The Mysterious Bell – Chapter 476
"कौन सा दरवाज़ा?"
"जिसके पीछे वो आदमी है जिसने तेरे पापा को बचाया।"
और फिर चुप।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "ये घंटी हर बार आधी बात क्यों कहती है?"
"क्योंकि वो भी डरती है," मैंने कहा। "जिस चीज़ को पता है कि सब कहने से क्या होगा, वो आधा कहकर रुक जाती है।"
मैंने तीसरा पन्ना उठाया।
उस पर एक नक़्शा था। हाथ से बना। अस्पताल की इमारत, बगल की गली, और पीछे एक बड़ा चौकोर हिस्सा, जिस पर तिरछी लकीरें खींची गई थीं। नीचे कोने में लिखा था — "यह हिस्सा गली के लोगों ने दिया था"।
"ये तो अस्पताल की ज़मीन का पुराना काग़ज़ है," मीरा ने कहा। धीरे से, जैसे अपने आप से बात कर रही हो।
"हाँ।"
"इसका मतलब ये फाइल है वो ज़मीन?" उसने पूछा। "वो ज़मीन जिसे रणवीर की कंपनी ट्रस्ट के नाम पर ले रही है?"
"हाँ।"
"और ये किसी ने चुराकर नहीं भेजी," मीरा ने कहा, "इसकी नकल की है। देख — काग़ज़ नया है, स्याही नई नहीं, लेकिन लिखाई पुराने पन्ने से आई है। ये नकल है। असली काग़ज़ किसी और के पास है।"
मैंने चौथा पन्ना उठाया और उसे लैंप के नीचे किया।
और मेरी साँस रुक गई।
उस पन्ने के ऊपर, एक जगह, एक अँगूठा था। दूसरा। पहले वाले से थोड़ा अलग।
मैंने उसे देखा और मेरा हाथ फिर काँपा। इस बार मैंने हाथ नहीं रोका। मैंने उसे काँपने दिया।
टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, ये… ये पापा का अँगूठा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"कैसे पता?"
"पापा के अँगूठे पर एक छोटी सी कटी लकीर है न — दाएँ कोने पर। यहाँ भी है।" उसने उँगली से इशारा किया।
मैंने देखा।
था।
मुझे कुछ कहना था, पर आवाज़ नहीं निकली। मैं बैठ गया — मेज़ के पास रखी उसी पुरानी स्टूल पर, जो हिलती है।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश।"
"मैं ठीक हूँ।"
"तू ठीक नहीं है।"
"मैं ठीक हूँ, मीरा।" मैंने कहा। "मुझे ठीक होना है, क्योंकि अगर मैं अभी टूटा, तो कल सुबह दस बजे पीपल के नीचे जो होना है, वो नहीं होगा।"
"क्या होना है?"
"सलीम बक्श रजिस्टर लाएगा। सात नामों वाला रजिस्टर। जिसमें मेरे दादा का नाम सातवाँ है।"
मीरा ने काग़ज़ अपने हाथ में लिया और उसे लैंप के नीचे लाया। "तो ये काग़ज़ और वो रजिस्टर — दोनों एक ही बात कह रहे हैं?"
"नहीं," मैंने कहा। "ये काग़ज़ पहले की बात कह रहा है। रजिस्टर बाद की। और इनके बीच में जो है, वो कोई एक इंसान है, जो दोनों जगह मौजूद था।"
मैंने पाँचवाँ पन्ना उठाया।
उस पर एक ही लाइन थी, टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई में, जैसे कोई बहुत थका हुआ आदमी लिख रहा हो।
"मैंने अँगूठा लगाया, काग़ज़ नहीं पढ़ा।"
टिंकू ने कहा, "उस्ताद, ये तो कोई अपनी सफ़ाई लिख रहा है।"
"नहीं," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ बदल गई थी। "ये सफ़ाई नहीं है। ये इकरार है। कोई अपनी गवाही दे रहा है, बिना ये बताए कि वो कौन है।"
और तभी, बाहर से, दरवाज़े के पास, पैरों की आवाज़ आई।
नहीं, आवाज़ नहीं। मेरी आदत है — जब कोई दुकान के पीछे वाले कमरे के दरवाज़े पर आता है, तो पहले चप्पल की रगड़ आती है, फिर खाँसी, फिर दस्तक। उस्ताद की चप्पल की आवाज़ अलग है। उनके बाएँ पैर का तलवा घिसा हुआ है, इसलिए वो आधा खुरखुराता है, आधा सरकता है।
वो आवाज़ आई।
मैंने सिर उठाया।
उस्ताद दरवाज़े पर खड़े थे। उनका चश्मा नाक पर फिसला हुआ था, कान पर पेंसिल, हाथ में कुछ नहीं — बस उँगलियाँ हल्की मुड़ी हुईं, जैसे अभी कुछ छोड़ा हो।
"उस्ताद?" मैंने कहा, और उठने लगा।
उन्होंने हाथ उठाकर रोका। फिर कमरे में आए, मेज़ के पास, और लैंप की रोशनी में काग़ज़ों को देखा।
उन्होंने एक भी काग़ज़ नहीं छुआ। सिर्फ़ देखा।
और जब उनकी नज़र उस अँगूठे वाले पन्ने पर पड़ी, तो उनका चेहरा वैसा हो गया जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा।
एक बार, बहुत पहले, मैंने उस्ताद को देखा था जब गली में बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे और गेंद उनकी दुकान की खिड़की में लग गई थी और काँच टूट गया था। तब उनका चेहरा नहीं बदला था। उन्होंने सिर्फ़ कहा था कि बच्चे होते हैं, और आधा रुपया लिया था।
आज उनका चेहरा बदल गया।
"उस्ताद," मैंने कहा, "ये अँगूठा —"
उन्होंने मेरी बात काटी।
"यह अँगूठा जिसका है," उस्ताद ने धीरे से कहा, "उसने कभी काग़ज़ पढ़ा नहीं। सिर्फ़ डरकर उसे छुआ है।"
कमरा चुप हो गया।
इतना चुप कि लैंप की बत्ती की आवाज़ सुनाई दे रही थी — वो हल्की फुसफुसाहट, जो तेल खत्म होने से पहले निकलती है।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"आपको कैसे पता?"
उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस मेज़ पर पड़ी अपनी उँगली को देखा, फिर काग़ज़ को, फिर मेरी तरफ़।
"क्योंकि मैंने वो अँगूठा लगते देखा है," उन्होंने कहा।
टिंकू ने धीरे से कहा, "कब?"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। टिंकू चुप हो गया।
"पचास साल पहले," उस्ताद ने कहा, "जब मैं और मेरा भाई…" वो रुक गए। "जब हम एक ही दुकान चलाते थे। उस रात एक आदमी आया था। हाथ काँप रहे थे। स्याही की डिब्बी हमारे सामने रखी गई थी और वो उँगली डुबोकर काग़ज़ पर रखने ही जा रहा था कि उसका हाथ फिसल गया। अँगूठे का निशान बना, पर काग़ज़ के किनारे पर। उसने दोबारा नहीं लगाया। कहा — बस, यही काफ़ी है।"
"वो कौन था?" मैंने पूछा।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — न डर, न गुस्सा। थकान। बहुत पुरानी थकान।
"वो तेरे दादा जगदीश का दोस्त था," उन्होंने कहा।
मेरे हाथ फिर काँपे। इस बार टिंकू ने देखा और उसने कुछ नहीं कहा।
"और उसका नाम?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो जल्दबाज़ी थी, जो हर पत्रकार के पास होती है और जो कभी-कभी बहुत मेहँगी पड़ती है।
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।
"नाम अभी नहीं," उन्होंने कहा। "नाम बताने से पहले मुझे एक बात साफ़ करनी है।"
"कौन सी बात?"
"इस फाइल पर जो नाम ऊपर लिखा है — गोविंद भाई — वो नाम इस फाइल का नहीं है।"
मैं उठकर खड़ा हो गया।
"क्या मतलब?"
उस्ताद ने लैंप करीब खींचा और उँगली सबसे ऊपर वाली लाइन पर रख दी — वही लाइन जिसमें गोविंद भाई का नाम था।
"देख।" उन्होंने कहा। "ये नाम बाद में लिखा गया है। काग़ज़ पहले पीला पड़ा, फिर नाम लिखा गया। स्याही नई है, काग़ज़ पुराना। और उस नाम के नीचे जो अँगूठा है — वो इस काग़ज़ पर नहीं है।"
"कैसे?"
"क्योंकि अँगूठा उस लाइन के नीचे है, पर उसका आधा हिस्सा उस काग़ज़ के साथ जुड़ा है जो यहाँ नहीं है। जो काग़ज़ काटकर हटाया गया है।" उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। "ये फाइल अधूरी है, अंकुश। इसका एक पन्ना गायब है, और गायब पन्ने पर वो अँगूठा है जो असली है।"
मीरा ने काग़ज़ उठाया और उसे लैंप के सामने ऊँचा किया। रोशनी उसके पीछे से आई और काग़ज़ साफ़ दिखने लगा।
"देखो," उसने कहा। "यहाँ किनारे पर एक लकीर है।"
मैंने देखा। थी। एक पतली सी लकीर, जैसे किसी काग़ज़ को दूसरे काग़ज़ पर रखकर काटा गया हो और कैंची की नोक किनारे पर रगड़ गई हो।
"तो किसी ने इस फाइल से एक पन्ना काटकर निकाला," मैंने कहा।
"नहीं," उस्ताद ने कहा। "किसी ने इस फाइल से एक पन्ना काटकर निकाला और फिर इस फाइल की नकल बनाई। असली फाइल किसी और के पास है। ये बस उसकी आवाज़ है।"
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