The Mysterious Bell485 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 485

7 min read November 5, 2026

और मैं समझ गया कि आज रात काग़ज़ हाथ से हाथ तक पहुँचाना है, तो रास्ता बनाना पड़ेगा। मार से नहीं। शोर से।

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

पीपल की चबूतरी के पीछे, दीवार की आड़ में, पाँच सिर उभरे थे। टिंकू सबसे आगे, हाथ में पुरानी रिम। उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — जैसे कोई बिल्ली के बच्चे हों जो माँ के इशारे का इंतज़ार कर रहे हों।

मैंने बिना हाथ हिलाए, बस आँख से इशारा किया। और मैंने दो उँगली ऊपर उठाईं — मतलब, शोर।

टिंकू ने सिर हिलाया। और उसके चेहरे पर वो हँसी आई जो मुझे बहुत पसंद है — वो हँसी जो कहती है, उस्ताद, आप देखिए अब।

अगले ही पल गली में एक चीख गूँजी।

"अरे! बॉल! बॉल! कहाँ गई?"

और फिर चार आवाज़ें एक साथ।

"मेरी है!"

"तेरी कहाँ है, तूने तो छोड़ी ही नहीं!"

"अरे वो खिड़की में गई!"

"नहीं, उस आदमी के पैरों के पास गई!"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो अपने होंठ काट रही थी, हँसी रोकने के लिए।

बच्चे दौड़कर आए। असली में दौड़ने का नाटक किया। पाँचों बबलू के चारों तरफ़ घूमने लगे, झुक-झुककर ज़मीन देखने लगे, एक-दूसरे को धक्का देने लगे, और इतना शोर मचाया कि अस्पताल की खिड़की से किसी ने बाहर झाँककर देखा।

"हटो, हटो!" बबलू ने हाथ हिलाया। "यहाँ क्रिकेट नहीं खेलते!"

"तो कहाँ खेलें, काका?" टिंकू ने बड़ी मासूम आवाज़ में पूछा। "गली में जगह नहीं है, स्कूल का गेट बंद है, अस्पताल के पीछे तो खाली है।"

"तो वहाँ जाओ!"

"वहीं तो जा रहे हैं!" गुड्डू चिल्लाया। "पर बॉल उधर गई है!"

और चिंटू ने ऐसा लंबा हाथ फैलाया जैसे वो सच में बॉल पकड़ने जा रहा हो, और उसका हाथ ठीक बबलू की चेन से टकरा गया।

चेन हिली। सोने का चौकोर लॉकेट टिक-टिक बजा।

बबलू की आँखें एक पल के लिए तनीं, फिर ढीली पड़ गईं। वो बच्चों पर चिल्लाना चाहता था, पर इतने बच्चों पर एक साथ चिल्लाना मुश्किल होता है — किसी एक को पकड़ो तो बाकी चार भाग जाते हैं, और चार भागें तो सारी गली देख लेती है। बबलू जितना बेवकूफ़ है, उतना नहीं है।

और तभी एक और आवाज़ आई।

"अरे बबलू भाई! आप यहाँ?"

शबनम आपा। हाथ में वही लोहे की चिमटी, जो अभी-अभी आग पर से उठी थी, और उसका सिरा अब भी धुआँ छोड़ रहा था। साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, चेहरे पर वो मुस्कान जो किसी औरत के चेहरे पर सिर्फ़ तब आती है जब उसे पता हो कि सामने वाला उससे नहीं जीतेगा।

"आपको देखकर लगा कहीं से चाय पीकर जाएँ। इतनी ठंडी हवा में बिना चाय के खड़े होना ठीक नहीं।"

"आपा, मेरा काम—"

"काम तो मेरा भी है," उसने चिमटी हिलाई। "मुझे आपसे एक बात पूछनी है। आपने कल उस चूड़ी वाली बाई की दुकान का शटर क्यों गिरवाया?"

"मैंने क्या—"

"अरे, मैं आपको इल्ज़ाम नहीं दे रही। मैं तो बस पूछ रही हूँ।" उसने चिमटी से हवा में एक छोटा गोला बनाया। "चलिए, मेरी गुमटी पर बैठिए। दो मिनट की बात है।"

"आपा—"

"दो मिनट," उसने दोहराया, और इस बार उसकी आवाज़ में चिमटी जैसी गरमी थी।

बबलू एक पल रुका। उसकी नज़र एक बार गोविंद भाई पर गई, एक बार चिमटी पर, और एक बार बच्चों पर जो अब भी उसके आस-पास घूम रहे थे और "बॉल, बॉल" चिल्ला रहे थे।

वो हटा।

एक कदम। दो कदम। और रास्ता खुल गया।

मैंने गोविंद भाई की तरफ़ देखा और आँख से कहा — अब।

वो आगे बढ़े। उनके पैर काँप रहे थे, पर चल रहे थे। बंडल उनके सीने से चिपका था, और उनकी दोनों बाहें उसे ऐसे जकड़े हुए थीं जैसे कोई माँ अपने बच्चे को जकड़ती है।

मैंने भी एक कदम आगे बढ़ाया।

दो कदम।

पाँच कदम का फ़ासला रह गया। चार।

और तभी मेरी घंटी — जो मेरी जेब में थी — बिना बजे काँपी।

एक झटका। छोटा सा। जैसे किसी ने दूर से दरवाज़ा खटखटाया हो।

मैंने पलटकर देखा।

दीवार के उस पार से, अस्पताल की कोने वाली दीवार के पीछे से, एक सफ़ेद कुर्ता निकला।

वही आदमी। वही जो सीढ़ी के नीचे खड़ा था। मतलब वो वहाँ से चला आया था — बिना आवाज़, बिना जल्दी, और हमें पता भी नहीं चला।

वो सीधा गोविंद भाई की तरफ़ बढ़ा।

"मुनीम जी," उसने कहा। आवाज़ बहुत शांत थी। "इतना भारी बंडल? लाइए, मैं सँभाल लेता हूँ।"

और उसने हाथ बढ़ाया।

गोविंद भाई ने बंडल पीछे किया।

"नहीं—"

"मुनीम जी, आप थक गए हैं।"

"नहीं!"

पर उस आदमी का हाथ पहुँच गया। उसने बंडल के ऊपर की गाँठ पकड़ी। गोविंद भाई ने खींचा। उसने खींचा।

और फिर वो हुआ जो काग़ज़ों के साथ होता है।

गाँठ खुल गई।

सूती कपड़ा हवा में फटा, और उसमें से काग़ज़ निकले — दर्जनों काग़ज़, हवा में खुले, ऊपर उड़े, और फिर धीरे-धीरे गिरने लगे। पुराने पीले काग़ज़, मुड़े कोने, नीली स्याही, लाल मुहरें, कुछ फटे, कुछ सिले, कुछ ऐसे जिन पर धूल की परत थी।

वो पल अजीब था। हवा में काग़ज़ उड़ते देखकर ऐसा लगा जैसे किसी बूढ़े आदमी की पचास साल की चुप्पी एक साथ टूटकर हवा में बिखर गई हो।

मीरा ने चीख मारी और अपने कैमरे की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

बबलू ने मुड़कर देखा, और उसका मुँह खुला रह गया।

शबनम आपा की चिमटी हवा में रुक गई।

बच्चे भी रुक गए। टिंकू का मुँह खुला रह गया और उसके हाथ से वो पुरानी रिम ज़मीन पर गिर गई।

और मैं? मैं हाथ फैलाकर खड़ा था, पर मेरे हाथ तक कुछ नहीं पहुँचा। काग़ज़ हवा में थे, मेरे सिर के ऊपर, मेरे आस-पास।

फिर एक पन्ना आया।

वो धीरे-धीरे नहीं गिरा। वो सीधा नीचे आया, जैसे किसी ने उसे मेरे लिए ही छोड़ा हो, और मेरे पैरों पर आकर पलट गया।

मैंने झुककर उसे उठाया।

वो पीला था। किनारों से थोड़ा जला हुआ। ऊपर की तरफ़ नीली स्याही में एक नाम लिखा था।

गोविंद भाई।

और उसके नीचे, बीच में, एक धुँधला अँगूठा — वही अँगूठा जो मैंने सात पन्नों वाली फाइल के पहले पन्ने पर देखा था। वही धुँधला, वही मिटता हुआ, वही फीका।

मैंने पन्ना ऊपर उठाया।

गोविंद भाई ज़मीन पर बैठे थे, हाथ में एक आधा काग़ज़ पकड़े, और उनके चश्मे की टेप पूरी खुल चुकी थी।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में वो डर नहीं था जो सत्ताईस साल से था। उसमें कुछ और था।

"अंकुश," उन्होंने कहा, इतनी धीमी आवाज़ में कि सिर्फ़ मैं सुन सका। "ये पन्ना वो नहीं है।"

"क्या?"

"ये पन्ना मेरे बंडल में नहीं था।"

और ऊपर, सीढ़ी की तरफ़ से, किसी ने बहुत धीरे से कहा — "अब शुरू होगा असली हिसाब।"

मैंने सिर उठाया।

सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी अपनी लोहे की पट्टी मेज़ की तरह ज़मीन पर रख रहा था, और उसके पीछे, दीवार की परछाईं में, बबलू का स्कूटर चुपचाप खड़ा था — जैसे वो भी कुछ सुन रहा हो।

हवा में अब भी काग़ज़ तैर रहे थे।

और मेरी जेब में घंटी एक बार फिर काँपी — धीरे से, जैसे किसी बूढ़े आदमी ने नींद में करवट बदली हो।

॥

काग़ज़ हाथ में था और मेरी जेब में घंटी धीरे-धीरे काँप रही थी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सपने में करवट बदल रहा हो।

मैंने पन्ने को आँखों के सामने उठाया।

पीला काग़ज़। किनारों से हल्का जला हुआ, जैसे किसी ने उसे आग के पास से झटके में खींचा हो। ऊपर नीली स्याही में एक नाम — गोविंद भाई। और नाम के ठीक नीचे, बीच में, एक धुँधला अँगूठा। वही जो सात पन्नों वाली फाइल के पहले पन्ने पर था। वही फीका, वही मिटता हुआ, वही ऐसा जैसे किसी ने अँगूठा लगाया हो और फिर शर्म से उसे पोंछने की कोशिश की हो।

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