और फट गई, पर अब उसका वक़्त नहीं था।
"गोविंद भाई," मैंने कहा। "मैं आपसे नाम नहीं पूछ रहा। मैं सिर्फ़ इतना पूछ रहा हूँ — डर किस बात का है?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। इतनी देर कि मुझे लगा वो कुछ नहीं कहेंगे। पीछे बबलू का स्कूटर खड़ा था और उसकी चाबी अभी भी घूम रही थी, मैं वो आवाज़ सुन सकता था।
फिर गोविंद भाई ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, और उनमें वो कंपन था जो बुखार का नहीं होता।
"इस पन्ने पर जो अंगूठा है," उन्होंने कहा, इतनी धीमी आवाज़ में कि सिर्फ़ मैं और मीरा का कैमरा सुन सका, "उसके नीचे एक निशान है। छोटा सा। इतना छोटा कि तुमने देखा भी नहीं होगा। मैंने भी आज पहली बार देखा। वो पुरानी चाबी की नोक का निशान है।"
मेरा हाथ रुक गया।
"चाबी?" मैंने कहा।
"पुरानी चाबी," गोविंद भाई ने कहा, और उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया। "जैसी बड़े ताले की होती है। जैसी कोई गले में लटकाकर रखता है, ताकि खो न जाए।"
मैंने पन्ना उठाया। मीरा ने अपने फ़ोन की टॉर्च जलाई और उस पन्ने पर रख दी।
वो निशान था।
बहुत छोटा। अंगूठे के धुँधले निशान के ठीक नीचे, एक कोने में, दो महीन लकीरें — जैसे किसी धातु की नोक को दबाया गया हो। एक लकीर सीधी, और एक उससे ज़रा टेढ़ी। ठीक वैसा ही कोना, जैसा कोई पुरानी चाबी के दाँते का कोना होता है, जब वो काग़ज़ पर दब जाए।
और मेरे गले में, कमीज़ के नीचे, वो चाबी लटकी थी।
जो पापा ने मुझे पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी। जिसके बारे में उन्होंने कभी नहीं बताया कि किस चीज़ की है। जिसे मैं रोज़ नहाते वक़्त भी नहीं उतारता।
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