The Mysterious Bell489 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 489

6 min read November 5, 2026

मेरी जेब में घंटी एक बार हिली। बहुत हल्की। जैसे कोई बूढ़ा आदमी करवट ले।

"निशान पहचाना?" घंटी ने पूछा।

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं सिर्फ़ खड़ा रहा और काग़ज़ को देखता रहा, और मुझे लगा कि जो ज़मीन मैंने आज तक अपने पैरों के नीचे ठोस समझी थी, वो थोड़ी नरम हो गई है।

"अंकुश?" मीरा ने कहा। उसने मेरा चेहरा देखा और उसकी आवाज़ बदल गई। "क्या हुआ? तुम्हारा चेहरा ऐसा क्यों है?"

"कुछ नहीं," मैंने कहा। झूठ। घंटी के सामने नहीं, पर मीरा के सामने मैंने झूठ बोल दिया, और तंत्र का कोई अंक नहीं कटा, क्योंकि ये कोई मरम्मत नहीं थी। बस एक आदमी था, जो अपनी चाबी की तरफ़ देखना नहीं चाहता था।

"अंकल," मैंने दुबे अंकल की तरफ़ मुड़कर कहा। "ये पन्ना आप ले लीजिए।"

"पहले ये बताओ—"

"मैं आपको सब बताऊँगा। कल सुबह दस बजे। साफ़ लिखा हुआ।" मैंने गोविंद भाई की तरफ़ देखा, जो अभी भी घुटनों पर थे। "पर ये अभी यहाँ नहीं रह सकते।"

दुबे अंकल ने गोविंद भाई को देखा। फिर मुझे। उनकी आँखें वो सब कह रही थीं जो वो कभी ज़ुबान से नहीं कहते — कि मैं जानता हूँ बेटा, तुम मुझसे कुछ छिपा रहे हो, और मैं आज जानबूझकर अनजान बना हुआ हूँ।

"ले जाओ," उन्होंने कहा। "पर दो आदमी साथ रखना।"

"आप भेजिए," मैंने कहा।

उन्होंने सिर हिलाया और कॉपी बंद कर दी।

मीरा ने कैमरा बंद नहीं किया। वो रिकॉर्ड करती रही — बिखरे काग़ज़, टूटे चश्मे वाले गोविंद भाई, ज़मीन पर पड़ी लोहे की पट्टी, और वो खाली जगह जहाँ अभी सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी खड़ा था।

और मैंने उसी वक़्त देखा।

भीड़। आधी गली आ चुकी थी — लोग छतों से उतरकर आ रहे थे, दुकानों के शटर आधे खुल रहे थे, नीम के पेड़ के नीचे बच्चे जमा हो रहे थे। और उसी भीड़ के किनारे, नीम के तने के पीछे, एक सफ़ेद बाँह दिखी।

एक पल। दो पल।

फिर कंधा हिला, दो लोग बीच से गुज़रे, और वो जगह खाली हो गई।

"वो—" मैंने कहा, और हाथ उठाया।

"कौन?" मीरा ने पूछा, और कैमरा घुमाया।

पर वहाँ सिर्फ़ लोग थे। मासूम चेहरे। हैरान आँखें। कोई सफ़ेद कुर्ता नहीं।

"भीड़ सबसे अच्छा दरवाज़ा है," घंटी ने फुसफुसाया।

मैंने जबड़े भींचे।

बबलू ने इसी बीच स्कूटर की तरफ़ तीन कदम और बढ़कर फोन निकाला। इस बार उसने पहले जैसे धीरे से नहीं कहा। मैंने सुना, वो अंगूठे से स्क्रीन दबा रहा था, और जैसे ही दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, वो फूट पड़ा —

"साहब, यहाँ सब बिगड़ गया। काग़ज़ गिर गए। भीड़ बढ़ रही है। मीरा का कैमरा चालू है।" वो रुका, कुछ सुना, और फिर गला धीमा करके बोला, "नहीं। वो नहीं है। पर मुनीम बोल रहा है। मुनीम बोलने लगा है, साहब।"

फिर उसने फोन काटा और स्कूटर की तरफ़ देखा, और मुझे लगा कि वो स्कूटर उठाकर भाग जाना चाहता है, पर उसकी टाँगें कहीं और जा रही थीं।

"बबलू," मैंने कहा।

वो नहीं रुका।

"बबलू!" इस बार आवाज़ शबनम आपा की थी, और वो चिमटी उन्होंने वापस उठा ली थी। "इस गली में तेरे स्कूटर की एक आवाज़ भी अब नहीं गिनी जाएगी। पहले ये काग़ज़ उठा। नीचे पड़े हैं। सब उठा। एक भी न छोड़।"

"मैं क्यों उठाऊँ—"

"क्योंकि तूने कहा था कि ये तेरी दुकान का माल है," दुबे अंकल ने शांति से कहा। "तो अपना माल उठा। गिन। और जब गिन ले, तो मेरी कॉपी पर लिखवा — कितने पन्ने हैं। फिर कल अगर एक पन्ना कम निकला, तो जवाब तू देगा।"

बबलू का मुँह फिर खुला रह गया। और ये बात उसके दिमाग़ में जाकर बैठ गई, मैं देख सकता था। वो धीरे से झुका और काग़ज़ इकट्ठे करने लगा — बड़ी मुश्किल से, बड़ी देर से, ऐसे जैसे उसे छूने में उसकी चेन की इज़्ज़त जा रही हो।

बच्चे तो जैसे मेला लग गया। टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — पाँचों झुककर काग़ज़ उठाने लगे, और मैंने देखा कि टिंकू ने चुपके से ज़मीन पर पड़ी वो लोहे की लंबी पट्टी उठा ली और अपने पीछे, कमीज़ के नीचे, कमर में खोंस ली।

"टिंकू," मैंने धीरे से कहा।

"उस्ताद," उसने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा, "ये औज़ार है। औज़ार ज़मीन पर नहीं छोड़ते। आपने ही सिखाया था।"

मुझे हँसी आई। गुस्से के बीच, थकान के बीच, उस लड़के ने मुझे हँसा दिया।

"ठीक है। सँभालकर रख।"

"जी।"

मीरा ने पाँचों की तस्वीर ली। फिर मेरी। फिर गोविंद भाई की।

"अंकुश," उसने कहा, बिल्कुल धीरे, "ये पन्ना किसी ने बंडल में डाला है। मतलब उसको पता था कि बंडल आज खुलेगा। मतलब उसको पता था कि गोविंद भाई आज रात यहाँ आएँगे।"

"हाँ," मैंने कहा।

"मतलब वो हमारे बीच से गुज़रा है। आज। आज शाम।"

"हाँ।"

मीरा ने कैमरा नीचे किया। उसके होंठ सूखे थे।

"मुझे बुरा लग रहा है," उसने कहा।

"मुझे भी," मैंने कहा। "और इसीलिए अब यहाँ खड़े होकर हिसाब नहीं लगाएँगे।"

मैंने गोविंद भाई की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"उठिए," मैंने कहा। "यहाँ नहीं।"

"कहाँ?" उन्होंने पूछा। उनकी आवाज़ बच्चों जैसी हो गई थी।

"भीतर। अस्पताल के पिछले हिस्से से। सूखी नाली वाला रास्ता है, टूटी बाउंड्री के पास से। वहाँ से पीछे के फाटक तक सीधे निकल जाएँगे।"

गोविंद भाई ने मेरा हाथ पकड़ा। उनके हाथ में अब भी वो आधा काग़ज़ था, और उन्होंने उसे अपनी धोती की गाँठ में ठूँस दिया, ऐसे जैसे कोई आदमी अपनी जान कपड़े में बाँध रहा हो।

"मीरा," मैंने कहा। "तुम पीछे चलो। कैमरा चालू रखो। और अगर कोई रास्ता रोके, तो बात मत करना। बस रिकॉर्ड करना। तुम्हारा कैमरा तुम्हारी लाठी है।"

"समझ गई।"

"शबनम आपा।"

"हूँ।"

"आप सामने रहिए। भीड़ आपकी आवाज़ सुनती है। किसी को पीछे न आने दीजिए। अगर बबलू अपना स्कूटर उठाए, तो उसका नाम कॉपी में लिखवा दीजिए।"

"उसका नाम तो मेरी चिमटी में लिखा है," उन्होंने कहा, और चिमटी हवा में घुमा दी।

"टिंकू।"

"जी उस्ताद।"

"तुम सानिया के साथ काग़ज़ गिनो। गिनकर सानिया की कॉपी में लिखो। और उस लोहे की पट्टी को किसी को मत देना। मुझे चाहिए।"

"जी।"

"दुबे अंकल—"

"मैं यहीं हूँ," उन्होंने कहा। और फिर उन्होंने वो कहा जो मुझे उम्मीद नहीं थी। "और अंकुश। तुम्हारे पापा को मैंने अभी बुलाया है। वो आ रहे हैं। तुम्हें उनसे मिलना पड़ेगा। आज रात।"

मेरा पेट एक बार कस गया।

"क्यों?"

"क्योंकि सीढ़ी की चाबी उन्हीं के पास है," दुबे अंकल ने कहा। "और आज रात बारह बजे वो सीढ़ी बंद हो रही है। तुम्हें अंदर जाना है या नहीं, ये तुम तय करोगे। पर बिना चाबी के तुम सीढ़ी तक भी नहीं पहुँचोगे।"

मैंने सिर हिलाया।

"ठीक है।"

और फिर मैं गोविंद भाई को लेकर मुड़ा।

रास्ता वही था जो मैंने सोचा था — दीवार के साथ-साथ सूखी नाली, जिसमें अब सिर्फ़ पुराने पत्ते और टूटी ईंटें थीं। ऊपर अस्पताल की पिछली दीवार, जिस पर आज शाम मज़दूरों ने लोहे की चादरें उखाड़ दी थीं, और उनके नीचे वो अनजान लोहे के रंग की मोटी चीज़ दीवार से बाहर निकली हुई, जिसे मनोज ने साहब का बताया था।

मैंने उसकी तरफ़ देखा और फिर नज़र फेर ली। एक वक़्त में एक ही डर।

गोविंद भाई की साँस तेज़ चल रही थी। मैंने उनका हाथ पकड़ा और धीरे-धीरे चलने लगा। उनके जूते धूल में धँसते थे और वो हर दो कदम पर रुकते थे, जैसे पीछे मुड़कर देखना चाहते हों।

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