The Mysterious Bell – Chapter 484
"बहुत बढ़िया। सानिया आएगी तो मेरी फ़िक्र तीन गुनी हो जाएगी।"
वो हँसा और रिम उठाकर अंदर रख दी।
आठ बजते-बजते मीरा आई। उसके कंधे पर वही फटा बैग, गले में कैमरा, और चेहरे पर वो भाव जो रोज़ सुबह आता है — जैसे दुनिया में अभी भी एक खबर बाकी है जो उसने नहीं लिखी।
"सुन, आज रात बारह बजे अस्पताल के पीछे वाले लोहे के फाटक पर गोविंद भाई मिलेंगे," मैंने सीधे कहा।
उसने कैमरा मेज़ पर रखा और मेरी तरफ़ देखा।
"सीधे शुरू कर दिया? कोई 'गुड मॉर्निंग' नहीं, कोई चाय नहीं?"
"चाय बन रही है। और सुबह के नौ बज चुके हैं, गुड मॉर्निंग का वक़्त निकल गया।"
वो बैठ गई और मैंने उसे सब कुछ बताया — सात पन्ने, आठवाँ कटा पन्ना, गोविंद भाई का अँगूठा, सोलह साल की उम्र, मुफ़्त दवा का लालच, और सत्ताईस साल का वो गुनाह जो वो अब कंधे से उतारना चाहते हैं।
मीरा ने बीच में एक बार भी टोका नहीं। यही उसकी आदत है — जब बात गंभीर हो तो वो पत्रकार नहीं रहती, सिर्फ़ सुनने वाली लड़की बन जाती है।
"और उसने कहा कि काग़ज़ उसके दफ़्तर से कभी बाहर नहीं गया?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"तो भेजने वाला अंदर का आदमी है।"
"यही मैंने भी सोचा।"
उसने अपनी कॉपी निकाली और कुछ लिखा। फिर कलम रोककर बोली, "अंकुश, एक बात अजीब लग रही है।"
"सिर्फ़ एक?"
"मत मज़ाक कर।" उसने कॉपी बंद की। "जो आदमी सत्ताईस साल से एक अँगूठा छिपाकर बैठा है, वो आज रात अचानक सब कुछ लेकर आने को तैयार क्यों हो गया? सिर्फ़ इसलिए कि तूने पन्ना दिखा दिया?"
मैं कुछ देर सोचता रहा।
"नहीं," मैंने कहा। "इसलिए कि उसने पहली बार खुद को आईने में देखा। आदमी अपनी गलती तब छिपाता है जब उसे लगता है कि वो गलती उसका पूरा चेहरा है। जिस दिन उसे समझ आ जाए कि गलती चेहरा नहीं, सिर्फ़ एक दाग़ है — उस दिन वो उसे दिखाने लगता है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं बोली। पर उसकी आँखों में वो बात थी जो वो कभी ज़ुबान से नहीं कहती।
दस बजे पीपल के नीचे रज़ा सलीम रजिस्टर लेकर आया। उस्ताद भी आए, बिना चश्मे के, आँखें सिकोड़कर। रज़ा ने रजिस्टर खोला, सातवाँ नाम पढ़ा — जगदीश यादव — और फिर उसने वही बात दोहराई जो वो कल से कह रहा था, कि असली पन्ना उसके पास है और वो उसे सही वक़्त पर, सही तीन आदमियों के सामने खोलेगा।
"आज रात के बाद," उसने कहा और रजिस्टर बंद कर दिया।
"क्यों आज रात के बाद?" मैंने पूछा।
"क्योंकि आज रात तक कुछ लोग ये सोच रहे हैं कि वो रजिस्टर अभी भी उनकी जेब में है," उसने कहा। "उन्हें पता चल जाए कि नहीं है, तो वो जल्दबाज़ी करेंगे। जल्दबाज़ी में आदमी अपनी ही बात फैला देता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। ये आदमी अपने बाप के मुंशी का बेटा है, पर बातें ऐसी करता है जैसे गली के बुढ़ापे ने उसे पाला हो।
दिन भर मैं कुछ और नहीं कर पाया। दो साइकिलें ठीक कीं, एक बच्चे की चप्पल का सोल जोड़ा जो कोई नहीं जोड़ता, और तीन बार घंटी की तरफ़ देखा। वो चुप थी। बिल्कुल चुप।
शाम छह बजे के आसपास आसमान का रंग बदला और गली में वो पीली रोशनी फैल गई जो हर शाम आती है — जैसे कोई बूढ़ा आदमी दिन भर की थकान उतारने के लिए अपनी आँखें धीरे से बंद कर रहा हो।
तभी मेरा फोन बजा।
काजल का नाम देखकर मेरा हाथ एक पल के लिए रुक गया।
"भैया?"
उसकी आवाज़ में वो डर था जो उसे कभी नहीं आता। काजल वो लड़की है जो साँप देखकर भी पहले यह पूछती है कि कहाँ गया। उसकी आवाज़ काँपे, ये अच्छी बात नहीं।
"बोल, क्या हुआ?"
"भैया, अस्पताल की मुख्य सीढ़ी आज रात बारह बजे के बाद बंद कर दी जाएगी।"
"बंद क्यों?"
"मरम्मत के नाम पर। नीचे बोर्ड लगा है। और भैया…" उसकी आवाज़ और धीमी हो गई। "माँ की नई दवा ऊपर वाले कमरे में फँसी है। जो खेप आई थी, वो ऊपर के स्टोर में रखी है। नीचे की खिड़की वाले कहते हैं कि ऊपर का स्टोर अब किसी और के हिसाब में आ गया है।"
मैं खड़ा हो गया।
"कितनी दवा बाकी है?"
"कल की सुबह तक।" उसकी साँस टूट रही थी। "और भैया, सीढ़ी बंद हो गई तो ऊपर का कमरा खुलेगा कैसे? वो काग़ज़ पर लिखा है — बारह बजे के बाद सीढ़ी पर ताला।"
"तू वहीं है?"
"हाँ। माँ के पास। वो सो गई हैं।"
"कुछ मत करना," मैंने कहा। "न किसी से झगड़ना, न किसी से मिनत। बस उस सीढ़ी के नीचे बैठी रहना और देखती रहना कि कौन आता है। मैं आ रहा हूँ।"
फोन रखा तो मीरा दरवाज़े पर खड़ी थी।
"अस्पताल?" उसने पूछा।
"अस्पताल।"
"मैं चलूँ?"
"तू तो चलेगी ही। इसीलिए तो मैंने तुझे बताया था।"
उसने बैग उठाया और हम निकल पड़े।
रास्ते में साइकिल पर मैंने कुछ नहीं कहा, और मीरा ने भी नहीं। कभी-कभी दो आदमियों के बीच चुप्पी भी एक तरह की बातचीत होती है — जिसमें एक कहता है कि मैं डरा हुआ हूँ, और दूसरा कहता है कि मैं जानता हूँ।
अस्पताल पहुँचे तो शाम की रोशनी में पीली दीवारें और पीली लग रही थीं, जैसे बुखार में पड़ा कोई बूढ़ा आदमी। गेट के बाहर वही नीला बोर्ड लगा था जिसे मैं कल देखकर आया था, और उसके नीचे एक नई पीली पट्टी चिपकी थी — जिस पर आज रात बारह बजे से सीढ़ी बंद रहेगी, ऐसा लिखा था।
गली में आज अजीब सन्नाटा था। वो सन्नाटा नहीं जो रात से आता है, वो सन्नाटा जो लोगों के जान-बूझकर चुप हो जाने से आता है। शबनम आपा की गुमटी खुली थी, पर उसके आगे कोई बैठा नहीं था। उस्ताद की दुकान का शटर आधा गिरा था। भोला भाई की दुकान पर बत्ती जल रही थी, पर वो बाहर नहीं थे।
अस्पताल के गेट के अंदर घुसते ही मुझे वो आदमी दिखा।
सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लोहे की लंबी चपटी पट्टी, और सीढ़ी के नीचे खड़ा। वो कोई जल्दी में नहीं था। वो वैसे खड़ा था जैसे कोई आदमी अपने ही घर के दरवाज़े पर खड़ा हो और मेहमान का इंतज़ार कर रहा हो।
और उसके थोड़ा पीछे, दीवार की परछाईं में, एक मोटा शरीर हिल रहा था। गले में सोने की चेन, हाथ में पानदान। बबलू।
मेरा हाथ अपने आप साइकिल के हैंडल पर कस गया।
"देखा?" मीरा ने धीरे से कहा, बिना होंठ हिलाए जैसे।
"देखा।"
"दोनों यहाँ हैं।"
"हाँ।"
"तो फिर गोविंद भाई पीछे के फाटक तक आएँगे कैसे?"
अच्छा सवाल था। और सच कहूँ तो उस वक़्त मेरे पास इसका जवाब नहीं था।
मैंने अस्पताल के बगल से घूमकर पीछे का रास्ता लिया। वो रास्ता सीधा नहीं है — दीवार के साथ-साथ सूखी नाली है, फिर एक टूटी बाउंड्री, फिर वो लोहे का पुराना फाटक जहाँ से ट्रक आते हैं।
फाटक के पास पहुँचकर मैंने साँस रोक ली।
वहाँ, ठीक फाटक के सहारे, गोविंद भाई खड़े थे। सीने से एक मोटा बंडल चिपकाए, काँधे झुके, और हाथ इतने काँप रहे थे कि बंडल भी उनके साथ काँप रहा था। उनके चश्मे पर टेप उतर आई थी और वो उसे सीधा करने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे।
मैंने एक कदम बढ़ाया।
और तभी बबलू की आवाज़ आई।
"अरे मुनीम जी! इतनी रात, इतनी दूर, इतने काग़ज़?" उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो चाकू से पहले आती है। "कहिए, ये किसका हिसाब लेकर आए हैं?"
वो फाटक के रास्ते पर आकर खड़ा हो गया। बीच में। ऐसे खड़ा हुआ जैसे कोई दरवाज़ा खुद इंसान बन गया हो।
गोविंद भाई ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो बच्चों की आँखों में होता है — जब उन्हें पता हो कि मार पड़ेगी, पर भागना नहीं आता।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno