The Mysterious Bell – Chapter 482
"अच्छा।" उन्होंने मेज़ पर पANI… नहीं, उन्होंने मेज़ पर अपनी हथेली रखी और उसे देखने लगे, जैसे पहली बार देख रहे हों। "अंकुश, तुम्हारे पापा से मैंने अँगूठा लिया था।"
मेरा पेट कड़ा हो गया।
"जानता हूँ," मैंने कहा।
"तुम जानते हो?"
"पापा ने खुद बताया।"
"तो फिर तुम मुझे गाली देने क्यों नहीं आए?"
"क्योंकि गाली देने से आपका हाथ ठीक नहीं होता," मैंने कहा। "और मुझे आपका हाथ ठीक चाहिए। उस अँगूठे को सबके सामने उठाने के लिए।"
उनके चेहरे पर कुछ ऐसा हुआ जो मैंने पहले किसी के चेहरे पर नहीं देखा था।
वो ऐसे देखने लगे जैसे कोई बच्चा बहुत देर तक तेज़ धूप में खड़ा रहे और अचानक छत मिल जाए।
"क्या कहा तुमने?"
"आपने सुना।"
"मैंने… मैंने सुना," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "पर ऐसा कोई नहीं बोलता। कोई नहीं। जिसके सामने मैंने ये हाथ बेचा, वो भी मुझसे यही कहता है कि अब भूल जाओ भाई, बीता हुआ वक़्त है। भूल जाओ? मैं भूलने की कोशिश में सत्ताईस साल से हर रात एक ही सपना देखता हूँ। हर रात। और हर रात सपने में वही स्याही की डिब्बी होती है। वही कपड़ा। वही उँगली।"
मैं उठा। मैं मेज़ के इस तरफ़ आया। मैंने उनकी कुर्सी के पास खड़े होकर, उनके कंधे पर हाथ रखा।
"आपने कभी किसी को नहीं बताया?"
"किसे बताता? बेटे को? वो कहता — बापू तुमने क्या किया। बीवी को? वो—" उनका गला रुंध गया। "वो चल बसी यह बात जानने से पहले। भगवान की मेहरबानी समझो।"
"गोविंद भाई, आपका बेटा?"
"बड़ा हो गया। परदेस में है। उसे पता नहीं। उसे पता नहीं कि उसका बाप क्या-क्या करता रहा है खाना जुटाने के लिए।"
मैंने उनके कंधे से हाथ नहीं हटाया।
"ये अँगूठा—" मैंने कहा।
"ये अँगूठा मेरा है," उन्होंने बहुत धीरे कहा, इतने धीरे कि जैसे खुद से कह रहे हों। "पचास साल पुराना। हकीम साहब का दफ़्तर। मैं उस वक़्त सोलह साल का रहा होऊँगा। मेरे पापा बीमार थे, मैं दवा के लिए गया था, और वहाँ मुझसे कहा गया कि ये काग़ज़ पर अँगूठा लगाओ, दवा मुफ़्त मिलेगी। मैंने लगा दिया। मैंने पूछा भी नहीं कि किस चीज़ पर। मुझे लगा—" उन्होंने आँखें बंद कर लीं। "मुझे लगा दवा का काग़ज़ होगा।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"और आपका पापा?"
"ठीक हो गए। दो महीने बाद चल बसे। उस दिन के बाद मैंने अपनी उँगली आईने में नहीं देखी। कसम खाई थी— किसी को नहीं बताऊँगा, किसी को नहीं दिखाऊँगा। और फिर बीस साल बाद उसी रणवीर के दफ़्तर में मुझसे कहा गया — शंकर यादव से अँगूठा ले लो। और मैंने लिया। उस दिन मैं वही सोलह साल का लड़का था। बस उस दिन मेरे हाथ में स्याही की डिब्बी थी।"
कमरा शांत था।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने उनके कंधे पर हाथ रखे रखा।
और तभी—
बाहर गली में एक स्कूटर आकर रुका। उसकी आवाज़ मुझे पहचानी लगी, पर मैंने याद नहीं किया कि कहाँ सुनी थी। फिर एक पान चबाने की आवाज़ आई — चट-चट।
और फिर ज़ंजीर की आवाज़। मोटी सोने की चेन में कुछ लटकता था, जो हिलने पर टिक-टिक करता था।
गोविंद भाई ने मेरी तरफ़ देखा, और उनका चेहरा पल भर में बदल गया। उनका हाथ उस पन्ने पर पड़ा और उन्होंने पूरे सात पन्नों को उठाकर मेज़ के नीचे रखी मोटी बही के अंदर सरका दिया, इतनी तेज़ी से कि मुझे भी देर लगी समझने में।
और फिर उन्होंने उस बही पर काग़ज़ों का ढेर रख दिया।
"बैठो," उन्होंने फुसफुसाया। "कुछ मत बोलो।"
बबलू पांडे दरवाज़े पर आ खड़ा था।
वो दरवाज़े में इस तरह खड़ा था जैसे दरवाज़े ने ही उसे पहना हो। मोटा शरीर, कमीज़ की बाँह चढ़ी हुई, गले में चेन, और मुँह में पान, जिसकी गंध तीन कदम दूर से आ रही थी। उसने अंदर आने से पहले एक बार काग़ज़ों के रैक की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"अरे," उसने कहा। "मिस्त्री जी। कलकत्ता से आए हो क्या, सुबह-सुबह दफ़्तर?"
"आपकी तरह खाली नहीं बैठता," मैंने कहा। "मुझे रोज़ कुछ न कुछ ठीक करना पड़ता है।"
उसने पान चबाया और कमरे में आकर मेज़ के पास खड़ा हो गया — बिल्कुल गोविंद भाई की कुर्सी के पीछे।
"गोविंद भाई, इन्हें पता है?" उसने अँगूठे से मेरी तरफ़ इशारा किया। "कि इनकी दुकान का काग़ज़ किस हाल में है?"
गोविंद भाई ने चश्मा ठीक किया। "बात हो रही थी।"
"क्या बात? काग़ज़ की बात हो रही थी या मनमानी की?" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मिस्त्री, सीधी बात सुन लो। दुकान पर जो पीला नोटिस लगा है, वो मेरा लगाया हुआ नहीं है। वो साहब का लगाया है। मेरे लगाए होते तो अब तक आधा गली रो रही होती।"
"आपको रोना आता भी है?" मैंने पूछा।
वो हँसा। पान की लाली उसके दाँतों पर फैली।
"मज़ाक ठीक है। मज़ाक से पेट नहीं भरता। ये सुनो — तुम्हारी दुकान का लाइसेंस, रजिस्ट्री, हिसाब — तीनों काग़ज़ दफ़्तर में पड़े हैं। तीनों पुराने हैं, पर चल रहे थे क्योंकि ऊपर वाला चुप था। अब वो चुप नहीं है। अब नियम है। दस दिन। काग़ज़ पूरे नहीं तो ताला।"
"जो काग़ज़ आप मुझसे पूरा करवाना चाहते हैं, वो कौन सा है?" मैंने पूछा। "वो वाला जिस पर मुझे बिना पढ़े अँगूठा लगाना है?"
बबलू के चेहरे की मुस्कान दो पल के लिए रुक गई।
फिर वो फिर हँसा, पर इस बार हँसी में कुछ कम था।
"तुम बहुत बोलने लगे हो," उसने कहा। "ये अच्छा नहीं है। गली में ज़्यादा बोलने वाले आदमी की दुकान का शटर जल्दी गिरता है।"
उसने गोविंद भाई की तरफ़ देखा।
"आप इन्हें कुछ दे रहे थे क्या? कोई काग़ज़? कोई पुरानी बही?"
गोविंद भाई की आवाज़ पत्थर जैसी शांत थी। "मैं इन्हें क्या दूँगा? इनके पापा का काग़ज़ मैंने खुद अपने हाथ से तैयार किया था।"
बबलू ने उनके कंधे पर हाथ रखा। "अच्छा किया। साहब को याद रहेगा।"
"साहब को हर चीज़ याद रहती है," गोविंद भाई ने कहा। "उनकी सबसे बड़ी ताक़त यही है।"
बबलू ने मुझे आख़िरी बार देखा।
"अंकुश," उसने कहा। "एक बात याद रखना। साहब तुमसे लड़ना नहीं चाहते। वो तुम्हें अपने साथ ले जाना चाहते हैं। और उन्होंने आज तक जिसे साथ लिया, उसका भला ही किया है।"
"और जो नहीं माना?"
"वो सवाल पूछने वाले लोग गली के मोड़ पर पुरानी दुकान खोजते मिलते हैं," उसने कहा, और इतना कहकर मुड़ा और चला गया।
स्कूटर शुरू हुआ। आवाज़ दूर गई।
हम दोनों देर तक चुप बैठे रहे। मुझे लगा गोविंद भाई उठेंगे और बही के नीचे से पन्ने निकालेंगे। पर वो नहीं उठे। उन्होंने सिर्फ़ अपना चश्मा उतारा, उसे मेज़ पर रखा, और अपनी आँखों को हथेली से ढक लिया।
"अंकुश," उन्होंने कहा, आवाज़ हथेली के नीचे से आ रही थी। "मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे न माफ़ी चाहिए, न सज़ा चाहिए। पर एक बात है जो मैं सत्ताईस साल से अपने अंदर पत्थर की तरह ढो रहा हूँ।"
"कहिए।"
"उस रात जब मैंने तुम्हारे पापा से अँगूठा लिया, उस रात के बाद मैं सीधा यहाँ आया था। इसी कमरे में। और मैंने अपने लिए एक काग़ज़ लिखा था।"
"कैसा काग़ज़?"
"एक लाइन।" उन्होंने हाथ नीचे किया। "मैंने लिखा था — आज के बाद जो भी काग़ज़ मेरे सामने आए, उसे मैं पहले खुद पढ़ूँगा।" उन्होंने हल्की सी हँसी निकाली। "और फिर साहब ने मुझे दूसरे दिन तीन काग़ज़ दिए, और मैंने उन्हें पढ़े बिना दस्तख़त कर दिए। क्योंकि काग़ज़ पढ़ने वाला मुनीम दफ़्तर में नहीं टिकता।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno