The Mysterious Bell – Chapter 487
उन्होंने सिर उठाया।
"मैंने सिर्फ़ काग़ज़ पकड़ाया था," उन्होंने कहा।
"क्या?"
"बस पकड़ाया था। कुछ किया नहीं।"
"किसको पकड़ाया?"
"उसको।" उन्होंने आँखों से इशारा किया।
मैंने पलटकर देखा। सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी अभी भी वहीं खड़ा था। उसकी लोहे की लंबी चपटी पट्टी ज़मीन पर रखी हुई थी — ठीक मेज़ की तरह, दोनों सिरे ज़मीन पर, बीच में उभार। जैसे उसने उसे शुरू से ही एक औज़ार की तरह रखा हो।
वो हिल नहीं रहा था। उसके चेहरे पर कुछ भी नहीं था — न गुस्सा, न हैरानी, न जल्दी। एक साफ़, ठंडा, खाली चेहरा, जैसे किसी दुकान की खिड़की पर पड़ा शीशा।
"बबलू कह रहा है यह काग़ज़ उसकी दुकान से चोरी हुआ," मैंने कहा। "यह सच है?"
गोविंद भाई ने सिर हिलाया। एक बार, बस।
"नहीं।"
"तो फिर?"
"यह पन्ना मेरे बंडल में नहीं था।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने इसे पहले कभी नहीं देखा। मैंने ये पन्ने तुम्हारे लिए निकाले थे — आठवाँ पन्ना, पुराना रजिस्टर, सब कुछ। ये सब वो हैं जो मैंने खुद रखे थे।"
"पर इस पन्ने पर आपका नाम है।"
"हाँ।" उनकी आवाज़ और धीमी हो गई। "और नीचे अँगूठा भी है। पर वो अँगूठा मेरा नहीं है।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया। सच में सन्नाटा — उस किस्म का सन्नाटा जिसमें अचानक किसी की साँस बहुत ऊँची सुनाई देने लगती है।
"क्या मतलब?" मीरा ने पूछा। उसने आगे कदम बढ़ाया, कैमरा अभी भी चालू।
"यह अँगूठा मेरे हाथ का नहीं है," गोविंद भाई ने कहा। "और मैंने यह पन्ना आज से पहले कभी नहीं देखा।"
"तो यह आपके बंडल में कैसे आया?" मैंने पूछा।
वो बोले नहीं।
उन्होंने अपना हाथ उठाया और उसे देखने लगे — जैसे अपनी ही हथेली पहली बार देख रहे हों। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं। बत्तीस साल की मेहनत वाली उँगलियाँ, जिन पर कलम की स्याही हमेशा लगी रहती थी, आज उन पर सिर्फ़ मिट्टी थी।
"गोविंद भाई," मैंने धीरे कहा, "यह अँगूठा किसका है?"
और फिर वो हुआ जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
उनकी आँखें भर आईं।
मैंने उन्हें पहले भी डरा हुआ देखा था — दफ़्तार में, थाने में, तब भी जब उनके हाथ काँपते थे। पर यह डर नहीं था। यह कुछ और था। कुछ ऐसा जो इंसान को बहुत सालों तक चुपचाप अंदर से खाता है।
"मैं उसका नाम नहीं ले सकता," उन्होंने कहा।
"नहीं ले सकते, या नहीं लेना चाहते?"
"दोनों।"
"गोविंद भाई," मैंने कहा, और मैं जानबूझकर उनके सामने घुटने के बल बैठ गया ताकि हमारे बीच कोई ऊँचाई न बचे, "आप सत्ताईस साल से डर में जी रहे हैं। मैंने आपका डर देखा है। आज रात आप खुद यहाँ आए — कोई आपको खींचकर नहीं लाया। आपने खुद बंडल खोला। अब सिर्फ़ इतना बताइए — डर किस बात का है?"
वो एक पल चुप रहे। इतनी दूर कहीं, अस्पताल के अंदर, कोई खिड़की खुली और बंद हो गई।
फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, काँप रही थीं, और उनमें इतनी ताक़त नहीं थी कि मेरी कलाई को दबा सकें।
"डर इस बात का नहीं है कि वो मुझे क्या करेगा," उन्होंने कहा। "डर इस बात का है कि जिस काग़ज़ पर यह अँगूठा है, उस काग़ज़ को चलाने वाले हाथ आज अब नहीं हैं। और जो उस अँगूठे के नीचे की ज़मीन का हिसाब जानता है, वो या तो मर गया, या चुप हो गया, या—"
"या?"
वो रुके। उन्होंने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा। फिर ज़रा सा झुककर, इतने धीरे से कहा जैसे बीमार आदमी अपनी बीमारी का नाम बता रहा हो, जिसे वो बरसों से छिपा रहा हो —
"उस अँगूठे के नीचे चाबी की नोक का निशान है। पुरानी चाबी। छोटी सी। खुरदुरी नोक। जैसे किसी ने अँगूठा लगाने से पहले चाबी को स्याही में डुबोया हो, और फिर वहाँ दबा दिया हो।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
मैंने अपनी गर्दन पर हाथ रखा।
चाबी मेरी उँगलियों के नीचे ठंडी थी। वही पुरानी चाबी जो पापा ने मुझे पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी। वही जिसके बारे में उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा था — "संभालकर रखना। जब समय आएगा, तब बताऊँगा।"
मैंने उसे उँगली से छुआ और फिर मैंने फिर उस अँगूठे को देखा।
अब मुझे भी कुछ दिख रहा था। नीली स्याही के नीचे, अँगूठे के ठीक बीच में, एक छोटा सा गहरा धब्बा। जैसे कोई नोक दबी हो। मैंने पहले उसे स्याही का गाढ़ापन समझा था।
वो नहीं था।
"कौन सी चाबी?" मैंने पूछा। मैंने अपनी आवाज़ में सिर्फ़ उतनी ज़िंदगी डाली जितनी ज़रूरी थी।
"मैं नहीं बोलूँगा।" उन्होंने सिर हिलाया। "अभी नहीं। यहाँ नहीं।"
"गोविंद भाई—"
"अंकुश बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मुझे रोक गया, "मैं सत्ताईस साल एक ही कमरे में बैठा हूँ। जो चीज़ मैं इतने साल छिपा सका, वो मैं अभी रात को, इस भीड़ में, खड़े-खड़े नहीं कह सकता।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
और ठीक उसी वक़्त भीड़ में हलचल हुई।
मैंने सिर उठाया। सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी वहाँ नहीं था।
मैं उठ खड़ा हुआ। चारों तरफ़ देखा। उसकी लोहे की पट्टी अभी भी ज़मीन पर पड़ी थी — पर आदमी जा चुका था। भीड़ के बीच से, किसी के कंधों के पीछे से, इस तरह चला गया कि किसी की नज़र उस पर नहीं पड़ी।
"अरे वो—" मैंने कहा, और उँगली उठाई। "वो गया!"
मीरा ने चारों तरफ़ देखा, कैमरा घुमाया।
"कहाँ से गया?" उसने कहा, हैरानी से। "मैं यहीं खड़ी थी! मैंने तो देखा ही नहीं!"
"मैंने भी नहीं," शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार झुँझलाहट आई। "ये क्या जादू है? आदमी अपनी लोहे की पट्टी छोड़कर भागे, और कोई देखे भी नहीं?"
बबलू भी पीछे हट गया था। मैंने देखा उसने अपना फोन निकाला और एक नंबर पर लगा दिया। कान पर रखते वक़्त उसके हाथ हल्के काँप रहे थे। और फिर मैंने सुना — वो धीरे से, बहुत धीरे से कह रहा था —
"हाँ। हाँ। अभी। तुरंत।"
फिर उसने फोन जेब में डाला और स्कूटर की तरफ़ पीठ कर ली, जैसे किसी को देखना नहीं चाहता हो।
मुझे पता था वो किसको बुला रहा है।
"अब सुनो," दुबे अंकल ने कहा। उन्होंने कॉपी खोली और उसमें नीली स्याही वाली एक लाइन खींची। "यहाँ बहुत लोग हैं। मैं एक-एक करके नाम लिखूँगा। कोई मारपीट नहीं होगी, कोई भागेगा नहीं, कोई आरोप नहीं लगाएगा।"
"अंकल," मैंने कहा, "आप नाम लिखिए, मैं इन्हें अंदर ले जा रहा हूँ।"
"क्यों?"
मैंने गोविंद भाई की तरफ़ देखा। वो अभी भी घुटनों पर थे, और उनके हाथ में बस आधा काग़ज़ बचा था, जो उन्होंने उठाने की कोशिश में पकड़ लिया था।
"क्योंकि अगर मैंने इन्हें यहाँ छोड़ा," मैंने कहा, "तो जो भी आने वाला है, वो पहले इन्हें उठाएगा। और जो एक बार उठा लिया जाए, गोविंद भाई, वो फिर कुछ नहीं कहता। आप जानते हैं ना?"
गोविंद भाई ने मेरी तरफ़ देखा और हल्का सा सिर हिलाया।
दुबे अंकल मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर गोविंद भाई को देखा। फिर अपनी कॉपी में कुछ लिखा और धीरे से कहा —
"ले जाओ। पर सुबह दस बजे मेरे पास। सबके सामने। साफ़ लिखा हुआ।"
"साफ़ लिखा हुआ," मैंने दोहराया।
"और अंकुश—" उन"और अंकुश—" उन्होंने मेरी तरफ़ उँगली उठाई, और वो उँगली हवा में रुक गई, जैसे कोई शब्द तोल रहा हो। "वो पन्ना मेरे हाथ में दो।"
मैंने पन्ना सीने से लगा लिया।
"अंकल, ये पन्ना मैं आपको दूँगा," मैंने कहा। "पर पहले ये बताइए, आप यहाँ कैसे? किसी ने खबर की थी ना?"
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