The Mysterious Bell483 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 483

6 min read November 5, 2026

मैंने कुछ नहीं कहा।

"तुम्हारे पास सात पन्ने हैं।"

"हाँ।"

"आठवाँ कटा हुआ है।"

"हाँ।"

"वो आठवाँ मेरे पास है।"

मैं रुक गया।

"क्या?"

"नहीं। ऐसे नहीं कहूँगा।" उन्होंने कुर्सी के हत्थे को पकड़ा। "अंकुश, ये दीवारें पतली हैं। यहाँ जो बोला जाए, वो दीवार सुन लेती है। मैं इस कमरे में कुछ नहीं बोलूँगा। मैं नहीं चाहता कि कल सुबह मेरी बही उठे और उसमें कोई नया काग़ज़ पड़ा मिले।"

"तो बाहर?"

"बाहर भी नहीं। यहाँ की हवा भी साहब की है।"

"फिर?"

वो उठे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर दरवाज़े की तरफ़, फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनका हाथ ठंडा था, और काँप रहा था।

"आज रात," उन्होंने फुसफुसाया। "अस्पताल के पीछे वाला फाटक। जहाँ से ट्रक आते हैं, वो पुराना लोहे का फाटक।"

"उस फाटक पर तो कोई नहीं जाता।"

"इसीलिए वहाँ बुला रहा हूँ। मैं बारह साल से वहाँ से गुज़रता हूँ और कोई मुझसे नहीं पूछता कि तुम कहाँ जा रहे हो।"

"अकेले आऊँ?"

उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा और मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ी गलती की हो।

"अकेले?" उन्होंने कहा। "नहीं। अकेले बिल्कुल नहीं।"

"तो किसको लाऊँ?"

"उस लड़की को लाओ। जो कैमरा लेकर घूमती है। मीरा।"

"मीरा?"

"हाँ।" उन्होंने अपना चश्मा उठाया और फिर बिना लगाए उसे हाथ में पकड़े रहे। "अंकुश, सुनो। मैं तुम्हें एक बात बता रहा हूँ, और मैं चाहता हूँ कि तुम इसे अपने अंदर दो बार दोहरा लो।"

"कहिए।"

"वो आठवाँ पन्ना, जो कटा हुआ है — उसमें हकीम साहब के दफ़्तर का हिसाब नहीं है। उसमें असली अँगूठा है। और उस अँगूठे के नीचे एक नाम है। जो पचास साल से बदला नहीं है।"

मेरी साँस रुक गई।

"किसका नाम?"

"जो अभी नहीं बोलूँगा।"

"गोविंद भाई—"

"अभी नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ इतनी साफ़ थी जैसे कमरे का पंखा रुक गया हो। "क्योंकि ये सच अब काग़ज़ में नहीं बचा। काग़ज़ सबने देख लिया। काग़ज़ अब सबका है, इसलिए काग़ज़ अब किसी का नहीं है।"

"तो फिर कहाँ बचा है?"

उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने आख़िर वो सवाल पूछ ही लिया जो पूछना था।

"गवाही में," उन्होंने कहा। "सिर्फ़ गवाही में। और मैं एक है। तुम दूसरे हो। मीरा तीसरी है।"

वो खिड़की की तरफ़ गए। उस छोटी सी खिड़की से भवन के पीछे का हिस्सा दिखता था — सफ़ेद दीवार, एक टूटी सीढ़ी, और ऊपर की मंज़िल की एक खिड़की पर लगा हुआ रोशनदान। उन्होंने उस खिड़की की तरफ़ देखा और अपनी आवाज़ और नीची कर दी।

"आज रात बारह बजे। अस्पताल का पिछला फाटक। जो सीढ़ी बंद हुई है ना, उसके पीछे वाला रास्ता। वहाँ अंधेरा रहता है, वहाँ कोई पहरा नहीं। मैं वहाँ तीन चीज़ें लाऊँगा — आठवाँ पन्ना, एक रजिस्टर जो कभी दफ़्तर से बाहर नहीं गया, और अपने हाथ।"

"अपने हाथ?"

"उस दिन मैं स्याही की डिब्बी लेकर बैठूँगा," उन्होंने कहा। "और जो बोलेगा कि अँगूठा झूठा था, उसके सामने मैं अपना अँगूठा काग़ज़ पर रखूँगा। मैंने सत्ताईस साल से इसे छिपाया है, अब ये मुझसे नहीं छिपेगा।"

मैं उठ खड़ा हुआ।

"गोविंद भाई, उस रात बबलू भी वहाँ होगा क्या?"

"नहीं। उस रात कुछ भी ऐसा नहीं होगा जो बबलू को पता हो। बबलू को डरना चाहिए, पर पता नहीं चलना चाहिए। फ़र्क़ समझते हो ना?"

"समझता हूँ।"

"और अंकुश—" उन्होंने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया, पर मुझे छुआ नहीं। "अगर मैं उस रात न आऊँ, तो मुझे मरा हुआ मत मान लेना। कभी-कभी आदमी डर के कारण नहीं आता, और डर ऐसा होता है जो मारता नहीं, बस रास्ता भूला देता है।"

"आप आएँगे," मैंने कहा।

"तुम्हें कैसे पता?"

"क्योंकि आपने सत्ताईस साल में पहली बार किसी को अपना अँगूठा दिखाया है," मैंने कहा। "उँगली दिखाने वाला आदमी फिर उसे जेब में नहीं रखता।"

वो हँसे। पहली बार। छोटी सी हँसी, जैसे किसी पुराने ताले में तेल डाला गया हो।

मैंने पन्ने समेटे, कपड़े में लपेटे और कमीज़ के अंदर रखे। दरवाज़े तक आया। फिर रुका।

"गोविंद भाई, एक बात।"

"हाँ?"

"आपने कहा था कि ये काग़ज़ आपके दफ़्तर से कभी बाहर नहीं गया।"

"हाँ, कहा था।"

"तो फिर ये मेरे हाथ में कैसे आया?"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में एक ऐसा डर था जो मैंने पहले किसी आदमी की आँखों में नहीं देखा था — वो डर नहीं था जो लड़ने से आता है, वो डर था जो जानने से आता है।

"इसका जवाब मेरे पास भी नहीं," उन्होंने कहा। "और मैं एक बात जानता हूँ — जिस दिन काग़ज़ अपने आप घर से बाहर निकलने लगे, उस दिन उसे बाहर भेजने वाला खुद घर के अंदर बैठा होता है।"

मैं गली में निकला।

सुबह की धूप अब सीधी दीवार पर आ गई थी। भारद्वाज भवन के काँच पर सेकंड मंज़िल का एक पर्दा हिला और रुक गया।

मैंने साइकिल उठाई और उसके पहिये को एक बार देखा — हवा कम थी, पर दस मिनट का रास्ता था। मैंने घंटी की तरफ़ देखा, जो हैंडल पर लगी थी, चुप, स्थिर।

मैंने धीरे से घंटी को उँगली से छुआ, बिना बजाए, और कहा, "सुन रही है?"

घंटी ने उत्तर नहीं दिया।

मैं मुस्कुराया। "ठीक है। तू चुप रह। आज रात बोलने वाले हम हैं।"

और मैंने साइकिल मोड़ी। गली के मुँह पर पहुँचते-पहुँचते मुझे लगा कि पीछे कोई खड़ा है। मैंने पलटकर नहीं देखा। पलटकर देखना उस आदमी का काम है जिसे डर लगता है। मुझे आज डर नहीं लग रहा था। मुझे आज सिर्फ़ यह सोचना था कि मीरा को कैसे बताऊँ कि आज रात बारह बजे हमें अस्पताल के पिछले फाटक पर जाना है — वो भी उस जगह, जहाँ से ट्रक गुज़रते हैं, और जहाँ एक बूढ़े मुनीम ने पहली बार अपना अँगूठा खुद उठाने की बात कही थी।

मैंने साइकिल तेज़ की।

और पीछे, उस छोटे कमरे की खिड़की पर, एक बूढ़ा आदमी अपने दोनों हाथ मेज़ पर रखकर बैठा था, अपने अँगूठे को देख रहा था, और पहली बार उसे आईने की ज़रूरत नहीं पड़ रही थी।

॥

साइकिल का पिछला पहिया हवा कम था, इसलिए मैंने पैडल धीरे मारे। भारद्वाज भवन के काँच से टकराकर धूप टूट रही थी और मेरी परछाईं सड़क पर मेरे आगे-आगे भाग रही थी, जैसे उसे भी जल्दी हो कि मैं दुकान पहुँच जाऊँ, और वो अपनी जगह पर बैठ जाए।

पीछे मुड़कर मैंने नहीं देखा। पर मुझे पता था कि उस कमरे में एक बूढ़ा आदमी अब भी अपने दोनों हाथ मेज़ पर रखकर बैठा है, अपने अँगूठे को देख रहा है, और पहली बार उसे आईने की ज़रूरत नहीं पड़ रही है।

दुकान पहुँचा तो टिंकू शटर के नीचे बैठा था, हाथ में एक पुरानी रिम पकड़े, और बड़ी देर से ऐसे देख रहा था जैसे वो रिम नहीं, कोई ज़िंदा चीज़ हो जो उससे कुछ कहना चाहती हो।

"उस्ताद, आप आ गए।"

"क्यों, कहीं जाना था क्या?"

"मुझे लगा आप भवन में ही रह गए।" उसने रिम ज़मीन पर रखी। "मैंने सोचा, अगर आप डेढ़ घंटे में न आए तो मैं चला जाऊँगा।"

"कहाँ?"

"भवन।"

"और फिर?"

"फिर देखता कि आप कहाँ हो।"

मैं हँस पड़ा। ये लड़का तेरह साल का है और इसकी सोच पुलिस की सोच से बड़ी है।

"टिंकू, एक बात याद रखना। अगर मैं कहीं न आऊँ, तो तू कभी अकेला मेरे पीछे मत आना।"

"क्यों?"

"क्योंकि तेरे आने से मेरी मुश्किल दोगुनी हो जाएगी। मुझे तेरी भी फ़िक्र करनी पड़ेगी।"

वो थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला, "ठीक है। फिर मैं सानिया को भेज दूँगा।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho