The Mysterious Bell – Chapter 475
गली में शाम उतर रही थी। पीपल के पत्ते हिल रहे थे और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बूढ़ा दूर बैठकर काग़ज़ पलट रहा हो। शबनम आपा की गुमटी पर कोयले की गंध आ रही थी, और उस्ताद की दुकान से आज सिलाई की मशीन की आवाज़ नहीं आ रही थी। यही सबसे अजीब बात थी। उनकी मशीन पचास साल से रोज़ टिक-टिक करती है, आज चुप थी।
मैंने दुकान का शटर खोला। पीछे वाले कमरे का बल्ब गुनगुनाया, फिर जल गया। उसकी पीली रोशनी में औज़ारों का ट्रंक, चारपाई, लोहे की अलमारी, और वो पुराना टूटा आईना दिखा, जिसमें मेरा चेहरा दो हिस्सों में बँटा दिखता है।
टिंकू पानी लेने गया, पर दो मिनट में लौट आया — बिना पानी।
"भूल गया," उसने कहा, और दरवाज़े के पास ही खड़ा हो गया। जानता था कि यहाँ से उसे कोई नहीं भेजेगा।
मीरा ने मेज़ पर अपना थैला रखा और मेरी तरफ़ देखा।
"निकाल।"
"तू निकाल।" मैंने कहा। "जो चीज़ तेरे थैले के नीचे रखी गई, उसे तू खोलेगी।"
उसने लिफ़ाफ़ा जेब से नहीं, मेरी जेब से निकाला — मैंने ही बढ़ाया था उसे — और मेज़ पर रख दिया।
सादा सफ़ेद लिफ़ाफ़ा। ऊपर नीली स्याही में वही एक पंक्ति, और पीछे फीकी स्याही में वो नाम।
गोविंद भाई।
मीरा ने अपनी उँगली लिफ़ाफ़े के किनारे पर फेरी। फिर उसने कैंची नहीं माँगी, चाकू नहीं माँगा। उसने बस किनारा अँगूठे से दबाया और धीरे से फाड़ा, जैसे किसी की नींद तोड़ रही हो।
अंदर से काग़ज़ निकला — एक नहीं, कई।
पहला पन्ना निकालते ही कमरे में एक गंध फैल गई। पुरानी अलमारी की गंध। कपूर की गंध। और उसके साथ एक हल्की-सी गंध, जो मुझे माँ के संदूक से आती याद थी — नैप्थलीन की गोली की।
काग़ज़ पीला पड़ चुका था, ऊपर से नीचे तक, जैसे उसे धूप में नहीं, किसी बंद कमरे में बरसों रखा गया हो। किनारे उलझे हुए थे, जैसे किसी ने उसे जल्दी में कई बार मोड़ा हो और फिर सीधा कर दिया हो। कोने पर एक जगह काग़ज़ फटा भी था, और उस फटे हिस्से में सिर्फ़ एक अधूरा अक्षर बचा था।
मैंने लैंप जलाया। पुराना लैंप, जिसमें तेल कम था और बत्ती जलने में दो बार बुझी। तीसरी बार जली। उसकी रोशनी में मीरा ने पहला पन्ना मेज़ पर सीधा रखा।
ऊपर, साफ़ नीली स्याही में, मोटे अक्षरों में एक नाम लिखा था।
गोविंद भाई।
नीचे पता। नीचे तारीख़। नीचे एक हल्की लाइन, जिसमें लिखा था कि यह काग़ज़ उनके हाथ से जमा किया गया।
और उसके नीचे, काग़ज़ के दाएँ कोने में, एक धुँधला निशान था।
अँगूठे का निशान। बहुत पुराना। स्याही फीकी पड़ चुकी थी, पर आकार साफ़ था — गोल, थोड़ा तिरछा, जैसे किसी ने काग़ज़ पर हाथ रखा हो और उँगली दबाकर छोड़ दी हो, न कि अँगूठा लगाया हो।
मेरा हाथ उस निशान की तरफ़ बढ़ा।
और काँपने लगा।
मैंने अपना हाथ वापस नहीं खींचा। मैंने उसे देखा, जैसे कोई अपने ही शरीर को अजनबी नज़र से देखता है। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं, और मैं अंदर से ठंडा था। मुझे ठंड नहीं लग रही थी, मुझे डर भी नहीं लग रहा था। बस हाथ काँप रहा था, जैसे उसे कुछ याद आ रहा हो जो मुझे याद नहीं।
"अंकुश?" मीरा ने कहा।
"हूँ।"
"तेरा हाथ क्यों काँप रहा है?"
"पता नहीं।"
"तू झूठ बोल रहा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "नहीं बोल रहा। सच में पता नहीं। मुझे ये निशान जाना-पहचाना नहीं लग रहा, मुझे लग रहा है कि ये निशान मुझे जानता है।"
मेरी जेब में घंटी हल्की बजी। बहुत हल्की। जैसे कोई सोते हुए आदमी करवट ले।
"निशान पुराना है," घंटी ने कहा। "डर नया है।"
"किसका डर?"
घंटी चुप हो गई।
टिंकू दरवाज़े से सरका और मेज़ के किनारे आ गया। उसने काग़ज़ पर नज़र डाली और धीरे से बोला, "उस्ताद, ये अँगूठा तो… पापा के अँगूठे जैसा नहीं है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"कैसे पता?"
"पापा का अँगूठा चौड़ा है न। ये देखो, ये पतला है, लंबा है। जैसे किसी दुबले आदमी का हो।"
मैंने करीब झुककर देखा। लड़का सही कह रहा था। निशान पतला और लंबा था, और उसका ऊपरी हिस्सा काग़ज़ के किनारे की तरफ़ झुका हुआ था, जैसे आदमी का हाथ काँपा हो और उँगली फिसल गई हो।
मीरा ने काग़ज़ को पलटा।
पीछे कुछ नहीं लिखा था। बस एक मुहर थी।
आधी मुहर।
गोल मुहर का आधा हिस्सा काग़ज़ के किनारे पर कटा हुआ था — जैसे यह पन्ना किसी बड़े काग़ज़ के बीच से निकाला गया हो और मुहर का बाकी हिस्सा उस काग़ज़ पर रह गया हो। स्याही नीली थी, पर इतनी फीकी कि लगता था बरसों हवा नहीं लगी।
उस आधी मुहर में कुछ अक्षर दिख रहे थे।
मैंने लैंप करीब खींचा। बत्ती की लौ काँपी, काग़ज़ पर परछाईं हिली।
"ह… क… म…" मीरा ने पढ़ने की कोशिश की। "हकीम?"
"हकीम साहब।" मैंने कहा।
और जैसे ही मैंने वो दो शब्द बोले, मेरे अंदर कुछ हिला। ऐसे नहीं जैसे कोई बड़ी बात याद आई हो। ऐसे जैसे किसी बंद कमरे में रखी कोई चीज़ अचानक हिल जाए और आपको लगे कि कमरे में कोई और भी है।
"हकीम साहब कौन?" मीरा ने पूछा।
"पता नहीं।"
"झूठ।"
"मीरा," मैंने कहा, "मैं तुझसे झूठ नहीं बोल रहा। नाम सुनकर मुझे लग रहा है कि ये नाम मेरे कानों ने पहले सुना है। पर कब, कहाँ, किसने बोला — ये मुझे याद नहीं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर काग़ज़ों की तरफ़।
"ये फाइल सीधे रणवीर के दफ़्तर से नहीं आई।"
"कैसे पता?"
"देख इसे।" उसने काग़ज़ उठाया। "रणवीर के दफ़्तर का काग़ज़ मोटा होता है, उस पर नीली गोल मोहर होती है, और उसकी तह हमेशा तीन बार होती है — ऊपर, नीचे, बीच में। ये काग़ज़ एक बार मोड़ा गया है। और ये मुहर रणवीर की मुहर नहीं है। ये किसी सरकारी दफ़्तर की पुरानी मुहर है, जो आजकल लगती ही नहीं।"
"तो?"
"तो ये किसी ऐसे आदमी ने भेजा है जो रणवीर के अंदर बैठा है, पर रणवीर का नहीं है।" उसने काग़ज़ मेज़ पर रखा। "कोई अंदरूनी आदमी है। जो डर रहा है। जो सीधे आकर नहीं दे सकता, इसलिए चपरासी के भेस में काग़ज़ गिरा गया।"
मैंने उसकी बात सुनी और सोचा।
मीरा की आदत है — वो चीज़ों को जल्दी पकड़ लेती है। पर आज उसकी बात में एक चीज़ और थी, जो मुझे चुभी। वो यह कह रही थी कि काग़ज़ भेजने वाला डर रहा है। और जो डर रहा है, वो अब बोलने की तरफ़ जा रहा है। यह वही बात थी जो घंटी ने सभा में कही थी।
मैंने काग़ज़ों का बाकी हिस्सा निकाला।
कुल सात पन्ने थे। सातों पीले। सातों के किनारे उलझे हुए। दो पन्नों पर जल्दी में लिखी गई स्याही थी, जैसे कोई अधूरी बात कहकर रुक गया हो।
दूसरे पन्ने पर एक सूची थी। नाम, हिस्सा, और आगे एक लाइन में लिखा था कि यह हिस्सा किसके नाम चढ़ा था।
उस सूची में मेरा नाम नहीं था। मेरे पापा का नाम नहीं था।
पर एक नाम था, जिसे मैंने पढ़ा और मेरे हाथ फिर काँपे।
हकीम अली।
"ये कौन है?" मीरा ने पूछा।
"नहीं जानता।" मैंने कहा।
"अंकुश, तेरा हाथ फिर काँप रहा है।"
"मुझे पता है।"
"तू अगर इसको छिपाएगा तो मैं यहाँ से उठ जाऊँगी।"
रुक गया। मैंने उसे देखा।
"मैं छिपा नहीं रहा, मीरा। मैं खुद नहीं जानता कि अंदर क्या हो रहा है। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरे अंदर कोई दरवाज़ा है, जिसे मैंने कभी खोला नहीं, और आज ये काग़ज़ उसकी कुंडी हिला रहा है।"
घंटी बजी। इस बार ज़ोर से। इतनी ज़ोर से कि टिंकू चौंककर पीछे हो गया।
"दरवाज़ा बंद है," घंटी ने कहा। "चाबी घर के बाहर नहीं।"
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